Wednesday, September 15, 2010

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध ...on china war

वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है


जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है

देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है

माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है



पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज

सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?



अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?

तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?

सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?

उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में



समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा

और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा



समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा

जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा

धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं

गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं



कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे

अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे



समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो

शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो

पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे

समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे



समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर

खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर



समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं

गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं

समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है

वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है



समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल

विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल



तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना

सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना

बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे

मंदिर औ' मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे



समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

sonia gandhi

Sunday, August 22, 2010

ये तय करना मुश्किल है कि राहुल महाजन अधिक छिछोरा है या हिन्दी न्यूज़ चैनल…… Rahul Mahajan, News Channels, Celebrity Media in India



विगत दो दिनों से जिसने भी भारतीय टीवी चैनलों (हिन्दी) को देखा होगा, उसने लगभग प्रत्येक चैनल पर स्वर्गीय प्रमोद महाजन के "सपूत"(?) राहुल महाजन और उसके द्वारा पीटी गई उसकी "बेचारी"(?) पत्नी डिम्पी गांगुली की तस्वीरें, खबरें, वीडियो इत्यादि लगातार देखे होंगे। राहुल महाजन ने ऐसा किया, राहुल महाजन ने वैसा किया, उसने अपनी बीवी को कब-कहाँ-कितना और कैसे पीटा? डिम्पी की जाँघों और पिंडलियों पर निशान कैसे थे? राहुल महाजन ऐसे हैं, राहुल महाजन वैसे हैं… आदि-आदि-आदि, ब्ला-ब्ला-ब्ला-ब्ला… 

हालांकि वैसे तो पहले से ही भारतीय हिन्दी न्यूज़ चैनलों की मानसिक कंगाली जगज़ाहिर है, लेकिन जिस तरह से सारे चैनल "गिरावट" की नई-नई इबारतें लिख रहे हैं, वैसा कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा। भारत में लोकतन्त्र है, एक स्वतन्त्र प्रेस है, प्रेस परिषद है, काफ़ी बड़ी जनसंख्या साक्षर भी है… इसके अलावा भारत में समस्याओं का अम्बार लगा हुआ है फ़िर चाहे वह महंगाई, आतंकवाद, नक्सलवाद, खेती की बुरी स्थिति, बेरोजगारी जैसी सैकड़ों बड़े-बड़े मुद्दे हैं, फ़िर आखिर न्यूज़ चैनलों को इस छिछोरेपन पर उतरने क्या जरूरत आन पड़ती है? इसके जवाब में "मीडियाई भाण्ड" कहते हैं कि 24 घण्टे चैनल चलाने के लिये कोई न कोई चटपटी खबर चलाना आवश्यक भी है और ढाँचागत खर्च तथा विज्ञापन लेने के लिये लगातार "कुछ हट के" दिखाना जरूरी है।


चैनलों के लिये राहुल महाजन "इज्जत" से पुकारे जाने योग्य ऐसे-वैसे हैं, लेकिन मेरी ऐसी कोई मजबूरी नहीं है, क्योंकि वह आदमी इज्जत देने के लायक है ही नहीं। सवाल उठता है कि राहुल महाजन आखिर है क्या चीज़? क्या राहुल महाजन बड़ा खिलाड़ी हैं? क्या वह बड़ा अभिनेता है? क्या वह उद्योगपति है? क्या उसने देश के प्रति कोई महती योगदान दिया है? फ़िर उसनशेलची, स्मैकची, बिगड़ैल, पत्नियों को पीटने का शौक रखने वाले, उजड्ड रईस औलाद में ऐसा क्या है कि जीटीवी, आज तक, NDTV जैसे बड़े चैनल उसका छिछोरापन दिखाने के लिये मरे जाते हैं? (इंडिया टीवी को मैं न्यूज़ चैनल मानता ही नहीं, इसलिये लिस्ट में इस महाछिछोरे चैनल का नाम नहीं है)।

जिस समय प्रमोद महाजन की मौत हुई थी, तब शुरुआत में ऐसा लगा था कि राहुल महाजन की दारुबाजियों और अवैध हरकतों को मीडिया इसलिये कवरेज दे रहा है कि इससे प्रमोद महाजन की छवि को तार-तार किया जा सके, लेकिन धीरे-धीरे राहुल महाजन तो "पेज-थ्री" सेलेब्रिटी(?) बन गया। पहले बिग बॉस में उसे लिया गया और उस प्रतियोगी शो में भी राहुल महाजन पर ही कैमरा फ़ोकस किया गया, कि कैसे उसने स्वीमिंग पूल में फ़लाँ लड़की को छेड़ा, कैसे राहुल ने पायल रोहतगी (एक और "सी" ग्रेड की अभिनेत्री) के साथ प्यार की पींगें बढ़ाईं, इत्यादि-इत्यादि। माना कि "बिग बॉस" अपने-आप में ही एक छिछोरेपन वाला रियलिटी शो कार्यक्रम था, लेकिन और भी तो कई प्रतियोगी थे… अकेले राहुल महाजन को ऐसा कवरेज देना "फ़िक्सिंग" की आशंका पैदा करता है।

