Sunday, March 20, 2016

Rajvir Singh @ 50...First Pramoty ACP in indian Police from Sub Inspector

From Sub Inspector to Acp

ACP Rajbir Singh courted many controversies during his otherwise remarkable career that began in 1982 when he entered the Delhi Police as a sub-inspector. His rise from a sub-inspector to a high-profile assistant commissioner of police was as sensational as the violent end to his life. 

Delhi Police's 'encounter specialist' Rajbir Singh was murdered on Monday night - ending a career that was as controversial as it was illustrious. ACP Rajbir Singh, who was allegedly shot dead by a property dealer in the suburb of Gurgaon, had courted many controversies during his otherwise remarkable career that began in 1982 when he entered the Delhi Police as a sub-inspector. Shunted out of the Crime Branch following his alleged links with a drug mafia and touted as a 'property grabber', Rajbir Singh last year returned as the head of the newly established Special Operation Squad, a special anti-terror cell.

@50

Rajbir, who had over 50 'kills' to his credit, had become the face of counter-terrorism operations in the capital. He was the man instrumental in cracking the attack on parliament in 2001 and the Red Fort in 2000. Rajbir was the only officer in the police history to be promoted to the rank of ACP in just 13 years. His first brush with fame came in 1994 with the arrest of notorious criminal Virendera Jat following which he was promoted to the rank of inspector. The next big ticket targets were gangsters Rajbir Ramola and Ranpal Gujjar. He was then posted as ACP (operations) in the west district. "Rajbir Singh was an able police officer of the Delhi Police and had two promotions during his career," ACP Rajan Baghat said.

The word 'encounter' entered the lexicon in the mid-1990s when gangsters from western Uttar Pradesh began making forays into the capital. Rajbir was among the most prominent 'encounter specialists' at the time.He came into the limelight on November 3, 2002 when he allegedly killed two 'terrorists' in the basement of the Ansal Plaza shopping mall in south Delhi. A man, Hari Krishna, who claimed he saw the deaths labelled it fake. Later, suspicions were raised about the genuineness of the operations supervised by him.

Rajbir's alleged links with a drug trafficker came to the fore after a telephonic conversation between them - tapped by the narcotics wing - was leaked to the media. An inquiry headed by the joint commissioner of police (Vigilance) was ordered.The Delhi High Court also issued notices to him and other officers on charges that he and his colleagues manhandled some people in west Delhi's Kirti Nagar in connection with a property dispute.Despite  the many controversies, Rajbir was not shifted out of the Special Cell.

 


मुन्ना बजरंगी...शौक से बना हत्यारा

मुन्ना बजरंगी के खिलाफ सीबीआई जांच अभी तक अटकी पड़ी है

कौन है मुन्ना बजरंगी

मुन्ना बजरंगी का असली नाम प्रेम प्रकाश सिंह है. उसका जन्म 1967 में उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के पूरेदयाल गांव में हुआ था. उसके पिता पारसनाथ सिंह उसे पढ़ा लिखाकर बड़ा आदमी बनाने का सपना संजोए थे. मगर प्रेम प्रकाश उर्फ मुन्ना बजरंगी ने उनके अरमानों को कुचल दिया. उसने पांचवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी. किशोर अवस्था तक आते आते उसे कई ऐसे शौक लग गए जो उसे जुर्म की दुनिया में ले जाने के लिए काफी थे.

जुर्म की दुनिया में पहला कदम
मुन्ना को हथियार रखने का बड़ा शौक था. वह फिल्मों की तरह गैंगेस्टर बनना चाहता था. यही वजह थी कि 17 साल की नाबालिग उम्र में ही उसके खिलाफ पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया. जौनपुर के सुरेही थाना में उसके खिलाफ मारपीट और अवैध असलहा रखने का मामला दर्ज किया गया था. इसके बाद मुन्ना ने कभी पलटकर नहीं देखा. वह जरायम के दलदल में धंसता चला गया.


अस्सी के दशक में की थी पहली हत्या
मुन्ना अपराध की दुनिया में अपनी पहचान बनाने की कोशिश में लगा था. इसी दौरान उसे जौनपुर के स्थानीय दबंग माफिया गजराज सिंह का संरक्षण हासिल हो गया. मुन्ना अब उसके लिए काम करने लगा था. इसी दौरान 1984 में मुन्ना ने लूट के लिए एक व्यापारी की हत्या कर दी. उसके मुंह खून लग चुका था. इसके बाद उसने गजराज के इशारे पर ही जौनपुर के भाजपा नेता रामचंद्र सिंह की हत्या करके पूर्वांचल में अपना दम दिखाया. उसके बाद उसने कई लोगों की जान ली.

मुख्तार अंसारी के गैंग में हुआ शामिल

पूर्वांचल में अपनी साख बढ़ाने के लिए मुन्ना बजरंगी 90 के दशक में राजनेता मुख्तार अंसारी के गैंग में शामिल हो गया. यह गैंग मऊ से संचालित हो रहा था, लेकिन इसका असर पूरे पूर्वांचल पर था. मुख्तार अंसारी ने अपराध की दुनिया से राजनीति में कदम रखा और 1996 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर मऊ से विधायक निर्वाचित हुए. इसके बाद इस गैंग की ताकत बहुत बढ़ गई. मुन्ना सीधे पर सरकारी ठेकों को प्रभावित करने लगा था. वह लगातार मुख्तार अंसारी के निर्देशन में काम कर रहा था.


ठेकेदारी और दबंगई ने बढ़ाए दुश्मन

पूर्वांचल में सरकारी ठेकों और वसूली के कारोबार पर मुख्तार अंसारी का कब्जा था. लेकिन इसी दौरान तेजी से उभरते बीजेपी के विधायक कृष्णानंद राय उनके लिए चुनौती बनने लगे. उन पर मुख्तार के दुश्मन ब्रिजेश सिंह का हाथ था. उसी के संरक्षण में कृष्णानंद राय का गैंग फल फूल रहा था. इसी वजह से दोनों गैंग अपनी ताकत बढ़ा रहे थे. इनके संबंध अंडरवर्ल्ड के साथ भी जुड़े गए थे. कृष्णानंद राय का बढ़ता प्रभाव मुख्तार को रास नहीं आ रहा था. उन्होंने कृष्णानंद राय को खत्म करने की जिम्मेदारी मुन्ना बजरंगी को सौंप दी.

मुन्ना ने की भाजपा विधायक की हत्या

मुख्तार से फरमान मिल जाने के बाद मुन्ना बजरंगी ने भाजपा विधायक कृष्णानंद राय को खत्म करने की साजिश रची. और उसी के चलते 29 नवंबर 2005 को माफिया डॉन मुख्तार अंसारी के कहने पर मुन्ना बजरंगी ने कृष्णानंद राय को दिन दहाड़े मौत की नींद सुला दिया. उसने अपने साथियों के साथ मिलकर लखनऊ हाइवे पर कृष्णानंद राय की दो गाड़ियों पर AK47 से 400 गोलियां बरसाई थी. इस हमले में गाजीपुर से विधायक कृष्णानंद राय के अलावा उनके साथ चल रहे 6 अन्य लोग भी मारे गए थे. पोस्टमार्टम के दौरान हर मृतक के शरीर से 60 से 100 तक गोलियां बरामद हुईं थी. इस हत्याकांड ने सूबे के सियासी हलकों में हलचल मचा दी. हर कोई मुन्ना बजरंगी के नाम से खौफ खाने लगा. इस हत्या को अंजाम देने के बाद वह मोस्ट वॉन्टेड बन गया था.

सात लाख का इनामी था मुन्ना

भाजपा विधायक की हत्या के अलावा कई मामलों में उत्तर प्रदेश पुलिस, एसटीएफ और सीबीआई को मुन्ना बजरंगी की तलाश थी. इसलिए उस पर सात लाख रुपये का इनाम भी घोषित किया गया. उस पर हत्या, अपहरण और वसूली के कई मामलों में शामिल होने के आरोप है. वो लगातार अपनी लोकेशन बदलता रहा. पुलिस का दबाव भी बढ़ता जा रहा था.

मुंबई में ली पनाह

यूपी पुलिस और एसटीएफ लगातार मुन्ना बजरंगी को तलाश कर रही थी. उसका यूपी और बिहार में रह पाना मुश्किल हो गया था. दिल्ली भी उसके लिए सुरक्षित नहीं था. इसलिए मुन्ना भागकर मुंबई चला गया. उसने एक लंबा अरसा वहीं गुजारा. इस दौरान उसका कई बार विदेश जाना भी होता रहा. उसके अंडरवर्ल्ड के लोगों से रिश्ते भी मजबूत होते जा रहे थे. वह मुंबई से ही फोन पर अपने लोगों को दिशा निर्देश दे रहा था.



राजनीति में आजमाई किस्मत

एक बार मुन्ना ने लोकसभा चुनाव में गाजीपुर लोकसभा सीट पर अपना एक डमी उम्मीदवार खड़ा करने की कोशिश की. मुन्ना बजरंगी एक महिला को गाजीपुर से भाजपा का टिकट दिलवाने की कोशिश कर रहा था. जिसके चलते उसके मुख्तार अंसारी के साथ संबंध भी खराब हो रहे थे. यही वजह थी कि मुख्तार उसके लोगों की मदद भी नहीं कर रहे थे. बीजेपी से निराश होने के बाद मुन्ना बजरंगी ने कांग्रेस का दामन थामा. वह कांग्रेस के एक कद्दावर नेता की शरण में चला गया. कांग्रेस के वह नेता भी जौनपुर जिले के रहने वाले थे. मगर मुंबई में रह कर सियासत करते थे. मुन्ना बजरंगी ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में नेता जी को सपोर्ट भी किया था.
 
