Thursday, November 10, 2016

उत्तर प्रदेश की त्रिशंकु विधानसभा की बिछती चौसर


उत्तर प्रदेश में सर्द की दस्तक के साथ चुनावी चौसर ने सरगर्मी बढ गर्इ है.राजनीति गलियारे भरे हुए हैं आैर बाहरी तापमान भले ही २४ हो लेकिन पार्टी मुख्यालयों के तापमान पर मर्इ का मौसम हावी है.चुनावी चौसर की बिछ रही बिसात में सभी अपनी मोहरें बिछने व्यस्त हैं.कोर्इ टिकट के लिए लाइन लगा रहा है तो कोर्इ मुख्यमंत्री पद का सपना संजाेए हैं.इस बिछती हुर्इ बिसात में मन किया की सबके दिल की हालत देखी जाए.चुनावी कबडडी में एक बार फिर से ताल ठोंकी जाए.मुलायम के दांव की मायावती के बिसात की आैर भाजपा के चार की आैर कांग्रेस के कमाल की चर्चा की जाए.फिर चार दिन का यह दृश्य हमें नजर आया.
भाजपा का पलडा फिलहाल भारी है.पिछले चुनाव में दूसरे तीसरे आैर चौथे नंबर पर रहे कर्इ प्रत्याशी पहले से ही भाजपा का दामन थाम चुके हैं. बाकी एक नंबर पर विजय पाने वाले भी टिकट के लिए लाइन में हैं. इतिहास गवाह है कि टिकट बंटने में जब जिस पार्टी में हंगामा हो तो वह जीत रही है.
लखनउ, बाराबंकी, फैजाबाद, बस्ती, कुशीनगर, गोरखपुर, गाेंडा, बहराइच, सुल्तानपुर, उन्नाव, अकबरपुर, कानपुर का कमोवेश यही हाल है.मतदाता यूं तो किसी से खुश नहीं है लेकिन यह भी सोच रहा कि एक बार मायावती आैर फिर मुलायम के बाद अब क्यों न उत्तर प्रदेश में भगवा रंग को भी देख लिया जाए.
बसपा पर इस बार मुस्लिम प्रत्याशी की होड लगी है अगर एेसा रहा है तो २९ प्रतिशत के वोट से मुख्यमंत्री तय करने वाले इस प्रदेश में मायावती का पलडा भारी है यह एसी आैर मुस्लिम को वोट प्रतिशत ३५ पार कर जाएगा खास बात यह है कि यह वर्ग वोट डालने के लिए जाने वाला वर्ग है.हालांकि कुर्सी पर कब्जा दिलाने वाले पंडित जी इस बार गायब हैं.
सपा के लिए खतरे की घंटी परिवार से ही नहीं समाज से भी बजी है.मुस्लिम यादव की गठजोड में ठाकुर साहब के ताव पर सवार होकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज सपा से मुस्लिम सटक रहा है.ठाकुर साहब भी खासे प्रभावित नहीं हैं इस बार आजम के बजाय नसीमुदृदीन सिदृकी चल रहे हैं.यादव जी की वजह से अन्य आेबीसी पहले ही झटका दे रहे हैं फिर चाहे वह पटेल लाबी हो यह फिर मौर्या
कांग्रेस २००९ के लोकसभा चुनाव में कमाल करने वाली कांग्रेस को इस प्रत्याशी भी मिलते नहीं दिखार्इ दे रहे हैं.जिलों के जिलाध्यक्ष ही पोस्टर बैनर चिपका कर दिल पर मरहम लगा रहे हैं.करीब चार दिनों में ९०० किलोमीटर की यात्रा में कांग्रेस के एक दो पोस्टर के अलावा दिवाली आैर छठ की बधार्इ का भी बैनर दिखार्इ नहीं दिया.
अंत में उत्तर प्रदेश की राजनीति में खेल बनाने बिगडने का काम पीस पार्टी,पटेल पार्टी, हैदराबाद वाली पार्टी आैर राजा भैया की एकल पार्टी सहित अन्य पार्टियां करेंगी.