खैर जैसे-तैसे बिग बॉस खत्म हुआ, और फ़िर भी राहुल महाजन का भूत चैनलों के सर से नहीं उतरा। एक और टीवी चैनल इस "रंगीले रसिया" को स्वयंवर  के लिये ले आया, इस चैनल ने एक बार भी नहीं सोचा कि अपनी बचपन की सहेली के साथ मारपीट करके घर से निकालने वाले इस "वीर-पुरुष" के सामने वह कई लड़कियों की "परेड" करवा रहे हैं। जहाँ एक तरफ़ बिग बॉस "छिछोरा" कार्यक्रम था, तो "राहुल दुल्हनिया ले जायेंगे" पूरी तरह से फ़ूहड़ था, जिसका विरोध नारी संगठनों ने आधे-अधूरे मन से किया, लेकिन मीडिया के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। (शायद "राहुल" नाम में ही कुछ खास बात है, कि "मीडियाई भाण्ड" इसके आगे बगैर सोचे-समझे नतमस्तक हो जाते हैं... आपको राहुल भट्ट याद ही होगा जो डेविड कोलमैन से रिश्तों के बावजूद आसानी से खुला घूम रहा है, जबकि प्रज्ञा ठाकुर रासुका में बन्द है…)



और अब जबकि एक और "राहुल" ने अपनी दूसरी बीबी को बुरी तरह पीटा है तो फ़िर से चैनल अपना-अपना कैमरा लेकर दौड़ पड़े हैं, उसकी बीबी की मार खाई हुई टांगें दिखा रहे हैं, फ़िर दोनों को मुस्कराते हुए साथ खाना खाते भी दिखा रहे हैं… ये कैसा "राष्ट्रीय मीडिया" है? दिल्ली और मुम्बई के बाहर क्या कोई महत्वपूर्ण खबरें ही नहीं हैं? लेकिन जब "पेज-थ्रीनुमा" फ़ोकटिया हरकतों की आदत पड़ जाती है तो चैनल दूरदराज की खबरों के लिये मेहनत क्यों करें, राखी सावन्त पर ही एक कार्यक्रम बना लें, या अमिताभ के साथ मन्दिर का चक्कर लगायें, या धोनी की शादी  (जहाँ धोनी ने उन्हें अपने दरवाजे से बाहर खड़ा रखा था) की खबरें ही चलाएं। (एक चैनल तो इतना गिर गया था कि उसने धोनी की शादी और हनीमून हो चुकने के बाद, उस होटल का कमरा दिखाया था कि "धोनी यहाँ रुके थे, धोनी यहाँ सोए थे, धोनी इस कमरे में खाये थे… आदि-आदि), क्या हमारा तथाकथित मीडिया इतना मानसिक कंगाल हो चुका है? क्या लोग न्यूज़ चैनल इसलिये देखते हैं कि उन्हें देश के बारे में खबरों की बजाए किसी फ़ालतू से सेलेब्रिटी के बारे में देखने को मिले? इस काम के लिये तो दूसरे कई चैनल हैं।

चलो कुछ देर के लिये यह मान भी लें कि न्यूज़ चैनलों को कभीकभार ऐसे प्रोग्राम भी दिखाने पड़ते हैं, ठीक है… लेकिन कितनी देर? राहुल महाजन को "कितनी देर का कवरेज" मिलना चाहिये, क्या यह तय करने लायक दिमाग भी चैनल के कर्ताधर्ताओं में नहीं बचा है? राहुल महाजन जैसे "अनुत्पादक" व्यक्ति, जो न तो खिलाड़ी है, न अभिनेता, न उद्योगपति, न ही राजनेता… ऐसे व्यक्ति को चैनलों पर इतना समय? क्या देश में और कोई समस्या ही नहीं बची है? तरस आता है इन चैनल मालिकों की बुद्धि पर और उनके सामाजिक सरोकारों पर… क्योंकि एक और "राहुल" (गाँधी) द्वारा दिल्ली की सड़कों पर साइकल चलाना भी इनके लिये राष्ट्रीय खबर होती है।

भारत जैसे देश में "सेलेब्रिटी"(?) होना ही पर्याप्त है, एक बार आप सेलेब्रिटी बन गये तो फ़िर आप में अपने-आप ही कई गुण समाहित हो जायेंगे। सेलेब्रिटी बनने के लिये यह जरूरी नहीं है कि आप किसी क्षेत्र में माहिर ही हों, अथवा आप कोई बड़ा सामाजिक कार्य ही करें… सेलेब्रिटी बनने की एकमात्र क्वालिफ़िकेशन है "किसी बड़ी राजनैतिक हस्ती" से निकटता या सम्बन्ध होना… बस इसके बाद आपके चारों तरफ़ मीडिया होगा, चमचेनुमा सरकारी अधिकारी होंगे, NGO बनाकर फ़र्जी चन्दा लेने वालों की भीड़ होगी, किसी समिति-वमिति के सदस्य बनकर विदेश घूमने का मौका मिलेगा… यानी की बहुत कुछ मिलेगा।

