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जब अंग्रेजों ने किया भारतीय रेलवे में पटरी घोटाला

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एक के बाद एक रेल हादसों ने देश को इस कदर हिला कर रख दिया कि आख़िरकार सुरेश प्रभु की रेल मंत्रालय से छुट्टी हो गयी. पीयूष गोयल की नियुक्ति क्या रंग दिखाएगी, यह तो भविष्य ही बताएगा पर आज रेल से जुड़े इतिहास की बात करते हैं. भारतीय रेल के दो चेहरे दिखाते हैं जो बताते हैं कि अंग्रेजों द्वारा बनाई गई भारतीय रेल उपनिवेशवाद के साथ-साथ जवाबदेही का भी उदाहरण थी. वह जवाबदेही जो आज के हालात में दूर-दूर तक नजर नहीं आती. भारतीय रेल और उपनिवेशवाद भारतीय रेल को अंग्रेजों की देश को सबसे बड़ी सौगात के तौर पर बताया जाता रहा है. लेकिन भारत में ब्रिटिश राज पर लिखी क़िताब ‘एन एरा ऑफ़ डार्कनेस’ में शशि थरूर यह मिथक तोड़ते हैं कि अंग्रेजों ने इसे हिन्दुस्तानी लोगों के लिए बनवाया था. उनके मुताबिक़ ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी सेना के स्थानान्तरण और व्यापारिक सामानों के आवागमन के मद्देनज़र इसका निर्माण करवाया था.1843 में तत्कालीन गवर्नर जनरल हार्डिंग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था, ‘रेल हिंदुस्तान में ब्रिटिश व्यापार, सरकार और सेना और इस देश पर मज़बूत पकड़ के लिए सहायक होगी.’ बाद में डलहौज़ी ने इसकी पैरवी करते हुए कहा था कि …

संयोग या संघ के प्रभाव से निकलने की नई सियासत

सत्ता परिवर्तन से पहले विदेश यात्रा  राष्ट्रपति भवन में पहले सुबह दस बजे का वक्त मुकर्रर किया गया फिर उसे बढ़ाकर साढ़े दस कर दिया गया. शपथ ग्रहण आधे घंटे में खत्म हुआ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो घंटे के अंदर चीन के लिए रवाना हो गए. ऐसा पहली बार होता तो इत्तेफाक माना जा सकता था. लेकिन मोदी सरकार ने करीब तीन साल में तीसरी बार मंत्रिमंडल विस्तार किया और तीनों बार नए मंत्रियों को शपथ दिलाने के बाद प्रधानमंत्री विदेश यात्रा पर निकल गए. इस बार तो उनके रवाना होने के बाद ही मंत्रियों के विभागों की सूची सार्वजनिक की गई. कुछ मंत्रियों को तो मीडिया से ही पता चला कि उनका विभाग बदल गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल का पहला विस्तार 9 नवंबर 2014 को किया. उस बार 21 नए मंत्री बनाए गए. लेकिन दो दिन बाद ही प्रधानमंत्री दस दिन लंबी विदेश यात्रा पर निकल गए. वे अपनी इस यात्रा में म्यांमार, ऑस्ट्रेलिया और फीजी के राष्ट्राध्यक्षों से मिले.  प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं की तारीखें तो महीनों पहले तय हो जाती हैं, लेकिन शपथ ग्रहण की तारीख हमेशा एक दिन पहले तय की जाती है. करीब डेढ़ साल बा…