ऐसे गिरफ्तार हुआ था मुन्ना

उत्तर प्रदेश समते कई राज्यों में मुन्ना बजरंगी के खिलाफ मुकदमे दर्ज थे. वह पुलिस के लिए परेशानी का सबब बन चुका था. उसके खिलाफ सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज हैं. लेकिन 29 अक्टूबर 2009 को दिल्ली पुलिस ने मुन्ना को मुंबई के मलाड इलाके में नाटकीय ढंग से गिरफ्तार कर लिया था. माना जाता है कि मुन्ना को अपने एनकाउंटर का डर सता रहा था. इसलिए उसने खुद एक योजना के तहत दिल्ली पुलिस से अपनी गिरफ्तारी कराई थी. मुन्ना की गिरफ्तारी के इस ऑपरेशन में मुंबई पुलिस को भी ऐन वक्त पर शामिल किया गया था. बाद में दिल्ली पुलिस ने कहा था कि दिल्ली के विवादास्पद एनकाउंटर स्पेशलिस्ट राजबीर सिंह की हत्या में मुन्ना बजरंगी का हाथ होने का शक है. इसलिए उसे गिरफ्तार किया गया. तब से उसे अलग अलग जेल में रखा जा रहा है. इस दौरान उसके जेल से लोगों को धमकाने, वसूली करने जैसे मामले भी सामने आते रहे हैं. मुन्ना बजरंगी का दावा है कि उसने अपने 20 साल के आपराधिक जीवन में 40 हत्याएं की हैं.

बबलू श्रीवास्तव ...अपहरण का बबल गम



जुर्म की दुनिया में बबलू का नाम अपहरण करने के लिए कुख्यात थाअंडरवर्ल्ड में कई ऐसे नाम हैं जो छोटी जगहों से निकलकर जुर्म की दुनिया में छा गए. जो अपराध करते-करते इतना आगे बढ़ गए कि उनका नाम भारत की सरहद के बाहर भी गुनाहों के लिए जाना गया. अडंरवर्ल्ड में किडनैपिंग किंग के नाम से कुख्यात ऐसा ही एक नाम है बबलू श्रीवास्तव का. जो कॉलेज से निकलकर जुर्म की दुनिया में बाहुबली बनकर सामने आया.

कौन है बबलू श्रीवास्तव
माफिया डॉन बबलू श्रीवास्तव का असली नाम ओम प्रकाश श्रीवास्तव है. वह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले का रहने वाला है. उनका घर आम घाट कॉलोनी में था. उसके पिता विश्वनाथ प्रताप श्रीवास्तव जीटीआई में प्रिंसिपल थे. बबलू का बड़ा भाई विकास श्रीवास्तव आर्मी में कर्नल है.
आईएएस या सेना अधिकारी बनना चाहता था बबलू
ओमप्रकाश श्रीवास्तव उर्फ बबलू ने एक बार पेशी के दौरान खुद मीडिया के सामने खुलासा किया था कि वह अपने भाई की तरह सेना में अफसर बनना चाहता था. या फिर उसे आईएएस अधिकारी बनने की ललक थी. लेकिन उसकी जिंदगी को कॉलेज की एक छोटी सी घटना ने पूरी तरह बदल दिया. और वह कुछ और ही बन गया.
बबलू कोर्ट में पेशी के दौरान
जुर्म की दुनिया में पहला कदम
बबलू श्रीवास्तव की जिंदगी में सबकुछ ठीक चल रहा था. वह लखनऊ विश्वविद्यालय में लॉ का छात्र था. 1982 में वहां छात्रसंघ चुनाव हो रहे थे. बबलू का साथी नीरज जैन चुनाव में महामंत्री पद का उम्मीदवार था. प्रचार जोरों पर था. छात्र नेता एक दूसरे को हराने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे. इसी दौरान दो छात्र गुटों में चुनावी झगड़ा हुआ. जिसमें किसी ने एक छात्र को चाकू मार दिया. घायल छात्र का संबंध लखनऊ के माफिया अरुण शंकर शुक्ला उर्फ अन्ना के साथ था. इस मामले में अन्ना ने बबलू श्रीवास्तव को आरोपी बनाकर जेल भिजवा दिया. यह बबलू के खिलाफ पहला मुकदमा था. यहीं से उसके मन में नफरत की आग जलने लगी थी.
बबलू पेशी परअन्ना के विरोधी गैंग में एंट्री
बबलू श्रीवास्तव कुछ दिन बाद जमानत पर छूटकर बाहर आ गया. लेकिन अन्ना का गिरोह उस पर नजर लगाए बैठा था. पुलिस ने कुछ दिन बाद फिर से उसे अन्ना के कहने पर स्कूटर चोरी के झूठे आरोप में बबलू को जेल भेज दिया. इस घटना से नाराज घरवालों ने उसकी जमानत भी नहीं कराई. इसके बाद बबलू को दो हफ्ते जेल में रहना पड़ा. उसके बाद वाहन चोरी की की वारदातों में बबलू का नाम आ गया. इस बात परेशान होकर बबलू ने अपना घर छोड़ दिया. उसने एक हॉस्टल में रहने के लिए कमरा ले लिया. इसी दौरान वह अन्ना के विरोधी माफिया रामगोपाल मिश्र के सम्पर्क में आ गया और उसके लिए काम करने लगा. यही वो वक्त था जब बबलू ने अपराधी की दुनिया में कदम रख दिया था. अब वह पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहता था.

किडनैपिंग किंग बन गया था बबलू
लॉ की शिक्षा हासिल करने वाला बबलू उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र तक अपनी पकड़ बना चुका था. उसने अंडरवर्ल्ड की दुनिया में अपहरण को तरजीह दी. इस धंधे में उसने कई लोगों को मात दे दी थी. उसके नाम पुलिस ने अपहरण के कई मामले दर्ज किए थे. उसने फिरौती के लिए कई लोगों का अपहरण किया. फिरौती वसूली. अपहरण की धमकी देकर भी कई बड़े लोगों से पैसा वसूल किया. अपहरण की दुनिया में उसके नाम का सिक्का चलने लगा था. छोटे गैंग अपहरण करके 'पकड़' उसे लाकर सौंप देते थे और फिर वह सौदेबाजी करके फिरौती की रकम वसूल करता था. पुलिस उससे कारनामों से परेशान थी. जुर्म की दुनिया में लोग उसे किडनैपिंग किंग कहने लगे थे.

दाऊद से अलग हो गया था बबलूदाऊद इब्राहिम के साथ किया काम
बबलू श्रीवास्तव ने कॉलेज से लॉ की पढ़ाई तो पूरी की लेकिन साथ ही वह अपराध की दुनिया में भी बहुत आगे बढ़ चुका था. 1984 से शुरू हुआ उसका आपराधिक ग्राफ तेजी से बढ़ता जा रहा था. उसके खिलाफ उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में अपहरण, फिरौती, अवैध वसूली और हत्या जैसे संगीन मामले दर्ज होते गए. 1989 में वह पुलिस से बचने के लिए चंद्रास्वामी से मिला. लेकिन उसके साथ बबलू की ज्यादा नहीं बनी. बबूल वहां से नेपाल चला गया और कुछ साल वहां रहने के बाद वह 1992 में दुबई जा पहुंचा. जहां नेपाल के माफिया डॉन और राजनेता मिर्जा दिलशाद बेग ने उसकी मुलाकात अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहीम से कराई.

मुंबई धमाकों के बाद छोड़ा दाऊद का साथ
सिर पर दाऊद का हाथ आ जाने से बबलू श्रीवास्तव की ताकत बढ़ती जा रही थी. उसकी पहचान भारत से बाहर भी होने लगी थी. अब वह तस्करी के मामलों में हाथ आजमा रहा था. सबकुछ ठीक चल रहा था. लेकिन 1993 में अचानक मुंबई एक साथ कई धमाकों से दहल गई. इन धमाकों के पीछे डॉन दाऊद इब्राहिम का नाम आने लगा. इसी दौरान छोटा राजन और बबलू श्रीवास्तव समेत कई लोगों ने डी कंपनी को अलविदा कह दिया. कभी दाऊद के लिए जान देने का मादा रखने वाले छोटा राजन और बबलू श्रीवास्तव अब उसके दुश्मन बन गए थे.
बबलू की किताबएडिशनल कमिश्नर की हत्या में उम्रकैद
यूं तो अपने आपराधिक जीवन में बबलू श्रीवास्तव ने कई ऐसी घटनाओं को अंजाम दिया था जो किसी फिल्म की कहानी से कम नहीं लगती. लेकिन पुणे में एडिशनल पुलिस कमिश्नर एलडी अरोड़ा की हत्या के मामले में बबलू का नाम सुर्खियों में आ गया था. आरोप था कि बबलू और उसके साथी मंगे और सैनी ने सरेआम एडिशनल कमिश्नर अरोड़ा को गोलियों से भून दिया था. इस मामले की सुनवाई करते हुए बबलू और उसके साथियों को अदालत ने दोषी माना. और तीनों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी.

बबलू का अधूरा ख्वाब
कई साल से जेल में बंद बबलू श्रीवास्तव ने ‘अधूरा ख्वाब’ नाम से एक किताब लिखी. जिसमें उसने अपनी जिंदगी की कई घटनाओं का जिक्र किया है. उसमें वे वारदात भी शामिल हैं जिनकी वजह से वह किडनैपिंग किंग कहलाने लगा था. उसने किताब में अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम से मुलाकात और उसके साथ काम करने का जिक्र भी किया है. साथ ही बबलू ने दाऊद से दुश्मनी और गैंगवार को भी किताब में जगह दी है. इस किताब पर आधारित एक फिल्म बनाए जाने की तैयारी थी. जिसमें अभिनेता अरशद वारसी को बबलू का किरदार निभाना था.
कड़ी सुरक्षा के बीच बंद है बबलू
1995 में माफिया डॉन बबलू श्रीवास्तव मॉरिशस में पकड़ा गया था. उसके बाद उसे भारत लाया गया. यहां उसके खिलाफ करीब 60 मामले चल रहे थे. जिसमें से अब केवल चार लंबित हैं. कई मामलों में उसे सजा सुनाई जा चुकी है. इस दौरान कई बार ऐसे मामलों का खुलासा हुआ जिनमें बबलू की जान लेने की साजिश रची गई थी. इन सभी मामलों के पीछे अक्सर डी कंपनी का नाम आया. एक बार पुलिस ने खुलासा किया था कि बबलू की हत्या के लिए बड़ी सुपारी दी गई थी. लेकिन वह बच गया. फिलहाल, वह बरेली की सेंट्रल जेल में बंद है. उसे कड़ी सुरक्षा के बीच रखा गया है. पेशी के लिए बाहर जाने के वक्त उसे बुलैटप्रूफ जैकेट और हैलमेट पहनाकर ले जाया जाता है.
बबलू जेल में बंद है
जेल में ही सुरक्षित है बबलू
अब बबलू श्रीवास्तव जेल में ही खुद को सुरक्षित मानता है. कानूनी जानकारों का मानना है कि उसे पेरोल पर रिहाई मिल सकती है. मगर बबलू ने कभी कोर्ट में पेरोल के लिए पैरवी नहीं की. राजनीति में बबलू की ज्यादा दिलचस्पी नहीं है. अगर वह जेल से छूट जाता तो उसका इरादा फिल्में बनाने का था.