उदाहरण के लिए मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा महिला प्रौढ़ शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिये जो ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाये जाने वाले हैं, उनकी सूची ही देख लीजिये कि अधिकारियों ने किस मानसिकता के तहत उक्त नाम भेजे हैं - नीता अम्बानी, प्रियंका वढेरा (सॉरी, गाँधी), कनिमोझीऔर सुप्रिया सुले । अब आप अपना सिर धुनते रहिये, कि आखिर इन चारों महिलाओं ने सामाजिक क्षेत्र में ऐसे कौन से झण्डे गाड़ दिये कि इन्हें महिला प्रौढ़ शिक्षा का "ब्राण्ड एम्बेसेडर" बनाया जाये? इनमें से एक भी महिला ऐसी नहीं है जो "ज़मीनी हकीकत" से जुड़ी हुई हो, अथवा जिसकी अपनी "खुद की" बनाई हुई कोई पहचान हो। नीता अम्बानी जो भी हैं सिर्फ़ मुकेश अम्बानी और रिलायंस की वजह से, प्रियंका गाँधी के बारे में तो सभी जानते हैं कि यदि नाम में "वढेरा" लगाया जाये तो कोई पहचाने भी नहीं… सुप्रिया सुले की एकमात्र योग्यता(?) शरद पवार की बेटी होना और इसी तरह कनिमोझि की योग्यता करुणानिधि  की बेटी होना है, अब इन्हें प्रौढ़ शिक्षा का ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाने की सिफ़ारिश करना मंत्रालय के अधिकारियों की चमचागिरी का घटिया नमूना नहीं तो और क्या है? क्या इस सामाजिक काम के लिये देश में "असली सेलेब्रिटी" (जी हाँ असली सेलेब्रिटी) महिलाओं की कमी थी? साइना नेहवाल, मेरीकॉम, किरण बेदी, चंदा कोचर, शबाना आज़मी, मेधा पाटकर  जैसी कई प्रसिद्ध लेकिन ज़मीन से जुड़ी हुई महिलाएं हैं, यहाँ तक कि मायावती और ममता बनर्जी की व्यक्तिगत उपलब्धियाँ और संघर्ष भी उन चारों महिलाओं से कहीं-कहीं अधिक बढ़कर है। लेकिन जैसा कि मैंने कहा, "मीडिया और चाटुकार" मिलकर पहले सेलेब्रिटी गढ़ते हैं, फ़िर उनके किस्से-कहानी गढ़ते हैं, फ़िर दिन-रात उनके स्तुतिगान गाकर जबरदस्ती जनता के माथे पर थोपते हैं।

हालांकि सच्चे अर्थों में संघर्ष करने वाले ज़मीनी लोग कैमरों की चकाचौंध से दूर समाजसेवा के क्षेत्र में अपना काम करते रहते हैं फ़िर भी मीडिया का यह कर्तव्य है कि वह ऐसे लोगों को जनता के सामने लाये… और उन पर भी अपना "बहुमूल्य"(?) समय खर्च करे…। हमारे मालवा में पूरी तरह से निकम्मे (Useless) व्यक्ति को "बिल्ली का गू" कहते हैं, यानी जो न लीपने के काम आये, न ही कण्डे बनाने के… जब भी, जहाँ भी गिरे गन्दगी ही फ़ैलाए…। टीवी पर बार-बार राहुल महाजन के कई एपीसोड देखने के बाद एक बुजुर्ग की टिप्पणी थी, "यो प्रमोद बाबू को छोरो तो बिल्ली को गू हे, अन ई चेनल वाला भी…"

ताज़ा खबर दिखाई गई है कि "राहुल महाजन ने अपनी पिटाई की हुई बीबी के साथ सिद्धिविनायक के दर्शन किये…" यानी कि तीन दिन बाद भी राहुल महाजन मीडिया की हेडलाइन था, सो अब यह तय करना मुश्किल होता जा रहा है कि राहुल अधिक छिछोरा है या हमारा "सो कॉल्ड नेशनल मीडिया"

जी हाँ नरेन्द्र भाई मोदी… गुजरात एक "शत्रु राज्य" ही है, क्योंकि… … Narendra Modi, CBI, Amit Shah, Supreme Court



जिन लोगों ने गुजरात के गृहराज्य मंत्री अमित शाह की गिरफ़्तारी वाले दिन से अब तक टीवी चैनलों पर खबरें देखी होंगी, उन सभी ने एक बात अवश्य नोटिस की होगी… कि चैनलों पर "हिस्टीरिया" का दौरा अमूमन तभी पड़ता है, जब भाजपा-संघ-हिन्दुत्व से जुड़े किसी व्यक्ति के साथ कोई छोटी से छोटी भी घटना हो जाये। सोहराबुद्दीन के केस में तो मीडिया का "पगला जाना" स्वाभाविक ही था, जहाँ एक तरफ़ एंकर चीख रहे थे वहीं दूसरी तरफ़ हेडलाइन्स में और नीचे की स्क्रोल पट्टी में हमने क्या देखा… "अमित शाह गिरफ़्तार, क्या नरेन्द्र मोदी बचेंगे?…", "अमित शाह मोदी के खास आदमी, नरेन्द्र मोदी की छवि तार-तार हुई…", "क्या नरेन्द्र मोदी इस संकट से पार पा लेंगे…", "नरेन्द्र मोदी पर शिकंजा और कसा…" इत्यादि-इत्यादि-इत्यादि…