चलते-चलते---नोट के सर्जिकल स्टाराइक ने भाजपा को आैर मजबूत कर दिया है मोदी का यह फैसला वोटरों को खासा लुभा रहा है एेसे में अगर भाजपा का प्रचार तंत्र बेहतर रहा आैर स्थानीय स्तर पर आेम माथुर सही प्रत्याशी चुन पाए तो भाजपा चुनाव जीत जाएगी वरना विधानसभा त्रिशंकु हो जाएगी.एेसे में अपनी जगह बचाने के लिए तीनों पार्टी गठबंधन कर सकती हैं क्यों कि सभी का मकसद एक है कि किसी भी तरह भाजपा की सत्ता को रोका जाए.

Sunday, October 16, 2016

कहीं फिर न हो कंधार कांड, परोसे जा रहे चाकू-कांटे

जयपुर. सीमा पार कर हुई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद देश की सीमा सहित देश के सभी हवाईअड्डे अलर्ट पर हैं। तो दूसरी तरफ विमानन कंपनियां सुरक्षा में चूक कर रही हैं। हवाईअड्डे पर जांच में नोंकदार या फिर ब्लेड तक रखवा लेने वाली सुरक्षा के बावजूद विमान में ही स्टील का चाकू और काफी नोंकदार कांटे परोसे जा रहे हैं। वह भी एयर इंडिया की उड़ान में जो कि १९९९ में अपने विमान आईसी ८१४ का अपहरण झेल चुका हैं। उस समय एयर इंडिया की अंतरराष्ट्रीय सेवा को इंडियन एयरलाइंस के नाम से जाना जाता था। 
विमानों में यह है प्रतिबंधित 
नागर विमानन सुरक्षा ब्यूरो (बीसीएएस)ने साफ तौर पर ७२ सामान की सीधी लिस्ट जारी की है। इन सभी को विमान में नहीं ले जाया जा सकता है। इसमें चाकू भी शामिल है। इसमें साफ है कि प्लास्टिक कटलरी में भी चाकू के लिए साफ माना किया गया है। हालांकि प्लास्टिक कटलरी में भी कई विमानन कंपनियां इसका इस्तेमाल कर रही हैं। इसके अलावा इसमें अन्य नुकली वस्तुएं भी शामिल हैं। इसके अनुसार स्टीनलेस स्टील का कांटा भी प्रयोग नहीं किया जा सकता है। क्या था कंधार कांड?
२४ दिसंबर १९९९ को  काठमांडू हवाईअड्डे से इंडियन एयरलाइंस के विमान आईसी ८१४ को छह आतंकवादियों ने हथियार के दम पर अपहरण कर लिया था।  उड़ान के बाद विमान का अपहरण कर कंधार ले जाया गया था। इसमें १८९ यात्री सवार थे। इस मामले में आतंकी मसूद अजहर, मुश्ताक अहमद और अहमद उमर शेख को छोडऩा पड़ा था।