मुख्तार...राजनीति से अपराध तक खुदमुख्तार


मुख्तार अंसारी पिछले दस सालों से जेल में बंद हैं
मुख्तार अंसारी पिछले दस सालों से जेल में बंद हैं
उत्तर प्रदेश की सियासी जमीन पर कई ऐसे नेता उपजे हैं, जिन्होंने इस सूबे की राजनीति को प्रभावित किया है. ऐसे ही प्रभावी नेताओं का गढ़ माना जाता है यूपी का पूर्वांचल. यूं तो पूर्वांचल से कई नेता आए लेकिन एक ऐसा भी नेता इस क्षेत्र से आता है जो अपराध की दुनिया से राजनीति में आकर पूर्वांचल का रॉबिनहुड बन गया. उस बाहुबली नेता का नाम है मुख्तार अंसारी. प्रदेश के माफिया नेताओं में मुख्तार अंसारी का नाम पहले पायदान पर माना जाता है.

कौन हैं मुख्तार अंसारी

मुख्तार अंसारी का जन्म यूपी के गाजीपुर जिले में ही हुआ था. उनके दादा मुख्तार अहमद अंसारी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे. जबकि उनके पिता एक कम्यूनिस्ट नेता थे. राजनीति मुख्तार को विरासत  में मिली. किशोरवस्था से ही मुख्तार निडर और दबंग थे. उन्होंने छात्र राजनीति में कदम रखा और सियासी राह पर चल पड़े. कॉलेज में उन्होंने एक प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतने के अलावा कुछ खास नहीं किया. लेकिन राजनीति विज्ञान के एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर बी.बी. सिंह के मुताबिक वह एक आज्ञाकारी छात्र थे.

विकास के नाम पर बना था गैंग!

1970 में सरकार ने पिछड़े हुए पूर्वांचल के विकास के लिए कई योजनाएं शुरु की. जिसका नतीजा यह हुआ कि इस इलाके में जमीन कब्जा ने को लेकर  दो गैंग उभर कर सामने आए. 1980 में सैदपुर में एक प्लॉट को हासिल करने के लिए साहिब सिंह के नेतृत्व वाले गिरोह का दूसरे गिरोह के साथ जमकर झगड़ा हुआ. यह हिंसक वारदातों की श्रृंखला का एक हिस्सा था. इसी के बाद साहिब सिंह गैंग के ब्रजेश सिंह ने अपना अलग गिरोह बना लिया और 1990 में गाजीपुर जिले के तमाम सरकारी ठेकों पर कब्जा करना शुरु कर दिया. अपने काम को बनाए रखने के लिए बाहुबली मुख्तार अंसारी का इस गिरोह से सामना हुआ. यहीं से ब्रजेश सिंह के साथ इनकी दुश्मनी शुरू हो गई थी.

अपराध की दुनिया में कदम

1988 में पहली बार हत्या के मामले में नाम आया था. हालांकि उनके खिलाफ कोई पुख्ता सबूत पुलिस नहीं जुटा पाई थी. लेकिन इस बात को लेकर वह चर्चाओं में आ गए थे. 1990 का दशक मुख्तार अंसारी के लिए बड़ा अहम था. छात्र राजनीति के बाद जमीनी कारोबार और ठेकों की वजह से वह अपराध की दुनिया में कदम रख चुके थे. पूर्वांचल के मऊ, गाजीपुर, वाराणसी और जौनपुर में उनके नाम का सिक्का चलने लगा था.

राजनीति में पहला कदम और गैंगवार

1995 में मुख्तार अंसारी ने राजनीति की मुख्यधारा में कदम रखा. 1996 में मुख्तार अंसारी पहली बार विधान सभा के लिए चुने गए. उसके बाद से ही उन्होंने ब्रजेश सिंह की सत्ता को हिलाना शुरू कर दिया. 2002 आते आते इन दोनों के गैंग ही पूर्वांचल के सबसे बड़े गिरोह बन गए. इसी दौरान एक दिन ब्रजेश सिंह ने मुख्तार अंसारी के काफिले पर हमला कराया. दोनों तरफ से गोलीबारी हुई इस हमले में मुख्तार के तीन लोग मारे गए. ब्रजेश सिंह इस हमले में घायल हो गया था. उसके मारे जाने की अफवाह थी. इसके बाद बाहुबली मुख्तार अंसारी पूर्वांचल में अकेले गैंग लीडर बनकर उभरे. मुख्तार चौथी बार विधायक हैं.

ब्रजेश सिंह की वापसी

हालांकि बाद में ब्रजेश सिंह जिंदा पाए गए. और फिर से दोनों के बीच झगड़ा शुरू हो गया. अंसारी के राजनीतिक प्रभाव का मुकाबला करने के लिए ब्रजेश सिंह ने भाजपा नेता कृष्णानंद राय के चुनाव अभियान का समर्थन किया. राय ने 2002 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मोहम्मदाबाद से मुख्तार अंसारी के भाई और पांच बार के विधायक अफजल अंसारी को हराया था. बाद में मुख्तार अंसारी ने दावा किया कि कृष्णानंद राय ने ब्रजेश सिंह के गिरोह को सरकारी ठेके दिलाने के लिए अपने राजनीतिक कार्यालय का इस्तेमाल किया और उन्हें खत्म करने की योजना बनाई.

मुस्लिम वोट का सहारा और गिरफ्तारी

मुख्तार अंसारी ने गाजीपुर और मऊ क्षेत्र में चुनाव के दौरान उनकी जीत सुनिश्चित करने के लिए मुस्लिम वोट बैंक का सहारा लिया. उनके विरोधियों को ने जाति के आधार पर विभाजित हिंदू वोटों को एकजुट करने की कोशिश की. इसके बाद पूर्वांचल में कई आपराधिक घटनाएं और सांप्रदायिक हिंसा की वारदात हुई. ऐसे ही एक दंगे के बाद मुख्तार अंसारी पर लोगों को हिंसा के लिए उकसाने के आरोप लगे और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.


कृष्णानंद राय हत्याकांड और आपराधिक मामले

मुख्तार अंसारी जेल में बंद थे. इसी दौरान बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय को उनके 6 अन्य साथियों को सरेआम गोलीमार उनकी हत्या कर दी गई. हमलावरों ने 6 एके-47 राइफलों से 400 से ज्यादा गोलियां चलाई थी. मारे गए सातों लोगों के शरीर से 67 गोलियां बरामद की गई थी. इस हमले का एक महत्वपूर्ण गवाह शशिकांत राय 2006 में रहस्यमई परिस्थितियों में मृत पाया गया था. उसने कृष्णानंद राय के काफिले पर हमला करने वालों में से अंसारी और बजरंगी के निशानेबाजों अंगद राय और गोरा राय को पहचान लिया था. कृष्णानंद राय की हत्या के बाद मुख्तार अंसारी का दुश्मन ब्रजेश सिंह गाजीपुर-मऊ क्षेत्र से भाग निकला था. 2008 में उसे उड़ीसा से गिरफ्तार किया गया था. 2008 में अंसारी को हत्या के एक मामले में एक गवाह धर्मेंद्र सिंह पर हमले का आरोपी बनाया गया था हालांकि बाद में पीड़ित ने एक हलफनामा देकर अंसारी के खिलाफ कार्यवाही रोकने का अनुरोध किया था. 2012 में महाराष्ट्र सरकार ने मुख्तार पर मकोका लगा दिया था. उनके ख़िलाफ़ हत्या, अपहरण, फिरौती सहित जैसे कई आपराधिक मामले दर्ज हैं.

बहुजन समाज पार्टी के साथ सफर

2007 में मुख्तार अंसारी और उनके भाई अफजल बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में शामिल हो गए. उन दोनों को पार्टी आने की इजाजत इसलिए मिली क्योंकि उन्होंने दावा किया था कि वे झूठी 'सामंती व्यवस्था' के खिलाफ लड़ रहे थे और इसी वजह से उन्हें आपराधिक मामलों में फंसाया गया था. उन्होंने किसी आपराधिक गतिविधि में भाग लेने से परहेज करने का वादा भी किया था. बसपा प्रमुख मायावती ने रॉबिनहुड के रूप में मुख्तार अंसारी को प्रस्तुत किया और उन्हें गरीबों का मसीहा भी कहा था. मुख्तार अंसारी ने जेल में रहते हुए बसपा के टिकट पर वाराणसी से 2009 का लोकसभा चुनाव लड़ा मगर वह भाजपा के मुरली मनोहर जोशी से 17,211 मतों के अंतर से हार गए. उन्हें जोशी के 30.52% मतों की तुलना में 27.94% वोट हासिल हुए थे.

बसपा से निष्कासन

2010 में अंसारी पर राम सिंह मौर्य की हत्या का आरोप लगा. मौर्य, मन्नत सिंह नामक एक स्थानीय ठेकेदार की हत्या का गवाह था. जिसे कथित तौर पर 2009 में अंसारी के गिरोह ने मार दिया था. जब पार्टी को अहसास हुआ कि मुख्तार और उनके भाई अब भी आपराधिक गतिविधियों में शामिल हैं तो दोनों भाइयों को 2010 में बसपा से निष्कासित कर दिया गया.

कौमी एकता दल का गठन

बसपा से निष्कासित कर दिए जाने के बाद दोनों भाईयों को अन्य राजनीतिक दलों ने अस्वीकार कर दिया. तब तीनों अंसारी भाइयों मुख्तार, अफजल और सिब्गतुल्लाह ने 2010 में खुद की राजनीतिक पार्टी कौमी एकता दल (QED) का गठन किया. इससे पहले मुख्तार ने हिन्दू-मुस्लिम एकता पार्टी नामक एक संगठन शुरू किया था. जिसका विलय QED में कर दिया गया था. मार्च 2014 में अंसारी ने घोसी के साथ-साथ और वाराणसी से नरेंद्र मोदी के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की थी. हालांकि चुनाव के पहले उन्होंने अपनी उम्मीदवारी वापस लेते हुए कहा था कि उन्होंने धर्मनिरपेक्ष वोट का विभाजन रोकने के लिए ऐसा किया है.