क्या इस केस से नरेन्द्र मोदी का अभी तक कोई भी, किसी भी प्रकार का सम्बन्ध उजागर हुआ है? क्या नरेन्द्र मोदी राज्य में होने वाली हर छोटी-मोटी घटना के लिये जिम्मेदार माने जायेंगे? एक-दो गुण्डों को एनकाउंटर में मार गिराने पर नरेन्द्र मोदी की जवाबदेही कैसे बनती है? लेकिन सोहराबुद्दीन के केस में जितने "मीडियाई रंगे सियार" हुंआ-हुंआ कर रहे हैं, उन्हें उनके "आकाओं" से इशारा मिला है कि कैसे भी हो नरेन्द्र मोदी की छवि खराब करो। कारण कई हैं - मुख्य है गुजरात का तीव्र विकास और हिन्दुत्व का उग्र चेहरा, देश-विदेश के कई शातिरों की आँखों की किरकिरी बना हुआ है। ज़रा इन आँकड़ों पर एक निगाह डाल लीजिये आप खुद ही समझ जायेंगे -

1) अब तक पिछले कुछ वर्षों में भारत में लगभग 5000 एनकाउंटर मौतें हुई हैं।

2) लगभग 1700 से अधिक एनकाउंटर के मामलों की सुनवाई और प्राथमिक रिपोर्ट देश के विभिन्न न्यायालयों और मानवाधिकार संगठनों के दफ़्तरों में धूल खा रही हैं।

3) पिछले दो दशक में अकेले उत्तरप्रदेश में 800 एनकाउंटर हुए।

4) यहाँ तक कि कांग्रेस शासित राज्य महाराष्ट्र में पिछले कुछ वर्षों में 400 एनकाउंटर हुए।

अब जो लोग जागरुक हैं और राजनैतिक खबरों पर ध्यान रखते हैं, वे बतायें कि इतने सैकड़ों मामलों में क्या कभी किसी ने, किसी राज्य के मुख्यमंत्री के खिलाफ़ मीडिया में ऐसा दुष्प्रचार और घटिया अभियान देखा है? इतने सारे एनकाउण्टर के मामलों में विभिन्न राज्यों में पुलिस के कितने उच्चाधिकारियों को सजा अथवा मुकदमे दर्ज हुए हैं? क्या महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश या आंध्रप्रदेश में हुए एनकाउण्टर के लिये वहाँ के मुख्यमंत्री से जवाब-तलब हुए, या "शिकंजा" कसा गया? नहीं… क्योंकि यदि ऐसा होता तो जिन राज्यों में केन्द्र के जिम्मे सुरक्षा व्यवस्था है उनमें जैसे जम्मू-कश्मीर, मणिपुर अथवा झारखण्ड (राष्ट्रपति शासन) आदि में होने वाले किसी भी एनकाउंटर के लिये मनमोहन-चिदम्बरम या प्रतिभा पाटिल को जिम्मेदार माना जायेगा? और क्या मीडिया वालों को उनसे जवाबतलब करना चाहिये? सुरक्षा बलों द्वारा वीरप्पन की हत्या के बाद, उसकी पत्नी ने भी CBI के विरुद्ध चेन्नई हाइकोर्ट में अपील की थी, लेकिन तब तो कर्नाटक-तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के खिलाफ़ मीडिया ने कुछ नहीं कहा था? तो फ़िर अकेले नरेन्द्र मोदी को क्यों निशाना बनाया जा रहा है?

जवाब वही है, जो मैंने ऊपर दिया है… गुजरात के तीव्र विकास से "जलन" की भावना और "हिन्दुत्व के आइकॉन" को ध्वस्त करने की प्रबल इच्छा… तथा सबसे बड़ी बात "युवराज" की ताज़पोशी में बड़ा रोड़ा बनने जा रहे तथा भविष्य में कांग्रेस के लिये सबसे बड़ा राजनैतिक खतरा बने हुए नरेन्द्र भाई मोदी को खत्म करना। (ज़रा याद कीजिये राजेश पायलट, माधवराव सिंधिया, जीएमसी बालयोगी, पीआर कुमारमंगलम जैसे ऊर्जावान और युवा नेताओं की दुर्घटनाओं में मौत हुई है, क्योंकि ये सभी साफ़ छवि वाले व्यक्ति भविष्य में प्रधानमंत्री पद के दावेदार बन सकते थे)। फ़िलहाल गुजरात में 20 साल से दुरदुराई हुई और सत्ता के दरवाजे से बाहर बैठी कांग्रेस CBI का उपयोग करके नरेन्द्र मोदी को "राजनैतिक मौत" मारना चाहती है, लेकिन जैसे पहले भी कई कोशिशें नाकामयाब हुई हैं, आगे भी होती रहेंगी, क्योंकि एक तो कांग्रेस की "नीयत" ठीक नहीं है और दूसरे वह ज़मीनी राजनैतिक लड़ाई लड़ने का दम नहीं रखती।