Monday, May 16, 2016

"क्लासमेट" से "क़त्ल" तक के सफ़र में राजदेव और शहाबुद्दीन




पटना। ऐसे "कलम के सिपाही" बड़े ही विरले ही होते है जो अपने "जीवन पर छाये मौत के साये" के बावजूद सच के खातिर बेधड़क बेलाग बेख़ौफ़ होकर लिखते रहते है। धन दौलत और तमाम प्रलोभवनो के बावजूद राजदेव " सच की शम्मा" जलाते रहे।                      
 दिवंगत पत्रकार राजदेव रंजन के बारे कहा जा सकता है कि वह एक व्यवहार कुशल, कलम से समझौता करने से कोसों दूर एक निडर पत्रकार और एक सम्मानित बैनर के सहारे " सच को सच" कहने वाले पत्रकार थे। एक ही इलाके एक ही परिवेश में पीला बढे शहाबुद्दीन और राजदेव एक दूर से परिचित थे। साथ ही वक्त के बदलते दौर में दोनों दो अलग अलग राहो पर चल निकले।लेकिन एक दौर वो भी आया जब वो और शहाबुद्दीन के क्लास मेट भी रहे। दोनो ने एस साथ पीजी किया था।इसी की वजह से इलाके में माना जाता था कि वह सांसद के करीब होंगे लेकिन उनकी कालान्तर में उनकी धारदार और ईमानदार लेखनी ऐसा समझने की इजाजत नहीं देती थी। पत्रकारिता की में कलम की धार और प्रखर करते हुए राजदेव अपनी पढाई भी जारी रखे हुए थे। अपनी अपराध से जुडी रिपोर्टिंग को और सशक्त करने के खातिर वकालत की भी डिग्री ली थी राजदेव ने। इसी का असर था की वो कानून की बारीकियों को समझते हुए अपराध की खबरों की हर बारीकी को तह दर तह उधेड़ कर रख देते थे।                       
 सिवान की जमीनी हक़ीक़त के हर  उस सच से राजदेव ने अखबार के माध्य से उजागर किया और मार दिए जाने तक करते रहे। उनकी कलम ने हर उस सच को सच लिखा हर उस सियासी उत्पात से लोगो को रूबरू कराया बिना किसी हिचक के। उस वक्त भी राजदेव नहीं डरे जब "सिवान की फिज़ा" साहब के अलावा कोई और शब्द नहीं उड़ा करता था।                          
राजदेव रंजन ने सीवान में पिछले 24 सालों पत्रकारिता कर रहे थे। इस सच से भी आगत थे की वो विगत 9 सालों से अपराधियों के निशाने पर थे। यही कारण रहा है कि एक बार उनके दफ्तर पर भी अपराधियों ने उन पर हमला बोला था। राजदेव पर  2005 में भी उनके दफ्तर पर हमला हुआ था। राजदेव रंजन के सहयोगी रहे दुर्गाकांत उस समय उनके मौजूद थे। यह हमला अक्तूबर 2005 में हुआ था। रात आठ बजे के करीब कुछ लोगों ने ऑफिस के बाहर से राजदेव को आवाज देकर बाहर बुलाया और धमकाने के बाद बुरी तरह से पीटा था।लेकिन तब संयोगवश राजदेव को ज्यादा चोटे नहीं आई थी, क्योकि आस पास के लोगो के जुट जाने से हमलावर भाग गए थे। इसके बाद भी राजदेव ने अपने जीवन पर आफत आने के बाद भी सच को सच कहने वाली निर्भीक पत्रकारिता को जिंदा रखा था।                                                     
अपने जीवन पर अपराधियों की गिद्ध दृष्टि होने से राजदेव हमेशा से अवगत रहे थे। सीवान पुलिस को 2007 में ही पुलिस की स्पेशल ब्रांच ने जिले के 24 लोगों की जान को खतरा होने का इनपुट दिया था।इसकी जानकारी जिले के पुलिस कप्तान को भी दी गई थी।अपराधियो की इस हिटलिस्ट में राजदेव का भी नाम था। उस वक्त की जानकारी के मुताबिक तब सीवान जेल से ही 24 लोगों के नाम डेथ वारंट की लिस्ट जारी की गई थी। राजदेव के साथ काम करने वाले लोग भी बताते हैं कि सच को सच कहने की जुनूनी रिपोर्टिंग के कारण भी राजदेव को कई बार सीवान जेल से धमकी मिल चुकी थी। फिर भी निडर राजदेव न डरे न झुके न टूटे।                       
