Tuesday, December 28, 2010

ये हम गुनहगार औरतें हैं,न सर झुकाएं न हाथ जोड़ें

"ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो अहले-जुब्बा की  तमकनत से
न रोआब खोएं
न बेचें
न सर झुकाएं
न हाथ जोड़ें


ये हम गुनहगार औरते हैं
के : जिनके जिस्मों की फसल बेचें जो लोग
वो सरफराज ठहरें
नियाबते-इम्तियाज ठहरें


ये हम गुनहगार औरते हैं
के : सच का परचम उठा के निकलीं
तो झूठ से शहराहें अटी मिली हैं
हरएक दहलीज पे
सजाओं की दास्तानें रखी मिली हैं
जो बोल सकती थीं, वो जबानें कटी मिली हैं


के : अब ताअकुब रात भी आए
तो ये आंखें नहीं बुझेंगी
के : अब जो दीवार गिर चुकी है
उसे उठाने की जिद न करना


ये हम गुनहगार औरते हैं
जो अहले जुब्बा की तमकनत से
न रोआब खोएं
न बेचें
न सर झुकाएं, न हाथ जोड़ें."

शब्दार्थ :
(अहले जुब्बा : मजहब के ठेकेदार, सरफराज : सम्मनित, नियाबते इम्तियाज : सही गलत में फर्क करनेवाला, ताअकुब : तलाश में, तमकनत : प्रतिष्ठा)

2 comments:

  1. सुन्दर रचना
    नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें

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  2. ये गुनाह तो बार बार होना चाहिए।

    शानदार और अद्भुत रचना को पढवाने का शुक्रिया।

    ---------
    ये शानदार मौका...
    यहाँ खुदा है, वहाँ खुदा है...

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