केन्द्र की कांग्रेस सरकारों द्वारा CBI का दुरुपयोग कोई नई बात नहीं है, षडयन्त्र, धोखाधड़ी, जालसाजी, पीठ पीछे से वार करना आदि कांग्रेस का पुराना चरित्र है, ज़रा याद कीजिये अमेठी के लोकप्रिय नेता संजय सिंह वाले केस को… एक समय कांग्रेस के अच्छे मित्रों में से एक संजय सिंह को जब कांग्रेस ने "खत्म" करने का इरादा किया तो बैडमिंटन खिलाड़ी सैयद मोदी की हत्या के केस में संजय सिंह को फ़ँसाया गया और मोदी की पत्नी अमिता और संजय सिंह के तथाकथित नाजायज़ सम्बन्धों के बारे में अखबारों में रोज़-दर-रोज़ नई-नई कहानियाँ "प्लाण्ट" की गईं, सैयद मोदी की हत्या को संजय-अमिता के रिश्तों से जोड़कर कांग्रेसी दरबार के चारण-भाट अखबारों ने चटखारेदार खबरें प्रकाशित कीं (गनीमत है कि उस समय आज की तरह कथित "निष्पक्ष" और सबसे तेज़ चैनल नहीं थे…)। आज 20 साल बाद क्या स्थिति है? वह केस न्यायालय में टिक नहीं पाया, CBI ने मामले की फ़ाइल बन्द कर दी, और कांग्रेस जिसे "बड़ा षडयंत्र" बता रही थी, वैसा कुछ भी साबित नहीं हो सका, तो क्या हुआ… संजय सिंह का राजनैतिक खात्मा तो हो गया।

राजनैतिक विश्लेषकों को बोफ़ोर्स घोटाले से ध्यान बँटाने के लिये और वीपी सिंह की उजली छवि को मलिन करने के लिये CBI की मदद और जालसाजी से रचा गया "सेंट किट्स काण्ड" भी याद होगा, जब कहा गया कि एक अनाम से द्वीप के एक अनाम से बैंक में वीपी सिंह और इनके बेटे के नाम लाखों डालर जमा हैं। लेकिन अन्त में क्या हुआ, जालसाजी उजागर हो गई, कांग्रेस बेनकाब हुई और चुनाव में हारी… ऐसे कई केस हैं, जहाँ CBI "कांग्रेस ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन" सिद्ध हुई है… और आज एक हिस्ट्री शीटर, जिसके ऊपर 60 से अधिक मामले हैं और जिसके घर के कुंए से 40 एके-47 रायफ़लें निकली हैं उस सोहराबुद्दीन की मौत पर कांग्रेस "घड़ियाली आँसू" बहा रही है, जो उसे बहुत महंगा पड़ेगा यह बात वह समझ नहीं रही।

अब एक नज़र डालते हैं हमारी "माननीय न्यायपालिका" पर (मैंने "माननीय" तो कह ही दिया है, आप इसमें 100 का गुणा कर लें… इतनी माननीय…। ताकि कोई मुझ पर न्यायालय की अवमानना का दावा न कर सके…)

- सोहराबुद्दीन के केस में "बड़े षडयन्त्र की जाँच" के आदेश "माननीय" जस्टिस तरुण चटर्जी ने अपने रिटायर होने की आखिरी तारीख को दिये (तरुण चटर्जी साहब को रिटायर होने के तुरन्त बाद असम और अरुणाचल प्रदेश के सीमा विवाद में मध्यस्थ के बतौर नियुक्ति मिल गई) (क्या गजब का संयोग है…)।

- इसी प्रकार SIT (Special Investigation Team) को नरेन्द्र मोदी से पूछताछ करने के आदेश सुप्रीम कोर्ट के "माननीय" न्यायाधीश अरिजीत पसायत ने भी अपनी नौकरी के अन्तिम दिन दिये (रिटायर होने के मात्र 6 दिनों के भीतर केन्द्र सरकार द्वारा पसायत साहब को CAT (Competition Appellate Tribunal) का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया) (ये भी क्या जोरदार संयोग है…)।

- भोपाल गैस काण्ड में कमजोर धाराएं लगाकर केस को मामूली बनाने वाले वकील जो थे सो तो थे ही, "माननीय" (फ़िर से माननीय) जस्टिस एएम अहमदी साहब भी रिटायर होने के बाद भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट के अध्यक्ष बने, जो अब भोपाल पर हुए हल्ले-गुल्ले के बाद त्यागपत्र देकर शहीदाना अन्दाज़ में रुखसत हुए हैं… (यह भी क्या सॉलिड संयोग है…)।

खैर पुरानी बातें जाने दीजिये - अभी बात करते हैं "माननीय" जस्टिस तरुण चटर्जी की… CBI ने गाजियाबाद के GPF घोटाले में तरुण चटर्जी के साथ-साथ 23 अन्य न्यायाधीशों के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर करने की सिफ़ारिश की थी। जस्टिस चटर्जी साहब के खिलाफ़ पुख्ता केस इसलिये नहीं बन पाया, क्योंकि मामले के मुख्य गवाह न्यायालय के क्लर्क आशुतोष अस्थाना की गाजियाबाद के जेल में "संदिग्ध परिस्थितियों" में मौत हो गई। इस क्लर्क ने चटर्जी साहब समेत कई जजों के नाम अपने रिकॉर्डेड बयान में लिये थे। अस्थाना के परिवारवालों ने आरोप लगाये हैं कि "विशिष्ट और वीआईपी" व्यक्तियों को बचाने की खातिर अस्थाना को हिरासत में जहर देकर मार दिया गया। फ़िर भी मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन के आदेश पर सीबीआई ने जस्टिस चटर्जी से उनके कोलकाता के निवास पर पूछताछ की थी। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक चटर्जी के सुपुत्र ने भी महंगे लैपटॉप और फ़ोन के "उपहार"(?) स्वीकार किये थे।