90 के दशक में शहाबुद्दीन ने बाहुबल और सियासत का कॉकटेल तैयार कर देश के प्रथम राष्ट्रपति की जन्मस्थली जीरादेई से बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ा और सफल भी रहे। ये दौर बिहारमे लालू यादव के सियासी उत्कर्ष का था। जीरादेई से मिली शहाबु की जीत ने लालू का ध्यान इस युवा तुर्क की ओर गया। फिर क्या था लालू के ऑफर को लपकते हुए शहाबुद्दीन ने सिवान के साहब की पदवी पा ली। फिर  आया वो दौर जब सांसद बन बैठे शहाबुद्दीन ने सिवान की धड़कनो पर भी अपनी हुकुमत कायम कर ली। दौर ऐसा भी आया जब बिहार पुलिस और साहब की फ़ौज प्रतापपुर गाँव में भीड़ गई। दोनों तरफ से कई लोग वीरगति को प्राप्त हुए। जिस तरह के अत्याधुनिक हथियारों का प्रयोग राजद सांसद के गुर्गो ने किया बिहार कुलिस समेत सभी सुरक्षा एजेंसियों के होश पूड गए।                  
अब बारी सरकार की थी। बात 2005 की है। फरवरी का विधान सभा चुनाव शुरू होने ही वाला था। दस फरवरी को चुनाव आयोग के निर्देश पर जिले में नए डीएम और बारह फरवरी को नए एसपी की पोस्टिंग सीवान में हुयी। डीएम सीके अनिल ने दस फरवरी को फर्स्ट हाफ में ही अपनी ज्वाइनिंग दी और अपने कंफिडेंशियल रूम में कैद हो गये। किसी से मुलाकात नहीं की सिवाय मण्डल कारा सिवान के जेल अधीक्षक के। कानून की सारी बारीकियों को दिन भर में सीके अनिल ने खंगाल डाला और दूसरे दिन ग्यारह फरवरी की रात बाहुबली राजद सांसद मो. शहाबुद्दीन को आदर्श कारा पटना भेज दिया। यह सब इतनी खामोशी से हुआ कि मीडिया को भी इसकी जानकारी 12 फरवरी को ही हुयी। बहरहाल, उसी दिन  नये एसपी रत्न संजय ने भी अपनी ज्वाइनिंग दे दी थी। इन दोनो अधिकारियों का जलवा ऐसा ही था जो सीवान की लगभग हर जरूरत पूरी करता रहा और इसका असर यह हुआ 10 फरवरी के पहले तक जिसका नाम जिले के तीस-बत्तीस लाख की आबादी की जुबान पर दहशतगर्द के रूप में आता था उसे बदलने में जरा भी देर नहीं लगी। विधि-व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में और राजद के बाहुबली सांसद मो. शहाबुद्दीन के सारे गुर्गे भूमिगत। लेकिन सभी देश के चार कोनो में छिपे हुए। यह इकबाल था सिवान जिला प्रशासन का। चुनाव परिणाम जो भी रहे, मुख्य विशेषता लॉ एण्ड आर्डर थी और लोग राहत की सांस ले रहे थे। इस दौर में भी राजदेव की रिपोर्ट में हर उस सच को लिखा जो पुरे देश के लोगो ने पढ़ा।                 
 इन सालो में खौफ़ और उपद्रव की।कहानियों ने एक नए क्षितिज को छु लिया था। सीवान की सामाजिक केमिस्ट्री बिलकुल ख़त्म हो गई थी।प्रशासन का इकबाल लौटते ही शहर और जिले की समरसता लौटी। बुद्दीजीवि व्र्ग के सहयोग से बेशक उसमे सुधार लाने का काम वहां की मीडिया ने किया और उसमे राजदेव रंजन की महती भूमिका रही थी। सीवान ने बहुत कुछ खोया है और उस सूची में राजदेव रंजन का भी नाम शुमार होगा, शायद इसकी कल्पना किसी ने नहीं की होगी। पर अब यही सच है। बिहार सरकार ने इस हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौपने की अनुशंसा कर दी है। उम्मीद है कि इस सच के चितेरे की हत्यारों को कानून सजा भी देगा। लेकिन ये भी एक जाते जाते भी राजदेव बता गए की " सच की राह बलिदान " मागती है। -