लोग कहते हैं गरीबों का मसीहा

मुख्तार अंसारी विधान सभा सदस्य के तौर पर मिलने वाली विधायक निधि से 20 गुना अधिक पैसा अपने निर्वाचन क्षेत्र में खर्च करते रहे हैं. उन्होंने मऊ और अन्य क्षेत्रों में विकास के कई बड़े काम करवाएं हैं. मुख्तार ने बतौर विधायक क्षेत्र में सड़कों, पुलों, और अस्पतालों के अलावा एक खेल स्टेडियम का निर्माण भी कराया है. साथ ही वे अपनी निधि का 30% निजी और सार्वजनिक स्कूलों और कॉलेजों पर भी खर्च करते आए हैं. पूर्वांचल के एक लेखक गोपाल राय के मुताबिक अंसारी ने व्यक्तिगत रूप से उनके बेटे को एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनाने में कैसे उनकी की मदद की वे कभी नहीं भूल सकते. ऐसे ही एक और आदमी की पत्नी के दिल का ऑपरेशन के लिए उन्होंने सारा पैसा दिया था. मुख्तार अंसारी का पूरा परिवार क्षेत्र में होने वाली गरीबों की बेटियों की शादी के लिए दहेज का पूरा भुगतान करते हैं.

मुख्तार की हत्या के लिए दी गई थी 6 करोड़ की सुपारी

बाहुबली मुख्तार अंसारी की हत्या के लिए एक बड़ी साजिश रची गई थी. जिसका खुलासा 2014 में हुआ. ब्रजेश सिंह ने अंसारी को मारने के लिए लंबू शर्मा को 6 करोड़ रुपये की सुपारी दी थी. ये अहम खुलासा लंबू शर्मा की गिरफ्तारी के बाद हुआ था. इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जेल में अंसारी की सुरक्षा बढ़ा दी गई थी. सुपारी के खुलासे के बाद पूर्वांचल में यूपी पुलिस क्राइम ब्रांच और स्पेशल टास्क फोर्स ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी थी. अभी भी पेशी पर या विधानसभा सत्र के लिए जाते समय मुख्तार की सुरक्षा बहुत कड़ी रखी जाती है.

2005 में किया था आत्मसमर्पण

अंसारी के राजनीतिक कैरियर को कानूनी उथल पुथल ने हिलाकर रख दिया था. अक्टूबर 2005 में मऊ में भड़क हिंसा के बाद उन पर कई आरोप लगे. जिन्हें खारिज कर दिया गया था. उसी दौरान उन्होंने गाजीपुर पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था. वे तभी से जेल में बंद हैं. पहले उन्हें गाजीपुर से मथुरा जेल भेजा गया था. लेकिन बाद में उन्हें आगरा जेल में भेज दिया गया था. वे तब से आगरा जेल में ही बंद हैं. लेकिन पूर्वांचल में उनका प्रभाव कम नहीं है.

चुनाव और जीत

मुख्तार अंसारी ने दो बार बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और दो बार निर्दलीय. उन्होंने जेल से ही तीन चुनाव लड़े हैं. पिछला चुनाव उन्होंने 2012 में कौमी एकता दल से लड़ा और विधायक बने. वह लगातार चौथी बार विधायक हैं. पूर्वांचल में उनका काम उनके भाई और बेटे संभाल रहे हैं. उनकी राजनीतिक विरासत को भी उनके बेटे आगे बढ़ा रहे हैं.

श्री प्रकाश शुक्ला...चेहरा नहीं नाम का था खौफ किया एके ४७ का प्रयोग


उत्तर प्रदेश के कई ऐसे माफिया रहे हैं, जिनका नाम अंडरवर्ल्ड से जुड़ा रहा है. लेकिन इनमें एक नाम ऐसा भी था जो यूपी में आतंक और खौफ का दूसरा नाम बन गया था. जो 90 के दशक में यूपी का सबसे बड़ा डॉन बन गया था. जिसके नाम से जनता ही नहीं बल्कि पुलिस और नेता भी थरथर कांपने लगते थे. अखबारों के पन्ने हर रोज उसी की सुर्खियों से रंगे होते थे. हम बात कर रहे हैं यूपी के सबसे खतरनाक माफिया डॉन श्रीप्रकाश शुक्‍ला की. जिसने देश के सबसे बड़े सूबे में कायम कर दिया था आतंक का राज.
कौन है श्रीप्रकाश शुक्ला
श्रीप्रकाश शुक्ला का जन्म गोरखपुर के ममखोर गांव में हुआ था. उसके पिता एक स्कूल में शिक्षक थे. वह अपने गांव का मशहूर पहलवान हुआ करता था. साल 1993 में श्रीप्रकाश शुक्ला ने उसकी बहन को देखकर सीटी बजाने वाले राकेश तिवारी नामक एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी. 20 साल के युवक श्रीप्रकाश के जीवन का यह पहला जुर्म था. इसके बाद उसने पलट कर नहीं देखा और वो जरायम की दुनिया में आगे बढ़ता चला गया.
श्रीप्रकाश
बैंकॉक भाग गया था शुक्ला
अपने गांव में राकेश की हत्या करने के बाद पुलिस शुक्ला की तलाश कर रही थी. मामले की गंभीरता को समझते हुए श्रीप्रकाश ने देश छोड़ना ही बेहतर समझा. और वह किसी तरह से भाग कर बैंकॉक चला गया. वह काफी दिनों तक वहां रहा लेकिन जब वह लौट कर आया तो उसने अपराध की दुनिया में ही ठिकाना बनाने का मन बना लिया था.
सूरजभान गैंग में शामिल हुआ था श्रीप्रकाश
श्रीप्रकाश शुक्ला हत्या के मामले में वांछित था. पुलिस यहां उसकी तलाश कर रही थी और वह बैंकॉक में खुले आम घूम रहा था. लेकिन पैसे की तंगी के चलते वह ज्यादा दिन वहां नहीं रह सका. और वह भारत लौट आया. आने के बाद उसने मोकामा, बिहार का रुख किया और सूबे के सूरजभान गैंग में शामिल हो गया.

शाही की हत्या से उछला नाम
बाहुबली बनकर श्रीप्रकाश शुक्ला अब जुर्म की दुनिया में नाम कमा रहा था. इसी दौरान उसने 1997 में राजनेता और कुख्यात अपराधी वीरेन्द्र शाही की लखनऊ में हत्या कर दी. माना जाता है कि शाही के विरोधी हरि शंकर तिवारी करे इशारे पर यह सब हुआ था. वह चिल्लुपार विधानसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहता था. इसके बाद एक एक करके न जाने कितने ही हत्या, अपहरण, अवैध वसूली और धमकी के मामले श्रीप्रकाश शुक्ला के नाम लिखे गए.

रेलवे ठेकों पर था एक छत्र राज
श्रीप्रकाश शुक्ला पुलिस की पहुंच से बाहर था. उसका नाम उससे भी बड़ा बनता जा रहा था. यूपी पुलिस हैरान-परेशान थी. नाम पता था लेकिन उसकी कोई तस्‍वीर पुलिस के पास नहीं थी. कारोबारियों से उगाही, किडनैपिंग, कत्ल, डकैती, पूरब से लेकर पश्चिम तक रेलवे के ठेके पर एकछत्र राज. बस यही उसका पेशा था. और इसके बीच जो भी आया उसने उसे मारने में जरा भी देरी नहीं की. लिहाजा लोग तो लोग पुलिस तक उससे डरती थी.
शुक्ला को पकड़ने के लिए बनी थी एसटीएफ
श्रीप्रकाश के ताबड़तोड़ अपराध सरकार और पुलिस के लिए सिरदर्द बन चुके थे. सरकार ने उसके खात्मे का मन बना लिया था. लखनऊ सचिवालय में यूपी के मुख्‍यमंत्री, गृहमंत्री और डीजीपी की एक बैठक हुई. इसमें अपराधियों से निपटने के लिए स्‍पेशल फोर्स बनाने की योजना तैयार हुई. 4 मई 1998 को यूपी पुलिस के तत्‍कालीन एडीजी अजयराज शर्मा ने राज्य पुलिस के बेहतरीन 50 जवानों को छांट कर स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) बनाई. इस फोर्स का पहला टास्क था- श्रीप्रकाश शुक्ला, जिंदा या मुर्दा.

पुलिस के साथ पहली मुठभेड़
श्रीप्रकाश के साथ पुलिस का पहला एनकाउंटर 9 सितंबर 1997 को हुआ. पुलिस को खबर मिली कि श्रीप्रकाश अपने तीन साथियों के साथ सैलून में बाल कटवाने लखनऊ के जनपथ मार्केट में आने वाला था. पुलिस ने चारों तरफ घेराबंदी कर दी. लेकिन यह ऑपरेशन ना सिर्फ फेल हो गया बल्कि पुलिस का एक जवान भी शहीद हो गया. इस एनकाउंटर के बाद श्रीप्रकाश शुक्ला की दहशत पूरे यूपी में और ज्यादा बढ़ गई.