वैसे "माननीय" जस्टिस चटर्जी साहब ने सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपनी सम्पत्ति का खुलासा किया है  जिससे पता चलता है कि वे बहुत ही "गरीब" हैं, क्योंकि उनके पास खुद का मकान नहीं है, उन्होंने सिर्फ़ 10,000 रुपये म्युचुअल फ़ण्ड में लगाये हैं और 10,000 की ही एक एफ़डी है, हालांकि उनके पास एक गाड़ी Tavera है जबकि दूसरी गाड़ी होण्डा सिएल के लिये उन्होंने बैंक से कर्ज़ लिया है। (वैसे एक बात बताऊं, मेरी दुकान के सामने, एक चाय का ठेला लगता है उसके मालिक ने कल ही मेरे यहाँ से उसकी 20,000 रुपये की एफ़डी की फ़ोटो कॉपी करवाई है) अब बताईये भला, इतने "गरीब" और "माननीय" न्यायाधीश कभी CBI और अपने पद का दुरुपयोग कर सकते हैं क्या? नहीं…नहीं… ज़रूर मुझे ही कोई गलतफ़हमी हुई होगी…

खैर जाने दीजिये, नरेन्द्र भाई मोदी… यदि आपको यह लगता है कि केन्द्र की निगाह में गुजरात एक "शत्रु राज्य" है, तो सही ही होगा, क्योंकि मुम्बई-भिवण्डी-मालेगाँव के दंगों के बावजूद सुधाकरराव नाईक या शरद पवार को कभी "हत्यारा" नहीं कहा गया… एक पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा दिल्ली में चुन-चुनकर मारे गये हजारों सिखों को कभी भी "नरसंहार" नहीं कहा गया… हमारे टैक्स के पैसों पर पलने वाले कश्मीर और वहाँ से हिन्दुओं के पलायन को कभी "Genocide" (जातीय सफ़ाया) नहीं कहा जाता… वारेन एण्डरसन को भागने में मदद करने वाले भी "मासूम" कहलाते हैं… यह सूची अनन्त है। लेकिन नरेन्द्रभाई, आप निश्चित ही "शत्रु" हैं, क्योंकि गुजरात की जनता लगातार भाजपा को वोट देती रहती है। आपको "हत्यारा", "तानाशाह", "अक्खड़", "साम्प्रदायिक", "मुस्लिम विरोधी" जैसा बहुत कुछ लगातार कहा जाता रहेगा… इसमें गलती आपकी भी नहीं है, गलती है गुजरात की जनता की… जो भाजपा को वोट दे रही है। एक तो आप किसी की कठपुतली नहीं हैं, ऊपर से तुर्रा यह कि लाखों-करोड़ों लोग आपको प्रधानमंत्री बनवाने का सपना भी देख रहे हैं…जो कि "योग्य युवराज"(?) के होते हुए एक बड़ा जुर्म माना जाता है… तो सीबीआई भी बेचारी क्या करे, वे भी तो किसी के "नौकर हैं ना… "आदेश" का पालन तो उन्हें करना ही पड़ेगा…।

जाते-जाते "एक हथौड़ा" और झेल जाईये… प्रस्तुत वीडियो में नरेन्द्र मोदी के घोर विरोधी रहे पूर्व कांग्रेसी यतीन ओझा ने रहस्योद्घाटन किया है, कि तीन साल पहले दिल्ली में अहमद पटेल के बंगले पर नरेन्द्रभाई मोदी को "फ़ँसाने" की जो रणनीति बनाई गई थी, वे उसके साक्षी हैं। उल्लेखनीय है कि यतीन ओझा वह व्यक्ति हैं जो नरेन्द्र मोदी के सामने उस समय चुनाव लड़े थे, जब कांग्रेस के सभी दिग्गजों ने पक्की हार को देखते हुए मोदी के सामने खड़े होने से इंकार कर दिया था…

डायरेक्ट लिंक http://www.youtube.com/watch?v=_U6zyHSvTYA

 

सिर्फ़ विदेशी नहीं, बल्कि देशी कम्पनियाँ भी खनिज सम्पदा लूट रही हैं… (सन्दर्भ - उड़ीसा का खनन घोटाला)… Orissa Mining Scam, Aditya Birla and Vedanta

कर्नाटक के रेड्डी बन्धुओं द्वारा किये गये अरबों रुपये के खनन घोटाले के बारे में काफ़ी कुछ लिखा-पढ़ा जा चुका है, इसी प्रकार झारखण्ड के (भ्रष्टाचार में "यशस्वी") मुख्यमंत्री मधु कौड़ा के बारे में भी हंगामा बरपा हुआ था और उनके रुपयों के लेनदेन और बैंक खातों के बारे में अखबार रंगे गये हैं। लगता है कि भारत की खनिज सम्पदा, कोयला, लौह अयस्क इत्यादि कई-कई अफ़सरों, नेताओं, ठेकेदारों (और अब नक्सलियों और माओवादियों) के लिये भी अनाप-शनाप कमाई का साधन बन चुकी है, जहाँ एक तरफ़ नेताओं और अफ़सरों की काली कमाई स्विस बैंकों और ज़मीनों-सोने-कम्पनियों को खरीदने में लगती है, वहीं दूसरी तरफ़ नक्सली खनन के इस काले पैसे से हथियार खरीदना, अन्दरूनी आदिवासी इलाकों में अपने पठ्ठे तैयार करने और अपना सूचना तंत्र मजबूत करने में लगाते हैं।


