Tuesday, February 9, 2010

शोक की संतान

हृदय छोटा हो,
तो शोक वहां नहीं समाएगा।
और दर्द दस्तक दिये बिना
दरवाजे से लौट जाएगा।
टीस उसे उठती है,
जिसका भाग्य खुलता है।
वेदना गोद में उठाकर
सबको निहाल नहीं करती,
जिसका पुण्य प्रबल होता है,
वह अपने आसुओं से धुलता है।
तुम तो नदी की धारा के साथ
दौड़ रहे हो।
उस सुख को कैसे समझोगे,
जो हमें नदी को देखकर मिलता है।
और वह फूल
तुम्हें कैसे दिखाई देगा,
जो हमारी झिलमिल
अंधियाली में खिलता है?
हम तुम्हारे लिये महल बनाते हैं
तुम हमारी कुटिया को
देखकर जलते हो।
युगों से हमारा तुम्हारा
यही संबंध रहा है।
हम रास्ते में फूल बिछाते हैं
तुम उन्हें मसलते हुए चलते हो।
दुनिया में चाहे जो भी निजाम आए,
तुम पानी की बाढ़ में से
सुखों को छान लोगे।
चाहे हिटलर ही
आसन पर क्यों न बैठ जाए,
तुम उसे अपना आराध्य
मान लोगे।
मगर हम?
तुम जी रहे हो,
हम जीने की इच्छा को तोल रहे हैं।
आयु तेजी से भागी जाती है
और हम अंधेरे में
जीवन का अर्थ टटोल रहे हैं।
असल में हम कवि नहीं,
शोक की संतान हैं।
हम गीत नहीं बनाते,
पंक्तियों में वेदना के
शिशुओं को जनते हैं।
झरने का कलकल,
पत्तों का मर्मर
और फूलों की गुपचुप आवाज़,
ये गरीब की आह से बनते हैं। 
 
- राम धारी सिंह दिनकर

बालिका से वधू

माथे में सेंदूर पर छोटी
दो बिंदी चमचम-सी,
पपनी पर आँसू की बूँदें
मोती-सी, शबनम-सी।
लदी हुई कलियों में मादक
टहनी एक नरम-सी,
यौवन की विनती-सी भोली,
गुमसुम खड़ी शरम-सी।
पीला चीर, कोर में जिसके
चकमक गोटा-जाली,
चली पिया के गांव उमर के
सोलह फूलों वाली।
पी चुपके आनंद, उदासी
भरे सजल चितवन में,
आँसू में भींगी माया
चुपचाप खड़ी आंगन में।
आँखों में दे आँख हेरती
हैं उसको जब सखियाँ,
मुस्की आ जाती मुख पर,
हँस देती रोती अँखियाँ।
पर, समेट लेती शरमाकर
बिखरी-सी मुस्कान,
मिट्टी उकसाने लगती है
अपराधिनी-समान।
भींग रहा मीठी उमंग से
दिल का कोना-कोना,
भीतर-भीतर हँसी देख लो,
बाहर-बाहर रोना।
तू वह, जो झुरमुट पर आयी
हँसती कनक-कली-सी,
तू वह, जो फूटी शराब की
निर्झरिणी पतली-सी।
तू वह, रचकर जिसे प्रकृति
ने अपना किया सिंगार,
तू वह जो धूसर में आयी
सुबज रंग की धार।
मां की ढीठ दुलार! पिता की
ओ लजवंती भोली,
ले जायेगी हिय की मणि को
अभी पिया की डोली।
कहो, कौन होगी इस घर की
तब शीतल उजियारी?
किसे देख हँस-हँस कर
फूलेगी सरसों की क्यारी?
वृक्ष रीझ कर किसे करेंगे
पहला फल अर्पण-सा?
झुकते किसको देख पोखरा
चमकेगा दर्पण-सा?
किसके बाल ओज भर देंगे
खुलकर मंद पवन में?
पड़ जायेगी जान देखकर
किसको चंद्र-किरन में?
महँ-महँ कर मंजरी गले से
मिल किसको चूमेगी?
कौन खेत में खड़ी फ़सल
की देवी-सी झूमेगी?
बनी फिरेगी कौन बोलती
प्रतिमा हरियाली की?
कौन रूह होगी इस धरती
फल-फूलों वाली की?
हँसकर हृदय पहन लेता जब
कठिन प्रेम-ज़ंजीर,
खुलकर तब बजते न सुहागिन,
पाँवों के मंजीर।
घड़ी गिनी जाती तब निशिदिन
उँगली की पोरों पर,
प्रिय की याद झूलती है
साँसों के हिंडोरों पर।
पलती है दिल का रस पीकर
सबसे प्यारी पीर,
बनती है बिगड़ती रहती
पुतली में तस्वीर।
पड़ जाता चस्का जब मोहक
प्रेम-सुधा पीने का,
सारा स्वाद बदल जाता है
दुनिया में जीने का।
मंगलमय हो पंथ सुहागिन,
यह मेरा वरदान;
हरसिंगार की टहनी-से
फूलें तेरे अरमान।
जगे हृदय को शीतल करने-
वाली मीठी पीर,
निज को डुबो सके निज में,
मन हो इतना गंभीर।
छाया करती रहे सदा
तुझको सुहाग की छाँह,
सुख-दुख में ग्रीवा के नीचे
रहे पिया की बाँह।
पल-पल मंगल-लग्न, ज़िंदगी
के दिन-दिन त्यौहार,
उर का प्रेम फूटकर हो
आँचल में उजली धार।
        राम धारी सिंह दिनकर 