मुश्किल से पुलिस को मिली थी तस्वीर
सादी वर्दी में तैनात एके 47 से लैस एसटीएफ के जवानों ने लखनऊ से गाजियाबाद, गाजियाबाद से बिहार, कलकत्ता, जयपुर तक छापेमारी तब जाकर श्रीप्रकाश शुक्‍ला की तस्‍वीर पुलिस के हाथ लगी. इधर, एसटीएफ श्रीप्रकाश की खाक छान रही थी और उधर श्रीप्रकाश शुक्ला अपने करियर की सबसे बड़ी वारदात को अंजाम देने यूपी से निकल कर पटना पहुंच चुका था.
पटना में किया था मंत्री का मर्डर
श्रीप्रकाश शुक्‍ला ने 13 जून 1998 को पटना स्थित इंदिरा गांधी हॉस्पिटल के बाहर बिहार सरकार के तत्‍कालीन मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की गोली मारकर हत्‍या कर दी. मंत्री की हत्‍या उस वक्‍त की गई जब उनके साथ सिक्‍योरिटी गार्ड मौजूद थे. वो अपनी लाल बत्ती की कार से उतरे ही थे कि एके 47 से लैस 4 बदमाशों ने उनपर फायरिंग शुरु कर दी और वहां से फरार हो गए.
कल्याण सिंह
मुख्यमंत्री की सुपारी के बहाने मौत
इस कत्ल के साथ ही श्रीप्रकाश ने साफ कर दिया था कि अब पूरब से पश्चिम तक रेलवे के ठेकों पर उसी का एक छत्र राज है. बिहार के मंत्री के कत्ल का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि  श्रीप्रकाश शुक्ला ने यूपी के तत्‍कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सुपारी खबर मिली जिससे पुलिस के हाथ-पांव फूल गए. 6 करोड़ रुपये में सीएम की सुपारी लेने की खबर एसटीएफ के लिए बम गिरने जैसी थी. यह आेढार्इ कहानी थी असल कहानी यह थी एक एक रसूखदार मंत्री की कन्या से श्री प्रकाश शुक्ला का प्रेमलाप था आैर दूसरा हरिशंकर तिवारी के विधानसभा पर कब्जे का एलान. सीएम को मारने का कोर्इ कारण नहीं था.
मोबाइल सर्विलांस का इस्तेमाल
एसटीएफ हरकत में आई और उसने तय भी कर लिया कि अब किसी भी हालत में श्रीप्रकाश शुक्‍ला का पकड़ा जाना जरूरी है. एसटीएफ को पता चला कि श्रीप्रकाश दिल्‍ली में अपनी किसी गर्लफ्रेंड से मोबाइल पर बातें करता है. एसटीएफ ने उसके मोबाइल को सर्विलांस पर ले लिया. लेकिन श्रीप्रकाश को शक हो गया. उसने मोबाइल की जगह पीसीओ से बात करना शुरू कर दिया. लेकिन उसे यह नहीं पता था कि पुलिस ने उसकी गर्लफ्रेंड के नंबर को भी सर्विलांस पर रखा है. सर्विलांस से पता चला कि जिस पीसीओ से श्रीप्रकाश कॉल कर रहा है, वो गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके में है. खबर मिलते ही यूपी एसटीएफ की टीम फौरन लोकेशन की तरफ रवाना हो जाती है.
एनकाउंटर
ऐसे मारा गया था श्रीप्रकाश शुक्ला
23 सितंबर 1998 को एसटीएफ के प्रभारी अरुण कुमार को खबर मिलती है कि श्रीप्रकाश शुक्‍ला दिल्‍ली से गाजियाबाद की तरफ आ रहा है. श्रीप्रकाश शुक्‍ला की कार जैसे ही वसुंधरा इन्क्लेव पार करती है, अरुण कुमार सहित एसटीएफ की टीम उसका पीछा शुरू कर देती है. उस वक्‍त श्रीप्रकाश शुक्ला को जरा भी शक नहीं हुआ था कि एसटीएफ उसका पीछा कर रही है. उसकी कार जैसे ही इंदिरापुरम के सुनसान इलाके में दाखिल हुई, मौका मिलते ही एसटीएफ की टीम ने अचानक श्रीप्रकाश की कार को ओवरटेक कर उसका रास्ता रोक दिया. पुलिस ने पहले श्रीप्रकाश को सरेंडर करने को कहा लेकिन वो नहीं माना और फायरिंग शुरू कर दी. पुलिस की जवाबी फायरिंग में श्रीप्रकाश शुक्ला मारा गया. और इस तरह से यूपी के सबसे बड़े डॉन की कहानी खत्म हुई.

कई नेताओं और पुलिसवालों से थी दोस्ती
श्रीप्रकाश शुक्ला की मौत के बाद एसटीएफ को जांच में पता चला कि कई नेताओं और पुलिस के आला अधिकारियों से उसके शुक्ला की दोस्ती थी. कई पुलिस वाले उसके लिए खबरी का काम करते थे. जिसकी एवज में उन्हें श्रीप्रकाश से पैसा मिलता था. कई नेता और मंत्री भी उसके सहयोगी थे. यूपी के एक मंत्री का नाम तो उसके साथ कई बार जोड़ा गया था. वह तत्कालीन मंत्री अमरमणि त्रिपाठी अब जेल में बंद है. इस मामले में कई अधिकारियों और नेताओं की खुफिया जांच पड़ताल भी की गई थी.
पुलिस ने खर्चे किए थे एक करोड़
माफिया डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला अपने पास हर वक्त एके47 राइफल रखता था. पुलिस रिकार्ड के मुताबिक श्रीप्रकाश के खात्मे के लिए पुलिस ने जो अभियान चलाया. उस पर लगभग एक करोड़ रुपये खर्च हुए थे. यह अपने आप में इस तरह का पहला मामला था, जब पुलिस ने किसी अपराधी को पकड़ने के लिए इतनी बड़ी रकम खर्च की थी. उस वक्त सर्विलांस का इस्तेमाल किया जाना भी काफी महंगा था. इसे अभी तक का सबसे खर्चीला पुलिस मिशन कहा जा सकता है.

हाजी मस्तान...बिना गोलीबारी का डान


जेपी से मिलने के बाद हाजी मस्तान की जिंदगी बदल गई थी
जेपी से मिलने के बाद हाजी मस्तान की जिंदगी बदल गई थी

मुंबई में कई माफिया डॉन वजूद में आए, लेकिन एक नाम ऐसा भी है जिसने मुंबई अंडरवर्ल्ड को एक नई पहचान दी और ग्लैमर को अंडरवर्ल्ड के साथ लाकर खड़ा कर दिया. वो नाम था बाहुबली माफिया तस्कर हाजी मस्तान का. जो मुंबई का पहला अंडरवर्ल्ड डॉन कहलाया.

मस्तान मिर्जा

कौन था हाजी मस्तान
हाजी मस्तान मिर्जा का जन्म तमिलनाडु के कुड्डलोर में 1मार्च 1926 को हुआ था.  उसके पिता हैदर मिर्जा एक गरीब किसान थे. उनका परिवार आर्थिक रूप से काफी कमजोर था. कई बार घर में खाने के लिए भी पैसे नहीं होते थे. घर का गुजारा बड़ी मुश्किल से होता था. इसी परेशानी में हैदर नए काम के लिए शहर जाना चाहते थे. लेकिन घर की परेशानी की वजह से वो घर नहीं छोड़ पाते थे.
1934 में मुंबई आया मिर्जा परिवार
हैदर मिर्जा के घर में हालात बहुत खराब थे. दो दिन तक घर में खाना नहीं बना था. तब हैदर मिर्जा ने आखिरकार बाहर जाकर पैसा कमाने का मन बनाया. 1934 में वह अपने बेटे मस्तान मिर्जा को साथ लेकर मुंबई आ गए. वहां उन्होंने कई काम किए मगर कामयाबी नहीं मिली. उसके बाद उन्होंने क्रॉफर्ड मार्केट के पास बंगाली टोला में साइकिल रिपेयरिंग की दुकान खोली. दुकान खोले काफी वक्त बीत चुका था लेकिन कोई खास कमाई नहीं हो रही थी. दुकान पर खाली बैठा 8 साल का मस्तान सड़क से आने जाने वाली शानदार गाड़ियों और आलीशान इमारतों को देखता रहता था. वहीं से उसने उन गाड़ियों और बंगलों को अपना बनाने का सपना संजोया था.


डॉक पर मिला कुली का काम
मुंबई आए हुए उन्हें दस साल बीत चुके थे. हालात अभी भी पहले से बेहतर नहीं थे. इसी बीच मस्तान की मुलाकात मुंबई में ग़ालिब शेख नाम के एक शख्स से हुई. उसे एक तेजतर्रार लड़के की ज़रूरत थी. उसने मस्तान को बताया कि अगर वह डॉक पर कुली बन जाए तो वह अपने कपड़ों और थैले में कुछ खास सामान छिपाकर आसानी से बाहर ला सकता है. जिसके बदले उसे पैसा मिलेगा. इसके बाद मस्तान ने 1944 में डॉक में कुली के तौर पर काम करना शुरू कर दिया. वह मन लगाकर काम करने लगा था. इस दौरान वहां डॉक पर काम करने वालों से मस्तान ने दोस्ती करना शुरू कर दिया. वो वहां आने जाने वालों से भी दुआ सलाम करने लगा था.
हाजी मस्तान एक खेत
जुर्म की दुनिया में पहला कदम
दरअसल, चालीस के दशक में विदेश से जो लोग इलेक्ट्रॉनिक सामान, महंगी घड़ियां या सोना, चांदी और गहने लेकर आते थे. उन्हें उस सामान पर टैक्स की शक्ल में बड़ी रकम अदा करनी पड़ती थी. यही वजह थी कि डॉक पर तस्करी करना एक फायदे का सौदा था. गालिब की बात मस्तान की समझ में आ चुकी थी. उसने इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया. और गुपचुप तरीके से वह तस्करों की मदद करने लगा. तस्कर विदेशों से सोने के बिस्किट और अन्य सामान लाकर मस्तान को देते थे और वह उसे अपने कपड़ों और थैले में छिपाकर डॉक से बाहर ले जाता था. कुली होने के नाते कोई उस पर शक भी नहीं करता था. इस काम की एवज में मस्तान को अच्छा पैसा मिलने लगा था.