ट्रांसपेरेंसी इण्टरनेशनल के एक सक्रिय कार्यकर्ता श्री बिस्वजीत मोहन्ती द्वारा सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार आदित्य बिरला और एस्सेल समूह द्वारा लगभग 2000 करोड़ रुपये से अधिक का अवैध उत्खनन किया गया है। इस जानकारी के अनुसार उड़ीसा प्रदूषण नियंत्रण मण्डल और उड़ीसा वन विभाग के उच्च अधिकारियों की कार्यशैली और निर्णय भी गम्भीर आशंकाओं के साये में हैं। उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भी कर्नाटक के येद्दियुरप्पा की तरह ईमानदार और साफ़ छवि के माने जाते हैं, लेकिन उनकी पीठ पीछे कम्पनियाँ और अधिकारी मिलकर जो खेल कर रहे हैं, वह अकल्पनीय है। ऐसा तो सम्भव ही नहीं है कि जिन नक्सलियों और माओवादियों का राज देश के एक-तिहाई हिस्से (जिसमें उड़ीसा का बड़ा इलाका शामिल है) में चलता हो और उन्हें इस अवैध उत्खनन के बारे में पता न हो।

असल में यह सारा खेल ठेकेदार-कम्पनियों और नक्सलियों का मिलाजुला होता है, सबका हिस्सा बँटा हुआ होता है, क्योंकि उस इलाके में सरकारों की तो कुछ चलती ही नहीं है। उदाहरण के तौर पर उड़ीसा के विजिलेंस विभाग ने 151 छोटी खदानों को पर्यावरण कानूनों और राजस्व के विभिन्न मामलों में केस दर्ज करके बन्द करवा दिया, लेकिन घने जंगलों में स्थित बड़ी कम्पनियों को लूट का खुला अवसर आज भी प्राप्त है। क्योंझर (डोलोमाइट), जिलिम्गोटा (लौह अयस्क) और कसिया (मैगनीज़) की एस्सेल और बिरला की खदानें 2001 से 2008 तक बेरोकटोक अवैध चलती रहीं हैं। इन कम्पनियों को सिर्फ़ 2,76,000 मीट्रिक टन का खनन करने की अनुमति थी, जबकि इन्होंने इस अवधि में 1,38,0391 मीट्रिक टन की खुदाई करके सरकार को सिर्फ़ 6 साल में 1178 करोड़ का चूना लगा दिया। संरक्षित वन क्षेत्र में अमूमन खुदाई की अनुमति नहीं दी जाती, लेकिन इधर वन विभाग भी मेहरबान है और उसने 127 हेक्टेयर के वन क्षेत्र में खदान बनाने की अनुमति दे डाली… और फ़िर भी अनुमति धरी रह गई अपनी जगह… क्योंकि जब वास्तविक स्थिति देखी गई तो "भाई" लोगों ने 127 की बजाय 242 हेक्टेयर वन क्षेत्र में खुदाई कर डाली। यदि पर्यावरण प्रेमी और सूचना के अधिकार वाले जागरुक लोग समय पर आवाज़ नहीं उठाते तो शायद ये कम्पनियाँ खुदाई करते-करते भुवनेश्वर तक पहुँच जातीं।

मजे की बात तो यह है कि इन कम्पनियों को पर्यावरण मंत्रालय और राज्य के खनन विभागों की अनुमति भी बड़ी जल्दी मिल जाती है… क्योंकि इन विभागों के उच्च अधिकारियों से लेकर वन-रक्षक के हाथ "रिश्वत के ग्रीज़" से चिकने बना दिये जाते हैं।सूचना के अधिकार कानून से भी क्या होने वाला है, क्योंकि सरकार ने अपने लिखित जवाब में बता दिया कि "आपकी शिकायत सही पाई गई है और उक्त खदान में खनन कार्य बन्द किया जा चुका है…" जबकि उस स्थान पर जाकर देखा जाये तो वह खदानें बाकायदा उसी गति से चल रही हैं, अब उखाड़ लो, जो उखाड़ सकते हो…।



सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित एक विशेष पैनल ने अपनी सनसनीखेज़ रिपोर्ट में पाया है कि उड़ीसा में 215 खदानें ऐसी हैं, जिनके खनन लाइसेंस 20 साल पहले ही खत्म हो चुका है। पैनल ने कहा है कि घने जंगलों में ऐसी कई खदाने हैं जो अवैध रुप से चल रही हैं जिन्होंने न तो किसी प्रकार का पर्यावरण NOC लिया है न ही उनके लाइसेंस हैं (कोई बच्चा भी बता सकता है कि इस प्रकार की खदानों से किसकी कमाई होती होगी… पता नहीं नक्सलवादी नेता ऊँचे-ऊँचे आदर्शों की बातें क्यों करते हैं?)। इस लूट में कोल इंडिया लिमिटेड के उच्चाधिकारियों की मिलीभगत से महानदी कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड भी दोनों हाथों से अवैध खनन कर रही है। यह खेल "खनिज सम्पदा छूट कानून 1960" के नियम 24A(6) के तहत किया जा रहा है, जबकि इस कानून को इसलिये बनाया गया था ताकि कोई खदान सरकारी स्वीकृति मिलने की देरी होने पर भी चालू हालत में रखी जा सके। इस नियम के तहत जब तक लाइसेंस नवीनीकरण नहीं होता तब तक उसी खदान को अस्थायी तौर पर शुरु रखने की अनुमति दी जाती है। उड़ीसा में इन सैकड़ों मामलों में खदानों के लाइसेंस पूरे हुए 10, 15 या 20 साल तक हो चुके हैं, न तो नवीनीकरण का आवेदन किया गया, न ही खदान बन्द की गई…।