यह नंबर की माला नहीं, मौत का नंबर है

आर्इएएस से लेकर दसवीं तक के परिणामों की घोषणा हर छात्र आैर छात्राआें को उसके पढार्इ का पैगाम लेकर आ रही है. हर जगह उल्लास दिख रहा है मीडिया में भी नुमार्इश जारी है.बडा अच्छा लग रहा है देखकर फलां टाॅपर है आैर माला पहने एक अखबार से दूसरे अखबार के कार्यालय फोटो खींचाने के लिए घूम रहा है लेकिन बडा अचंभा होता है कि कोटा से खबर आती है की फलां लडकी ९२ प्रतिशत अंक लार्इ थी लेकिन फिर भी ९८ प्रतिशत अंक नहीं लाने के कारण फंदे से झूलग गर्इ
मां-बाप या फिर सामाजिक प्राणियों द्वारा डाली गर्इ यह मालाएं नंबर लाने की खुशी कम बल्कि उनके मां बाप के शौर्य का भौडा प्रदर्शन है.इसी की बेदी पर चढकर आगे इन्हीं छात्रों में से कुछ छात्र आत्महत्या कर लेते हैं.छोटे-छोटे बच्चे हाथों में मिठार्इ का डब्बा लिए अखबार के दफतरों में मिठार्इ खिला रहे हैं मां बाप अपनी अपेक्षाआें को बढाए ही जा रहे हैं.यह मालाएं खुशी के बोध से ज्यादा अपेक्षाआें का नया फंदा बनकर उभरने जा रही हैं जो हर समय टीस देंगी की हम ही हैं चाहे कुछ भी हो.अच्छी बात है जब सब नैर्सिगक हो लेकर सब का सब बनावटी है
गले में लटक रही मालाएं मां बाप की अपेक्षाआें का नया फंदा है आैर मीडिया में लिए नया धंधा जो कि पिछले कुछ वर्षों में कोचिंग संस्थानों के उगने के साथ आया है; यह विज्ञापन तो वसूल करता है लेकिन बचपन छीन कर. मानव संसाधन मंत्री रहे कपिल सिब्बल ने नंबर खत्म करने के लिए ग्रेड प्रणाली लागू तो की लेकिन अभी तक वह लागू सही तरीके से नहीं हो पार्इ है
नंबर का यह खेल हर साल मासूमों की आत्महत्या का नंबर बढा रहा है.मीडिया का चेहरा दिखाने का यह धंधा बहुत सारे मासूमों के गले का फंदा बन रहा है. मीडिया हीरो बनाता है लेकिन अगर हीरो नसरूदीन शाह जैसा नैर्सिक हो तो अच्छा रहता है वरना तो माॅडलिंग वाले हीरो की तरह हालत होती है कि कुछ समय बात साबुन का विज्ञापन मिलाना भी बंद हो जाता है.
हम इस बात से भी इत्तेफाक रखते हैं कि इस बात के दूसरे तर्क आैर पहलू भी हैं लेकिन मौत की माला के इस पहलू से कोर्इ इंकार करे शायद मुझे नहीं लगता.अपील की अपने बच्चे को खूब पढाए आगे बढाए साहस दें लेकिन शाैर्य प्रदर्शन करने के लिए अखबारों आैर टीवी के दफतरों का चक्कर न लगाएं.इस चमकते गलियारें की कर्इ स्याह रास्ते आैर रातें है आैर इन बच्चों के पास उजाला भविष्य
इस बीच बाहर टहल रहा था तो एक छोटा बालक माला पहने नजर आया.पीछे देखा तो ५६ इंच से ज्यादा सीना चौडाकर पिता खडे थे मजरा समझते देर न लगी बालक ने महज १२ साल ८ माह की उम्र में १२वीं पास कर ली.वैसे तो यह बच्चा अकेले में ३डी मोगली फिल्म भी नहीं देख पाए इस नन्हे मुन्हें राही ने फुटबाल क्रिकेट आैर अन्य किसी खेल में भी हाथ नहीं आजमाए पता नहीं ये आगे बढने की दौड कितने आंइस्टीन खोज पाएगी.मुझे तो लगता है दिखावा ज्यादा दम कम हर जगह यही नुमाया हो रहा है.चलो अब पूर्वांचल से लेकर केरल अम्मा ममता के रिजल्ट भी कल नजर दौडा लेना.