Monday, February 8, 2010

राजनीति की नीति

राजनीति की नीति का, है ना पारावार

जैसे चाहो मोड़ दो अर्थों का संसार



पल पल निष्ठा बदलना, राजनीति का खेल

आज गले जो मिल रहे कल वे ही अनमेल



मनुज बदलते हैं नहीं, बदल रहे हैं अर्थ

कल जिनके गुन गा रहे, अब दिखते वे व्यर्थ



मंत्री पद के लोभ में दल निष्ठा को तोड़

छोड़ छाड़ कर जा रहे ऐसी देखी होड़



संप्रदाय अरु जाति की राजनीति बेकार

कटुता दिन दिन बढ़ रही नफ़रत का संसार



सत्ता के सुख भोग की होड़ लगी चहुँ ओर

लूट मची सब ओर है, जित देखो तित चोर
              कन्हेया लाल शर्मा

kumar visvash

दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है !


मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है !!

मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है !

ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है !!



मोहब्बत एक एहसासों की पावन सी कहानी है !

कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है !!

यहाँ सब लोग कहते हैं, मेरी आंखों में आँसू हैं !

जो तू समझे तो मोती है, जो ना समझे तो पानी है !!



समंदर पीर का है अन्दर, लेकिन रो नही सकता !

यह आँसू प्यार का मोती है, इसको खो नही सकता !!

मेरी चाहत को दुल्हन बना लेना, मगर सुन ले !

जो मेरा हो नही पाया, वो तेरा हो नही सकता !!



भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हँगामा

हमारे दिल में कोई ख्वाब पला बैठा तो हँगामा,

अभी तक डूब कर सुनते थे हम किस्सा मुहब्बत का

मैं किस्से को हक़ीक़त में बदल बैठा तो हँगामा !!!