राष्ट्रीय वन्य जीव क्षेत्र (नेशनल पार्क) के आसपास कम से कम 2 किमी तक कोई खदान नहीं होनी चाहिये, लेकिन इस नियम की धज्जियाँ भी सरेआम उड़ीसा में उड़ती नज़र आ जाती हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने इन खदान मालिकों को आज के वर्तमान बाजार भाव के हिसाब से लीज़ का पैसा चुकाने को कहा है, और पिछली लूट को यदि छोड़ भी दें तब भी सरकार के खजाने में इस कदम से करोड़ों रुपये आयेंगे। उल्लेखनीय है कि जब खनन करने वाली कम्पनी को 5000 रुपये का फ़ायदा होता है तब सरकार के खाते में सिर्फ़ 27 रुपये आते हैं (रॉयल्टी के रुप में), लेकिन ये बड़ी कम्पनियाँ और इनके मालिक इतने टुच्चे और नीच हैं कि ये 27 रुपये भी सरकारी खजाने में जमा नहीं करना चाहते, इसलिये अवैध खनन के जरिये अफ़सरों, ठेकेदारों और नक्सलियों-माओवादियों की मिलीभगत से सरकार को (यानी प्रकारांतर से हमें भी) चूना लगता रहता है। आदित्य बिरला की कम्पनी पर आरोप है कि उसने लगभग 2000 करोड़ रुपये का अवैध खनन सिर्फ़ उड़ीसा में किया है। यदि सूचना का अधिकार न होता तो विश्वजीत मोहन्ती जैसे कार्यकर्ताओं की मेहनत से हमें यह सब कभी पता नहीं चलता…। वेदान्ता और पोस्को द्वारा की जा रही लूट के बारे में काफ़ी शोरगुल और हंगामा होता रहता है, लेकिन भारतीय कम्पनियों द्वारा खनन में तथा माओवादियों द्वारा जंगलों में अवैध वसूली और लकड़ी/लौह अयस्क तस्करी के बारे में काफ़ी कम बात की जाती है, जबकि सारे के सारे एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं (कुछ झोलेवालों को यह मुगालता है कि नक्सलवादी या माओवादी किसी परम पवित्र उद्देश्य की लड़ाई लड़ रहे हैं…)। उधर रेड्डी बन्धुओं ने तो आंध्रप्रदेश और कर्नाटक की सीमा के चिन्ह भी मिटा डाले हैं ताकि जब जाँच हो, या कोई ईमानदार अधिकारी उधर देखने जाये तो उसे, कभी कर्नाटक तो कभी आंध्रप्रदेश की सीमा का मामला बताकर केस उलझा दिया जाये…

लेकिन सूचना के इस अधिकार से हमें सिर्फ़ घोटाले की जानकारी ही हुई है… न तो कम्पनियों का कुछ बिगड़ा, न ही अधिकारियों-ठेकेदारों का बाल भी बाँका हुआ, न ही मुख्यमंत्री या किसी अन्य मंत्री ने इस्तीफ़ा दिया … सूचना हासिल करके क्या उखाड़ लोगे? सजा दिलाने के लिये रास्ता तो थाना-कोर्ट-कचहरी-विधानसभा-लोकसभा के जरिये ही है, जहाँ इन बड़ी-बड़ी कम्पनियों के दलाल और शुभचिन्तक बैठे हैं। मध्यप्रदेश और राजस्थान के जिन IAS अधिकारियों के घरों से छापे में करोड़ों रुपये निकल रहे हैं, उन्हें सड़क पर घसीटकर जूतों से मारने की बजाय उन्हें उच्च पदस्थापनाएं मिल जाती हैं तो कैसा और क्या सिस्टम बदलेंगे हम और आप? 

भई… जब देश की राजधानी में ऐन प्रधानमंत्री की नाक के नीचे कॉमनवेल्थ खेलों के नाम पर करोड़ों रुपये दिनदहाड़े लूट लिये जाते हों तो उड़ीसा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ के दूरदराज के घने जंगलों में देखने वाला कौन है… यह देश पूरी तरह लुटेरों की गिरफ़्त में है…कोई दिल्ली में लूट रहा है तो कोई क्योंझर या मदुरै या जैसलमेर में…

Friday, August 6, 2010

तस्वीर बोलती है ...क्या


कह नही पाता

ना जब तक देख लू तुमको चैन से रह नही पाता 
मै दारिया हूँ मगर मर्जी से अपने बह नही पाता
कैसी उ़लझन में उलझा हूँ भला ये तुम क्या जानोगे 
तुम्ही को चाहता हूँ और तुमसे कह नही पाता 
विजय कुमार वर्मा 

जब विद्यासागर जी ने चप्पल फेंकी

जब विद्यासागर जी ने चप्पल फेंकी फिर एक चप्पल चली। रोज ही कहीं ना कहीं यह पदत्राण थलचर हाथों में आ कर नभचर बन अपने गंत्वय की ओर जाने क...