...बाकी जो है सो हाइए है

Monday, April 4, 2016

कोलकाता है इंडिया का पनामा


जिस तरह के खेल का खुलासा आज इंडियन एक्सप्रेस में किया गया है वह कोलकाता में बसे मारवाडी बहुत पुराने समय से कर रहे हैं. इतना ही नहीं एक ही कमरें में अलग अलग दरवाजे लगाकर चार बैंको से लोन ले लेते हैं गजब बात तो यह है कि हर बैंक वाला इसे जानता है विधानसभा से सटी एक इमारत है जिसे मैं खुद जानता हूं. कोलकाता आैर पनामा में अंतर सिर्फ इतना है कि पनामा में नामी लोगों की संपत्ति है आैर कोलकाता में बेनामी लोग हैं
बाकी देखते है। कि कितने लोग इस हमाम में नंगे होते हैं

बिन पैसे का पहला अस्पताल-दरभंगा महाराज

 अफगानी आते थे इलाज कराने

 भारत में बिना पैसे का इलाज सबसे पहले दरभंगा में शुरु हुआ। उस वक्‍त अफगान से लोग यहां इलाज कराने आते हैं। एक पैसे का खर्च नहीं था। 200 बेड का यह अस्‍पताल बिहार का सबसे पुराना अस्‍पताल है..आज जिंदा है, पर शर्मिदा है..क्‍योंकि यह अस्‍पताल जगन्‍नाथियों का इलाज नहीं कर पाया...। जब भी कभी बिना पैसे का इलाज का जिक्र होगा, इस अस्‍पताल का नाम लिये बिना बात अधुरी रहेगी।


1886 में स्‍थापित यह अस्‍पताल न केवल बिहार का सबसे पुराना अस्‍पताल, बल्कि 19वीं शताब्‍दी में यह बंगाल का दूसरा सबसे बडा अस्‍पताल था। बेशक आज यह ईलाज के अभाव में जिंदगी और मौत से लड रहा है, गुमनामी की जिंदगी झेल रहा है, लेकिन अपने समृद्ध इतिहास के साथ यह अस्‍पताल आज भी जिंदा है। इस अस्पताल के पास 12 बीघा का कंपाउंड है। जिसमे 200 बेड की क्षमता का हॉस्पिटल। बिहार का सबसे पुराना ओटी तथा 6 डॉक्टरों के लिए आवास भी हैं। सबसे बडी बात है कि करोड़ों रुपये होने के बावजूद यह अस्‍पताल आज इलाज के अभाव में मर रहा है।