तस्कर बन गया था मस्तान
डॉक पर काम काम करते करते मस्तान की जिंदगी बेहतर होने लगी थी. तस्करों की मदद करने से उसे खासा फायदा हो रहा था. 1950 का दशक मस्तान मिर्जा के लिए मिल का पत्थर साबित हुआ. 1956 में दमन और गुजरात का कुख्यात तस्कर सुकुर नारायण बखिया उसके संपर्क में आ गया. दोनों के बीच दोस्ती हो गई. दोनों साथ मिलकर काम करने लगे. उस वक्त सोने के बिस्किट, फिलिप्स के ट्रांजिस्टर और ब्रांडेड घड़ियों की बहुत मांग थी. मगर टैक्स की वजह से भारत में इस तरह का सामान लाना बहुत महंगा पड़ता था. लिहाजा दोनों ने मिलकर दुबई और एडेन इस सामान की तस्करी शुरू की. जिसमें दोनों को खासा मुनाफा हो रहा था. दोनों का काम बढ़ता गया और मस्तान की जिंदगी भी अब बदल चुकी थी. मामूली सा कुली मस्तान अब बाहुबली माफिया मस्तान भाई बन चुका था.
हाजी मस्तान अपने ऑफिस में
जुर्म का दुनिया का बड़ा नाम
यूं तो पहले मुंबई में वरदराजन मुदलियार उर्फ़ वर्धा का नाम चलता था. लेकिन वह माफिया डॉन जैसी छवि नहीं बना पाया था. कुछ समय बाद वर्धा वापस चेन्नई चला गया. अब मुंबई अंडरवर्ल्ड की दुनिया में सिर्फ एक नाम था मस्तान भाई यानी हाजी मस्तान. 1970 का दशक आते-आते मस्तान मुंबई में अपनी अलग पैठ बना चुका था. उसने दस साल के भीरत मुंबई में एक बड़ा मुकाम हासिल कर लिया था. समुंद्र में उसका राज चलने लगा था. मस्तान जैसा बनना चाहता था, वह उससे ज्यादा ही बन गया था. अब वो अमीर भी था और ताकतवर भी. उसे सफेद डिजाइनर सूट पहनने और मर्सिडीज की सवारी करने का बहुत शौक था. उसके हाथ में हमेशा विदेशी सिगरेट और सिगार दिखाई देते थे. ऐशोआराम उसकी जिंदगी का शगल बन गया था.
सोना से की थी शादी     बॉलीवुड से था लगाव  मुंबई अंडरवर्ल्ड के राजा कहे जाने वाले हाजी मस्तान मिर्जा का बॉलीवुड से बेहद लगाव था. मुंबई के पुराने लोग बताते हैं कि हाजी मस्तान बॉलीवुड अभिनेत्री मधुबाला का दिवाना था. वह उससे शादी करना चाहता था. मगर हालात के चलते ऐसा नहीं हो सका. फिर मधुबाला जैसी दिखने वाली फिल्म अभिनेत्री सोना मस्तान को भा गई और उसी के साथ मस्तान ने शादी की. मस्तान ने सोना के लिए कई फिल्मों में पैसा लगाया. लेकिन उनकी फिल्में नहीं चल सकी. बताते हैं कि दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, राज कपूर, धमेंद्र, फिरोज खान और संजीव कुमार जैसे बॉलीवुड सितारों से हाजी मस्तान की दोस्ती थी. कई बड़ी बॉलीवुड हस्तियां अक्सर उनके बंगले पर दिखाई देती थी.
पहली गिरफ्तारी और पुलिस नतमस्तक
मुबंई में हाजी मस्तान मिर्जा का नाम इतना बड़ा बन चुका था कि पुलिस और कानून उसके लिए कोई मायने नहीं रखता था. 1974 में जब पुलिस ने पहली बार हाजी मस्तान को गिरफ्तार किया तो उसे एक वीआईपी की तरह तमाम सुविधाएं दी गई थी. उसे हवालात में न रखकर एक बंगले में नजरबंद रखा गया था. खाने के लिए बेहतरीन इंतजाम किए गए थे. उसकी खातिरदारी के लिए हर उस ज़रूरत का ख्याल रखा गया था, जिसकी मस्तान को चाह थी. पुलिस वाले भी उसे सलाम करते थे. मस्तान भी पुलिस वालों के काम आता था. उन्हें महंगे उपहार देना उसकी आदत में शामिल था. और अगर कोई अफसर उसका कहा नहीं मानता था तो वह उसका तबादला करा देता था.


इंदिरा गांधी ने भेजा था जेल
देश में आपातकाल लगने से पहले की बात है. देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी मस्तान की ख़बरें मिलती रहती थी. मस्तान के बढ़ते प्रभाव से इंदिरा भी परेशान थीं. उनके आदेश पर मस्तान मिर्जा को उस वक्त पुलिस ने गिरफ्तार करने की कोशिश की मगर वो पकड़ में नहीं आया. लेकिन आपातकाल लगने के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया. और यह पहला मौका था जब हाजी मस्तान को बाकायदा जेल जाना पड़ा था. बस यहीं से मस्तान की जिंदगी बदलने वाली थी. जेल में मस्तान की मुलाकात जेपी से हुई. उनके संपर्क में आने के बाद मस्तान पर खासा प्रभाव पड़ा. जब 18 महीने जेल में रहने के बाद हाजी मस्तान बाहर आया तो उसके इरादे बदल चुके थे. उसने जुर्म की दुनिया को अलविदा कहने का मन बना लिया था.
इंदिरा को ऑफर की थी बड़ी रकम
आपातकाल के दौरान जेल जाने के कुछ दिन बाद ही हाजी मस्तान ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अपनी रिहाई के लिए बड़ी रकम ऑफर की थी. लेकिन इंदिरा ने उसके ऑफर को ठुकरा दिया था. आपातकाल के बाद जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो हाजी मस्तान सहित करीब चालीस बड़े तस्करों को माफी मिल गई थी. दरअसल, इमरजेंसी लगने से पहले मस्तान ने कई नेताओं को पुलिस से बचाने और भागने में मदद की थी. इसलिए जनता पार्टी की सरकार ने उसके प्रति नरम रवैया अपनाया था.
सियासी मंच पर मस्तानराजनीति में एंट्री
आखिरकार, 1980 में हाजी मस्तान ने जरायम की दुनिया को अलविदा कहकर राजनीति का रुख कर लिया. 1984 में महाराष्ट्र के दलित नेता जोगिन्दर कावड़े के साथ मिलकर खुद की पार्टी दलित-मुस्लिम सुरक्षा महासंघ बनाई. आगे चलकर 1990 में इसका नाम बदल कर भारतीय अल्पसंख्यक महासंघ कर दिया गया था. बॉलीवुड के सुपर स्टॉर दिलीप कुमार ने इस सियासी पार्टी का खूब प्रचार किया. वे पार्टी के कई कार्यक्रमों में दिखाई देते थे. हाजी मस्तान की इस पार्टी ने बाद में मुंबई, कोलकाता और मद्रास के निकाय चुनाव में भागीदारी की. बताया जाता है कि चुनाव में भले ही पार्टी को कामयाबी नहीं मिली लेकिन इस चुनाव में काले धन का जमकर इस्तेमाल हुआ था. वहीं से चुनाव में भारी पैसा खर्च करने का शगल शुरू हुआ था.
न चलाई गोली, न ली किसी जान
हाजी मस्तान मुंबई अंडरवर्ल्ड का सबसे ताकतवर डॉन था. लेकिन इस शक्तशाली डॉन ने अपनी पूरी जिंदगी में किसी की जान नहीं ली. किसी पर हमला नहीं किया. यहां तक कि एक भी गोली नहीं चलाई. बावजूद इसके हाजी मस्तान जुर्म की काली दुनिया में सबसे बड़ा नाम था. उस दौर में उसके नाम की तूती मुंबई ही नहीं बल्कि पूरे महाराष्ट्र में बोलती थी. हाजी मस्तान जिंदगीभर मुंबई में लोगों की मदद भी करता रहा. उसने अपना आखरी वक्त अपने परिवार के साथ बिताया जिसमें पत्नी और उसका गोद लिया बेटा शामिल था. और 1994 में हार्ट अटैक से हाजी मस्तान की मौत हो गई थी. आज भी मुंबई में उसके किस्से सुनने को मिल जाते हैं.

ब्रजेश के बहाने वर्चस्व की कहानी...