पटरी की कमी लिख रही मौत की पटकथा

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ट्रेनों के बढ़ने पर नए ट्रैक भी बनने चाहिए. लेकिन बीते 15 साल में ट्रेनों की संख्या में 50 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी के बावजूद ट्रैक सिर्फ 12 फीसदी ही बढ़े हैं  बीती 19 अगस्त को उत्तर प्रदेश में खतौली के पास कलिंग उत्कल एक्सप्रेस पटरी से उतर गई. इस हादसे में 21 यात्रियों की मौत हो गई जबकि 200 से ज्यादा घायल हो गए. इसके चार दिन बाद औरैया के पास कैफियत एक्सप्रेस के भी पटरी से उतरने और हादसे में 70 लोगों के घायल होने की खबर आई. इसी साल 21 जनवरी को आंध्र प्रदेश के विजयनगर में हीराखंड एक्सप्रेस पटरी से उतर गई थी. हादसे में 39 लोगों की मौत हो गई थी जबकि 70 से ज्यादा घायल हो गए थे. इसमें पहले 20 नवंबर 2016 को कानपुर के पास इंदौर-पटना एक्सप्रेस पटरी से उतर गई थी. इस हादसे में 149 यात्री मरे थे.इन सभी हादसों में एक समानता है. ये चारों उन रेल लाइनों पर हुए हैं जिन पर क्षमता से कहीं ज्यादा बोझ है. किसी रेल लाइन की क्षमता का मतलब होता है कि वह लाइन 24 घंटे में कितनी ट्रेनों की आवाजाही संभाल सकती है. अगर इस क्षमता का 80 फीसदी इस्तेमाल हो रहा है तो इसका मतलब है कि स्थिति सामान्य है. अगर यह आंकड़ा …

क्या प्रभाष जोशी होने के लिये रामनाथ गोयनका चाहिए? उधार का माल

मालवा के पठार की काली मिट्टी और लुटियन्स की दिल्ली के राजपथ की लाल बजरी के बीच प्रभाष जोशी की पत्रकारिता । ये प्रभाष जोशी का सफर नहीं है । ये पत्रकारिता की वह सुरंग है, जिसमें से निकलकर मौजूदा वक्त की पत्रकारिता को समझने के लिये कई आंखों, कई कान मिल सकते है तो कई सच, कई अनकही सियासत समझ में आ सकती है । और पत्रकारिता की इस सुरंग को वही ताड़ सकता है जो मौजूदा वक्त में पत्रकारिता कर रहा हो । जिसने प्रभाष जोशी को पत्रकारिता करते हुये देखा होऔर जिसके हाथ में रामबहादुर राय और सुरेश सर्मा के संपादन में लेखक रामाशंकर कुशवाहा की किताब "लोक का प्रभाष " हो । यूं " लोक का प्रभाष " जीवनी है । प्रभाष जोशी की जीवनी । लेकिन ये पुस्तक जीवनी कम पत्रकारीय समझ पैदा करते हुये अभी के हालात को समझने की चाहे अनचाहे एक ऐसी जमीन दे देती है, जिस पर अभी प्रतिबंध है । प्रतिबंध का मतलब इमरजेन्सी नहीं है । लेकिन प्रतिबंध का मतलब प्रभाष जोशी की पत्रकारिता को सत्ता के लिये खतरनाक मानना तो है ही । और उस हालात में ना तो रामनाथ गोयनका है ना इंडियन एक्सप्रेस। और ना ही प्रभाष जोशी हैं। तो फिर बात कहीं…

कहीं इन पांच लेखों ने तो नहीं लिखी लंकेश के हत्या की पटकथा

गौरी लंकेश साप्ताहिक पत्रिका 'लंकेश पत्रिके' की संपादक थीं. उनकी मैग्जीन के पिछले पांच संस्करणों पर गौर करें।
1. 5 सितंबर, 2017 'लंकेश पत्रिके' के सितंबर महीने के इस संस्करण में कवर पेज पर बीजेपी नेता और कर्नाटक के पूर्व सीएम बीएस येदुरप्पा की तस्वीर थी. इस संस्करण में येदुरप्पा को लेकर कवर स्टोरी की गई. स्टोरी में कहा गया कि येदुरप्पा पर भूमि अधिसूचना रद्द करने का खुलासा सिद्धरमैया ने नहीं बल्कि सदानंद गौड़ा ने किया. बता दें कि येदियुरप्पा पर आरोप है कि उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री अपने कार्यकाल के दौरान कथित रूप से शिवराम करांत लेआउट के निर्माण के लिए आवंटित जमीन को गैरअधिसूचित किया था. 2. 30 अगस्त, 2017 गौरी लंकेश की मैग्जीन के इस संस्करण में कवर पेज पर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की तस्वीर के साथ स्टोरी की गई. अमित शाह के कर्नाटक दौरे पर स्टोरी में लिखा गया कि भगवा ब्रिगेड राज्य में आग लगाने के लिए आ चुकी है. ये भी कहा गया कि अमित शाह मीडिया का भगवाकरण करने के लिए कर्नाटक आए हैं. पेज नंबर 8 पर स्टोरी की हेडलाइन दी गई 'क्या अमित शाह सांप्रदायिक हिंसा भड़का…