Sunday, July 19, 2009

पंचायत KA

पंचायत के आगे नतमस्तक है सरकार नहीं सम्भाल पा रहा है प्रशासन यंहा की व्यवस्था .......... जहा हम सारी दुनिया के साथ कदम ताल कर रहे है वही अभी हम हरियाणा में काफी पीछे है .......जहा लड़कियों के जनसंख्या काफी कम है शादी परेशानी और मौत का दूसरा नाम है ....अगर हो भी जाये तो गोत्र ...नहीं जीने देती क्यों की हमारे गोत्र में शादी .............अभी हाल में हुई एक घटना में एक लड़के ने I इसीलिए जहर खा लिया ........और पंचायत ने उसके परिवार वालो को सामाजिक बहिष्कार कर गाँव छोड़ने का तुगलकी फरमान सुना डाला ...क्यों की उन्होंने उस लड़की से शादी की जिस गोत्र के लोग उस गाँव में रहते थे ............शुरू हो गया पंचायतो का दौर और हुआ वही जिसका डर था ..........गाँव से निकल जाने का आदेश पंचायत द्वारा .............कई बार उठा बैठक हुई लेकिन फैसला वही रहा .......या तो गाँव छोडो या लड़की को लड़का तलक दे कर अपनी बहन माने आप ही सोचिये ये TUGLKI PHERMAN नहीं तो और क्या है ...क्या ESHI भारत की कल्पना हमारे महापुरषों ने की थी ..आज जहा सब स्वतंत्र है ....जहा दूसरी जाति शादी करनी को प्रोत्सहन दिया जाता है ..वही यहाँ DUSHRI गोत्र में शादी करने पर भी हंगामा बरपा रही है पंचायत .......और तो और प्रशासन भी नाकाम है वह पीडित परिवार को सही न्याय नहीं दिला पा रही है .......ये पंचायत क्या करेगी अभी तो पता नहीं .......लेकिन लड़के ने जहर खा कर अपनी जीवन लीला समाप्त करने की कोशिश जरुर की
पंचायत के आगे नतमस्तक है सरकार नहीं सम्भाल पा रहा है प्रशासन यंहा की व्यवस्था .......... जहा हम सारी दुनिया के साथ कदम ताल कर रहे है वही अभी हम हरियाणा में काफी पीछे है .......जहा लड़कियों के जनसंख्या काफी कम है शादी परेशानी और मौत का दूसरा नाम है ....अगर हो भी जाये तो गोत्र ...नहीं जीने देती क्यों की हमारे गोत्र में शादी .............अभी हाल में हुई एक घटना में एक लड़के ने I इसीलिए जहर खा लिया ........और पंचायत ने उसके परिवार वालो को सामाजिक बहिष्कार कर गाँव छोड़ने का तुगलकी फरमान सुना डाला ...क्यों की उन्होंने उस लड़की से शादी की जिस गोत्र के लोग उस गाँव में रहते थे ............शुरू हो गया पंचायतो का दौर और हुआ वही जिसका डर था ..........गाँव से निकल जाने का आदेश पंचायत द्वारा .............कई बार उठा बैठक हुई लेकिन फैसला वही रहा .......या तो गाँव छोडो या लड़की को लड़का तलक दे कर अपनी बहन माने आप ही सोचिये ये TUGLKI PHERMAN नहीं तो और क्या है ...क्या ESHI भारत की कल्पना हमारे महापुरषों ने की थी ..आज जहा सब स्वतंत्र है ....जहा दूसरी जाति शादी करनी को प्रोत्सहन दिया जाता है ..वही यहाँ DUSHRI गोत्र में शादी करने पर भी हंगामा बरपा रही है पंचायत .......और तो और प्रशासन भी नाकाम है वह पीडित परिवार को सही न्याय नहीं दिला पा रही है .......ये पंचायत क्या करेगी अभी तो पता नहीं .......लेकिन लड़के ने जहर खा कर अपनी जीवन लीला समाप्त करने की कोशिश जरुर की

जब विद्यासागर जी ने चप्पल फेंकी

जब विद्यासागर जी ने चप्पल फेंकी फिर एक चप्पल चली। रोज ही कहीं ना कहीं यह पदत्राण थलचर हाथों में आ कर नभचर बन अपने गंत्वय की ओर जाने क...