जयपुर. पूर्वांचल की तासीर से जो नावाकिफ हैं, उन्हें यह घटना नागवार गुजरेगी लेकिन यहां खून से ही चिराग जलते हैं. जलवा, जलाल का ख्याल तो अब अपराध में आया है  वर्चस्व की जंग में गोरखपुर से कानपुर, फैजाबाद से इलाहाबाद यहां तक की राजधानी लखनउ तो इनका तकिया बन गर्इ फिर चाहे हरिशंकर तिवारी की बात हो या फिर ब्रजेश सिंह की.लखनउ पहुंचने की चाह में श्रीप्रकाश शुक्ला ने गलत गलियारा चुना.उसी ने उसे हमेशा लिए सुला दिया लेकिन इसकी शुरुआत की थी हरिशंकर तिवारी चिल्लुपार क्षेत्र से सत्तर के दशक में पहली बार देश में एक एेसा माफिया निकला जो जेल से जीत कर जेल के नियम बनाने वाली तख्त पर बैठ गया ।आैर इसके बाद शुरू हुआ सिलसिला ब्रजेश सिंह तक आ पहुंचा है.
हरिशंकर तिवारी : माफिया के पितामह
दाउद जैसे अपराधी जिस समय गुनाह का ए, बी, सी, डी सीख रहे थे, उस समय उत्तर प्रदेश में हरिशंकर तिवारी अपना साम्राज्य स्थापित कर चुके थे। हरिशंकर के बाहुबल का डंका विदेशों तक बजता था। स्व. वीरेंद्र शाही और हरिशंकर तिवारी के बीच होने वाली गैंगवार अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में छाई रहती थी। तिवारी ने उत्तर प्रदेश, बिहार और पड़ोसी देश नेपाल तक अपना साम्राज्य बढ़ा लिया था। गोरखपुर के बुजुर्ग बताते हैं कि तिवारी ने ऐसे लोगों की टीम बना रखी थी, जो उनके एक इशारे पर बिना कुछ सोचे-समझे कुछ भी करने पर उतारू रहते थे। आज भी उनका जलवा कम नहीं हुआ है। आम आदमी हो या फिर माफिया, दोनों ही इनसे बचकर रहना पसंद करते हैं।पहली बार जेल से चुनाव जीतने वाले देश के पहले शख्स बने.
76 साल के तिवारी छात्र जीवन में गोरखपुर शहर में किराए के एक कमरे में रहते थे, लेकिन आज जटाशंकर मुहल्ले में उनके किलेनुमा निवास को ‘हाता’ के नाम से जाना जाता है। वे 3 बार निर्दलीय विधायक रहे। 2 बार कांग्रेस के टिकट पर जीते और एक बार तिवारी कांग्रेस से भी जीते। अब पूरी तरह राजनीति को समिर्पत हैं। एक बेटा कुशल उर्फ भीष्म तिवारी खलीलाबाद से बसपा सांसद हैं। दूसरा विनय तिवारी अभी राजनीतिक पारी शुरू कर रहा है। भांजा गणेश शंकर विधान परिषद् अध्यक्ष है,  वहीं तिवारी जब से राजनीति में आए, उनका रसूख हमेशा बरकरार रहा। सरकार किसी की भी बने, मंत्री पद मिलना तय रहता। एकाध बार माफिया मंत्री के नाम पर काफी हो हल्ला भी मचा, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। तिवारी मंत्री की कुर्सी पर कायम रहे। सन 1998 में कल्याण सिंह द्वारा बसपा को तोड़कर बनाई सरकार में साइंस और टेक्नोलॉजी मंत्री रहे। वर्ष 2000 में राम प्रकाश गुप्त की भाजपा सरकार में स्टांप रजिस्ट्रेशन मंत्री बने। इसके बाद 2001 में राजनाथ सिंह की भाजपा सरकार बनी, तब भी हरिशंकर तिवारी की मंत्री की कुर्सी कायम रही। 2002 में मायावती की बसपा सरकार में भी वे मंत्रिमंडल के सदस्य बने रहे। उसके बाद 2003-07 तक मुलायम सिंह यादव की सरकार में भी तिवारी मंत्री रहे। उनका कोई बाल नहीं बांका कर सका और आज भी यूपी में तिवारी माफिया के पितामाह कहे जाते हैं।
अतीक अहमद : अपराध में अव्वल
पढ़ाई में फिसड्डी, क्राइम में अव्वल! अतीक अहमद की आज यही पहचान बन चुकी है। इलाहाबाद व फूलपुर से नेहरू, लोहिया, लालबहादुर शास्त्री एवं विश्वनाथ प्रताप सिंह ने रहनुमाई भले ही की हो मगर आज यह क्षेत्र इलाहाबाद में दहशत का दूसरा नाम अतीक अहमद माना जाता है। जुर्म की दुनिया में अपने नाम का डंका बजाने के बाद अतीक प्रदेश की राजनीति में ढोल बजाने लगे। इलाहाबाद में बसपा विधायक राजू पाल की हत्या का आरोप लगा और वह जेल पहुंच गए। इनके खिलाफ हत्या, लूट और रंगदारी के करीब 35 मामले दर्ज हैं। इलाहाबाद की नगर पश्चिमी सीट से लगातार चार बार विधायक रहे अतीक ने आपने छोटे भाई अशरफ को समाजवादी पार्टी की साइकिल पर चढ़ाकर यह सीट उसे दे दी और खुद फूलपुर संसदीय सीट से लोकसभ चुनाव लड़ा।
अतीक के आतंक से ऊबे मतदाताओं ने नवंबर 2004 में हुए प्रदेश विधानसभी चुनाव में बसपा के राजू पाल को जिता दिया। राजू पाल भी अपराधी प्रवृत्ति का था। जनता को लगा कि अतीक से अच्छा है छोटे अपराधी को जिता दिया जाए, लेकिन उन्हें क्या पता था कि अतीक क्या कर सकता है। आरोप है कि अतीक अहमद और उसके छोटे भाई अशरफ ने मिलकर साजिश रची और राजू पाल की हत्या करवा दी। सपा के शासन में ही यह घटना हुई थी। ऐसे में पार्टी के ही बाहुबली सांसद और उसके छोटे भाई के खिलाफ कोई कार्रवाई कैसे हो सकती थी। बसपा सरकार बनी, तो माया ने अतीक को उसकी हैसियत याद दिला दी। फिलहाल आज भी अतीक के रसूख में कोई कमी नहीं आई है।
ब्रजेश सिंह : अपराध सुप्रीमो

उड़ीसा में गिरफ्तार ब्रजेश सिंह को पूर्वांचल ही नहीं देश के कई राज्यों में संगठित अपराध का सुप्रीमो माना जाता है। भुवनेश्वर में पहचान छिपाकर रियल स्टेट का कारोबार चलाता था यह डॉन। वहीं के बिग बाजार के बाहर से गिरफ्तार हुए ब्रजेश सिंह पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने पांच लाख रु पये का इनाम घोषित कर रखा था। हैरानी इस बात की है कि करीब 20 वर्षों तक किसी ने भी इसकी शक्ल नहीं देखी। इस डॉन की गिरफ़्तारी भी बड़े नाटकीय ढंग से हुई और उसमें भी सियासत की बू आती है, लेकिन गायब रहकर भी पूर्वी उत्तर प्रदेश में ब्रजेश सिंह का आतंक इतना रहा कि पूरे इलाके में रेलवे और दूसरे सरकारी ठेकों से लेकर कोयले तक की दलाली में इसका सिक्का चलता था। गायब रहते हुए भी ब्रजेश ने राजनीतिक संरक्षण के रास्ते तलाश लिए थे। भाई चुलबुल सिंह को बीजेपी में लगाया। भतीजा विधायक बन चुका है, लेकिन वर्तमान समय में ब्रजेश गैंग के अधिकतर बड़े अपराधियों की या तो हत्या हो चुकी है या फिर वो किसी न किसी नेता के संरक्षण में अपना काम चला रहे हैं।
ब्रजेश को सबसे बड़ा आघात तब लगा, जब उसके सबसे खास अवधेश राय का मर्डर हो गया। अवधेश के छोटे भाई अजय राय ने विधायक बनने के बाद शांति धारण कर ली। बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय को ब्रजेश का मुंशी कहा जाता था और वही अघोषित तौर पर ब्रजेश गिरोह को चलाते थे। बाद में आरोप है कि पूर्वांचल के एक और माफिया मुख्तार अंसारी ने अपने शूटर मुन्ना बजरंगी से कृष्णानंद राय की हत्या करवा दी।
ब्रजेश के अपराधी जीवन का आरंभ आजमगढ़ की बाजार में पिता की हत्या होने के बाद हुआ। इलाके के दबंग ठाकुरों ने ब्रजेश के पिता का शरीर चाकू और गोलियों से छलनी कर दिया था। ब्रजेश ने पहले पिता की हत्या का बदला लिया, फिर बिहार में ब्रजेश सिंह और वीरेंद्र टाटा ने अपना कॉकस बना लिया। चंदौसी से बोकारो और जमशेदपुर तक इसकी तूती बोलती थी। कोयले की उगाही के साथ ही रेलवे, पीडब्ल्यूडी और दूसरे सरकारी विभागों की ठेकेदारी इन लोगों की कमाई का मुख्य जरिया था। ब्रजेश ने जेजे अस्पताल मुंबई में दाउद इब्रहिम के बहनोई पारकर की हत्या का बदला इस तरह लिया कि देश कांप उठा था। ब्रजेश के सबसे खास साथी वीरेंद्र टाटा की हत्या बनारस से मीरजापुर के रास्ते में श्रीप्रकाश शुक्ल गैंग ने कर दी थी। उसके बाद से यह माफिया अंडरग्राउंड हो अपनी गतिविधियां चला रहा था। अब जेल से हाेते हुए एमएलसी बन चुका है
 धनंजय सिंह : जेल से चलता है खेल

लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र नेता रहे धनंजय सिंह वर्तमान में बसपा से जौनपुर से सांसद हैं। इनके खिलाफ हत्या, लूट और रंगदारी जैसे कई मामले दर्ज हैं। लखनऊ के इलाकाई माफिया अरुण शंकर शुक्ल उर्फअन्ना और अंबेडकर नगर के माफिया अभय सिंह के दोस्त रहे हैं धनंजय सिंह। बाद में ये तीनों अलग हो गए। धनंजय की दोनों दोस्तों से आगे निकलने की भी रोचक दास्तान है। एक पुलिस मुठभेड़ के बाद पुलिस ने दावा किया कि धनंजय सिंह मारा गया, लेकिन कुछ दिन बाद धनंजय सामने आया और आरोप लगाया कि उप्र पुलिस उसे जान से मार देना चाहती है। इसके बाद धनंजय सिंह नेताओं का दुलारा बन गया। विधानसभा चुनाव में उतरा और जीत गया।
लेकिन विधायक बनने के बाद भी धनंजय सिंह का आचरण नहीं बदला। उस पर अपने परम मित्र अरुण उपाध्याय के भाई की हत्या का आरोप लगा, जिसका शव मीरजापुर से बरामद हुआ था। उसी समय अरुण ने कसम खाई कि जब तक इस हत्या का बदला नहीं ले लिया जाएगा, वह अपने भाई की तेरहवीं नहीं करेगा। पिछले लोकसभा चुनाव में इंडियन जस्टिस पार्टी के प्रत्याशी की लाश एक पेड़ से लटकी मिली। इस मामले का भी आरोपी रहा धनंजय। बाद में अदालत से वह इस मामले में बरी कर दिया गया। एक और दोस्त अतुल सिंह के साथ भी धनंजय का विवाद हुआ। इलाके के लोग आज भी इतना डरते हैं कि कोई धनंजय सिंह के खिलाफ बगावत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। पुलिस भी जो कभी इनका पीछा करती थी, आज सलाम करती है। आखिर वह माननीय संसद सदस्य हैं।
मुख्तार अंसारी : सत्ता की रही सरपरस्ती
मुख्तार अंसारी। बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय की हत्या का आरोप है। 1989 में मुलायम सिंह के पहले मुख्यमंत्रित्वकाल में मुख्तार को सत्ता का संरक्षण मिला। उसके बाद अंसारी के विरु द्ध सारे मामलों में सीबीसीआईडी की जांच लगवा दी गई। कल्याण सिंह के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बनी, तो मुख्तार के खिलाफ टाडा लगा दिया गया। बसपा और बीजेपी की पहली साझा सरकार में मायावती ने मुख्तार को जेड प्लस श्रेणी सुरक्षा मुहैया कराई थी। इसके बाद मुख्तार का कद इतना बढ़ गया कि वह माफिया से पूर्वांचल के मुसलमानों का रहनुमा कहा जाने लगा। तीसरी बार मुलायम सिंह की सरकार बनी, तो मुख्तार अपने चरम पर थे। ये वो दौर था जब मुख्तार की तूती बोलती थी। उसके यहां बाहर के सूबों के अपराधियों को भी संरक्षण मिलने लगा था।
उन दिनों के एक धाकड़ डीएसपी शैलेन्द्र सिंह ने एक एलएमजी पकड़ी, जो मुख्तार के पास पहुंचनी थी। मुख्तार का तो कुछ नहीं बिगड़ा, लेकिन डीएसपी साहब को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। कहा जाता है, एक बड़े नेता ने मुख्तार को बचाने में अपनी सारी ताकत झोंक दी थी। इसी दौरान मऊ दंगों में मुख्तार का दंगाई रूप भी देखने को मिला और मुलायम की पूर्व सरकार में गाजीपुर में दो दर्जन से अधिक मुख्तार के विरोधियों की हत्या हुई, लेकिन मुख्तार का कुछ नहीं बिगड़ा। यहां तक कि 22 फरवरी 2009 को करंडा में एक सपा समर्थक ठेकेदार की हत्या का आरोप भी मुख्तार पर लगा, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। उनकी आन-बान शान कायम रही। वर्ष 2007 में विधानसभा चुनाव के बाद मायावती की सरकार बनी। मुख्तार असांरी को मायावती का पूर्ण संरक्षण मिलने लगा। लोकसभा चुनाव में मुख्तार को वाराणसी और उसके भाई अफजाल को गाजीपुर का टिकट थमा दिया गया। अब मुख्तार अंसरी जेल में हैं।
धर्मंपाल उर्फ डीपी यादव : संगीन आरोप
यादव पर दर्जनों संगीन आरोप हैं। दिल्ली, उत्तराखंड और हरियाणा तक रसूख का फैला है साम्राज्य। पश्चिम उत्तर प्रदेश का इन्हें शराब माफिया कहा जाता है। बेटा विकास तिहाड़ जेल में बंद है। उसे देश के चर्चित नीतीश कटारा हत्याकांड में सजा हो चुकी है। खुद डीपी यादव पर पहला मामला सन 1989 में गाजियाबाद जिले के कविनगर थाने में दर्ज हुआ। इसके बाद कत्ल और डकैती के 2-दो और अपहरण, गैंगस्टर और टाडा जैसे मामले मुकदमों की फेहरिस्त में शामिल होते गए। इसके साथ ही जेसिका लाल हत्याकांड में भी यादव और उसके बेटे विकास का नाम आरोपियों में शामिल हुआ।
डीपी यादव ने राष्ट्रीय परिवर्तन दल बनाया। पत्नी उर्मिलेश विधायक चुनी गर्इं। बाद में पत्नी सहित यादव ने बसपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। उसके बाद डीपी तब चर्चा में आए, जब विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने इनकी छवि के चलते सपा में लेने से इंकार कर दिया। वैसे तो हमेशा ही कोई न कोई विवाद साथ जुड़ा रहता है, लेकिन बदायूं जिले की बिसौली तहसील के गांव रानेट के पास यादव की हाल ही में स्थापित यदु शुगर मिल की बात करें, तो मिल की स्थापना दबंगई और बेईमानी से ही की गई है। मिल के डायरेक्टर छोटे पुत्र कुणाल यादव को बनाया गया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि ये मिल जबरन लिखाई गई जमीनों पर बनी है।
राजा भैया
न थाना न कचहरी, आॅन स्पाट फैसला! इलाके में राजा भैया की तत्काल न्याय दिलाने वाले युवराज की छवि है। रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया (40) को उनके विरोधी ‘कुंडा का गुंडा’ कहते हैं। इनके पिता उदय प्रताप सिंह प्रतापगढ़ जिले की तहसील कुंडा के थाना हथिगवां स्थित बेंती और भदरी स्टेट के राजा हुआ करते थे। बेंती कोठी पूरे इलाके में मशहूर है। कुंडा (प्रतापगढ़) विधानसभा क्षेत्र से ही राजा भैया विधायक हैं। वर्ष 1993 से अब तक हुए पांच बार चुनाव में उन्हें कोई हरा नहीं पाया है।
लखनऊ विश्वविद्यालय से 1989 में स्नातक इस राजा पर तीन दर्जन से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं। आठ  में न्यायालय ने संज्ञान लिया है। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने पोटा लगाया, बाद में बरी हो गए। वर्ष 2010 में निकाय चुनाव के दौरान एक नेता की हत्या के प्रयास का मुकदमा भी चल रहा है, जिसमें राजा भैया समेत 13 लोगों की गिरफ्तारी हुई। इसके बाद 2002 में विधायक पूरन सिंह बुंदेला ने राजा के खिलाफ अपहरण का मुकदमा दर्ज कराया, जो अब भी अदालत में विचाराधीन है, लेकिन चुनाव में उन्हें कोई शिकश्त नहीं दे सका।
राजा भैया वर्ष 1996 में पहली बार कल्याण सरकार में मंत्री बने। इसके बाद 1999 में राम प्रकाश गुप्ता की सरकार, 2000 में राजनाथ सिंह और 2003 में मुलायम सिंह यादव की सरकार में भी राजा भैया को मंत्री पद से नवाजा गया। दिसंबर, 2010 में एक इलाकाई नेता ने स्थानीय निकाय चुनावों के समय राजा भैया सहित एक सांसद, विधायक और विधान परिषद सदस्य समेत 13 लोगों के विरु द्ध जान से मारने के प्रयास का मामला दर्ज कराया था। इस मामले में राजा भैया को गिरफ्तार करके उनके खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया। इससे पहले साल 2002 में बीजेपी विधायक पूरन सिंह बुंदेला ने अपने अपहरण करने का आरोप लगाया था, 2004 में राजा के घर से एके-47 बरामद हुई, लेकिन वर्ष 2012 में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार बनी, तो राजा भैया को कारागार मंत्री बनाया गया। जेल मंत्री रहे राजा भैया जेल में सजा भी काट चुके हैं। ताजा मामला डीएसपी हत्याकांड की सीबीआई जांच कर रही है। राजा भैया पर गिरफ्तारी की तलवार लटकी हुई है, लेकिन उनके रुतबे में कोई कमी नहीं आई। इलाके में आज भी उनकी तूती बोलती है


उत्तर प्रदेश आैर अपराध की राजनीति
बात पहले 80 के दशक की। तब चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र से हरिशंकर तिवारी व लक्ष्मीपुर से स्व. वीरेन्द्र शाही ने अपने बाहुबल के भरोसे निर्दल प्रत्याशी के रूप में राजनीति में कदम रखा। अप्रत्यक्ष तौर पर हरिशंकर तिवारी को कांग्रेस व वीरेन्द्र शाही को जनता पार्टी ने छांव दी। पूर्वाचल में बाहुबलियों के राजनीति में कदम रखने की शुरुआत यहीं से हुई। फिर तो क्षेत्रीय दलों में मुलायम सिंह यादव हों या मायावती।
अतीक का इलाहाबाद
वाराणसी ,गाजीपुर और घोषी संसदीय सीट से कभी संपूर्णानन्द, कमलापति त्रिपाठी, सरजू पाण्डेय, जयबहादुर सिंह, झारखंडे राय जैसे नेता प्रतिनिधित्व किया करते थे। अब  राजनीति हिन्दू व मुस्लिम अपराधी एवं माफिया करते हैं। वर्ष 1995 में अतीक अंसारी ने इलाहाबाद आैर मुख्तार अंसारी ने घोषी विधानसभा क्षेत्र से राजनीति में कदम रखा। उस समय अतीक व मुख्तार पर कई आपराधिक मुकदमें दर्ज थे। वर्ष 2009 में बसपा ने मुख्तार अंसारी को बनारस से तो उनके भाई अफजाल अंसारी को गाजीपुर से टिकट दिया। बेनिया बाग मैदान में मायावती ने मंच से मुख्तार को क्लीन चिट भी दे दी थी।

१९९५ में बृजेश सिंह के भाई चुलबुल सिंह ने भी सियासत में कदम रखा। फिर तो जैसे अपराधियों के लिए राजनीति में प्रवेश का रास्ता ही खुल गया। 1996 में मिर्जापुर-भदोही संसदीय क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी वीरेन्द्र सिंह मस्त के सामने बीहड़ से निकली देश का बहुचर्चित बेहमई हत्याकांड करने वाली फूलनदेवी ने ताल ठोका। हांलाकि वह चुनाव हार गई। बाद में वर्ष 1999 में मध्यावधि चुनाव में फूलनदेवी जीत कर संसद पहुंची।
 
छात्र राजनीति से अपराध आैर फिर राजनीति

छात्र राजनीति से शुरुआत करने वाले धनंजय सिंह की तलाश यूपी पुलिस को हमेशा रहती थी। मगर बाहुबल के भरोसे वर्ष 2002 में लोजपा से विधानसभा चुनाव में उतरे और विजयी हुए। बाद में वर्ष 2004 में लोकसभा चुनाव लड़ा। मगर हार गए। वर्ष 2009 में इसी बाहुबल के भरोसे संसद में जा पहुंचे। बलिया से चंद्रशेखर चुनाव जीतकर कई बार संसद पहुंचे। व्यक्तित्व कुछ ऐसा कि जब संसद में बोलते थे तो पक्ष-विपक्ष उनकी बात सुनती थी। मगर उसी पूर्वाचल में अपराधियों को सियासत में उतारने एवं पनपने देने में क्षेत्रीय दलों ने खूब योगदान किया।
ये भी हैं
फैजाबाद से अभय सिंह, अंबेडकर नगर से जितेन्द्र सिंह, आजमगढ़ से रमाकांत यादव, जाैनपुर से उमाकांत यादव, बृजेश के भतीजे सुशील सिंह, विनीत सिंह समेत तमाम ऐसे बाहुबली हैं जो कभी निर्दल तो कभी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय पार्टी के भरोसे चुनावी मैदान में उतरे और पूर्वाचल के मतदाताओं ने इन्हें गले लगाने से गुरेज नहीं किया। शराब कारोबारी जवाहर जायसवाल को वर्ष 2004 में भाजपा ने चंदौली से टिकट दिया।
ददुआ दंश
2009 में ददुआ के भाई बाल कुमार पटेल को समाजवादी पार्टी ने मिर्जापुर से टिकट दे दिया और मतदाताओं ने उसे भारी मतों से जिताकर संसद में भेजा।

जब विद्यासागर जी ने चप्पल फेंकी

जब विद्यासागर जी ने चप्पल फेंकी फिर एक चप्पल चली। रोज ही कहीं ना कहीं यह पदत्राण थलचर हाथों में आ कर नभचर बन अपने गंत्वय की ओर जाने क...