अमजद खान : एक ऐसा खलनायक जिसे नायकों से बेहतर होने के लिए आलोचनाएं झेलनी पड़ीं

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वो गझिन कांटेदार दाढ़ी और उससे टपकती क्रूरता. न दिखने वाली गर्दन में फंसा ताबीज, कंधे पर लटकी कारतूस की पेटी, कमर के बजाय हाथ में झूलती बेल्ट, वो ‘अरे ओ सांभा! कितने आदमी थे’ वाला सवाल, वो खूंखार हंसी और बात-बात के बाद आ..थू! सही समझे हैं (ऐसा शायद ही कोई हो जो इसे न समझे). बात गब्बर सिंह की ही हो रही है. वही गब्बर जो धधकते ‘शोले’ से तपकर निकला था. वही गब्बर जिसके लिए अमजद खान पहली पसंद नहीं थे. (पहली पसंद डैनी थे, जो उन दिनों फिल्म धर्मात्मा की शूटिंग में व्यस्त थे) वही अमजद जिनकी आवाज को जावेद अख्तर ने यह कहकर नकार दिया था कि इस रोल के लिए यह कमजोर है. आज 24 बरस बीत गए अमजद जकारिया खान के निधन को, लेकिन उनकी वो अलहदा आवाज और जुदा अंदाज 100 साल से ऊपर के भारतीय सिनेमा में अमर है. अमजद रंगमंच के आदमी थे. उनके बारे में विकीपीडिया लिखता है कि ‘नाजनीन’ उनकी पहली फिल्म थी. लेकिन नहीं, उन्होंने चार साल की उम्र में बाल कलाकार के रूप में पहला रोल अपने चाचा की ‘चार पैसा’ में किया था. कह सकते हैं कि खलनायकी अमजद को विरासत में मिली थी. अमजद ने जन्म ही 50-60 के दशक के टॉप विलेन जयंत खान के घर म…

2014 की कॉरपोरेट फंडिग ने बदल दी है देश की सियासत Punya Prasun Bajpai

चुनाव की चकाचौंध भरी रंगत 2014 के लोकसभा चुनाव की है। और क्या चुनाव के इस हंगामे के पीछे कारपोरेट का ही पैसा रहा। क्योंकि पहली बार एडीआर ने कारपोरेट फंडिग के जो तथ्य जुगाड़े हैं, उसके मुताबिक 2014 के आम चुनाव में राजनीतिक दलो को जितना पैसा कारपोरेट फंडिंग से हुआ उतना पैसा उससे पहले के 10 बरस में नहीं हुआ। एडीआर के मुताबिक 2004 से 2013 तक कारपोरेट ने 460 करोड 83 लाख रुपये राजनीतिक दलों को फंड किया। वहीं 2013 से 2015 तक के बीच में कारपोरेट ने 797 करोड़ 79 लाख रुपये राजनीतिक दलों को फंड किया। ये आंकडे सिर्फ राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के हैं। यानी बीजेपी, कांग्रेस, एनसीपी और वामपंथी दलो को दिये गये फंड । यानी 2014 के चुनाव में कारपोरेट ने दिल खोल कर फंडिंग की। तो चुनाव प्रचार के आधुनिकतम तरीके जब 2014 के चुनाव में बीजेपी ने आजमाये। तो उसके पीछे का क सच एडीआर की इस रिपोर्ट से भी निकलता है कि 80 फिसदी से ज्यादाकारपोरेट फंडिंग बीजेपी को मिल रही थी। क्योंकि याद किजिये मनमोहन सिंह सरकार जब घोटाले दर घोटाले के दायरे में फंस रही थी तब 20 कारपोरेट घरानों में 2011-12 के बीच मनमोहन सरकार की गवर्नेंस,…