निर्माण का इतिहास
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बिहार के इस सबसे पुराने अस्पताल का निर्माण तिरहुत सरकार महाराजाधिराज लक्ष्मेश्वर सिंह ने वर्ष 1878 में कराया। महाराजा लक्ष्मेेश्वर सिंह ने अंग्रेजी शिक्षा के साथ साथ अंग्रेजी चिकित्सां को बढावा देने के लिए दरभंगा में राज स्कूल और लेडी डेफरीन अस्पताल खोलने का फैसला लिया। उस दौरान बंगाल का यह दूसरा सबसे चर्चित अस्पताल था। कलकत्ता के बाद अंग्रेजी चिकित्सा का यह इकलौता केंद्र ही नहीं, बल्कि देश के कई चर्चित डाक्टर यहां मरीजों का इलाज करते थे। करीब दो सौ बेड वाले इस अस्पताल में गरीबों के लिए नि:शुल्क ईलाज की व्‍यवस्था थी। सरकारी अस्पताल में नि:शुल्क इलाज और दवाई देने की परिकल्पना हिंदुस्तान में इसी अस्प‍ताल से शुरु हुई। उत्तर भारत में अंग्रेजी चिकित्सा के लिए दरभंगा को एक महत्व पूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित करनेवाले महाराजा लक्ष्मे्श्वर सिंह की इस परिकल्पना को 1934 के भूकंप ने तहस-नहस कर दिया। अस्पताल का भवन क्षतिग्रस्त हो गया और कई महत्वपूर्ण उपकरण नष्ट हो गये। तत्कालीन तिरहुत सरकार महाराजा कामेश्वर सिंह ने क्षतिग्रस्त भवन की मरम्मत के बाद इसे लेडी बेल्डिंगटन हॉस्पीटल के नाम से नवनिर्मित किया। बिहार में सबसे पहले ऑपरेशन थियेटर यही स्थापित हुआ। 40 के दशक में देश में ऐसा कोई चिकित्सी्य मशीन नहीं था, जो यहां उपलब्ध नहीं था। यह एक दुखद संयोग ही कहा जाये कि जिसदिन इस अस्पंताल की सबसे अधिक जरुरत महाराजा कामेश्वरर सिंह को हुई, उस दिन सबकुछ धरा का धरा रह गया और महरानीअधिरानी प्रिया की अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में असमय मौत हो गयी। 1962 में अपनी मौत से पूर्व किये बिल में कामेश्वर सिंह ने इस अस्पाताल को अपनी एक तिहाई संपत्ति के साथ जनता को सूपुर्द कर दिया और एक न्यास बनाकर उसे इसके संचालन की जिम्मेदारी सौंप दी। अरबों रुपये और ठोस आधारभूत संरचना से सुसज्जित महाराजा कामेश्‍वर सिंह चैरिटेबुल अस्पताल को कामेश्वीर सिंह के अन्य दान की तरह न्यास ने जमकर लूटा और आज इस अस्पताल के अधिकतर हिस्सों पर अबैध कब्जा् है। खानापूर्ति के लिए कुछ बूढे चिकित्सकों को रखा गया है और दो चार गरीबों का ईलाज कर लाखों रुपये का खर्च दिखाया जा रहा है।
सभी हैं उदासीन
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ऐसा नहीं है कि इस घोटाले के संबंध में लोगों को जानकारी नहीं है। बिहार विधान परिषद से लेकर पटना हाइकोर्ट तक इस मामले से परिचित है, इसके बावजूद इस अस्पिताल को लेकर कोई गंभीर नहीं है। जनता की सेवा करने के बजाय यह अस्पैताल आज लूट का स्रोत बन गया है। न्या सी पूर्णत: अपने दायित्वध के निर्वाह में विफल रहे हैं। सरकार जनता के हित में अगर न्यालस को पूनर्गठन नहीं करती है तो यह अस्पगताल कब तक अपने वजूद को बचा पायेगा, यह कहना कठिन है। वैसे सरकार की गंभीरता आप इन दो दस्ताहवेजों से समझ सकते हैं, जिनमें से एक वर्षों पहले विधान परिषद में उठाया गया सवाल है, जिसपर सरकार ने अब तक एक कदम नहीं बढाया है, जबकि दूसरा दस्ताेवेज हाइकोर्ट के ध्याानाकर्षण का है, जिसपर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
Maharaja Kameshwar Singh Charitable Trust.
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डा. नीलाम्बर चौधरी : महोदय , माननीय मंत्री महोदय से मैं यह जानना चाहता हूँ की ६२ के बाद अभी तक चैरिटी ट्रस्ट में कितना पैसा जमा हुए और उसमे क्या काम हुआ ? मैं ये जानना चाहता हूँ l
श्री रमई राम (मंत्री ): हुजुर , इनके प्रस्ताव में इसकी चर्चा नहीं थी कि ६२ के बाद क्या हुआ , इसके लिए समूचा रिकॉर्ड देखना होगा ... कितनी सम्पति ..
सभापति : मूल प्रश्न जो जानना चाहते हैं माननीय सदस्य कि ...
श्री रमई राम (मंत्री ): मूल प्रश्न अभी ...
डा. महाचंद्र प्रसाद सिंह : पब्लिक चैरिटी पर अभी तक जो खर्च हुआ है और महोदय .. सारा पैसे का दुरूपयोग किया जा रहा है l सीधा प्रश्न है l
श्री रमई राम ( मंत्री ): महोदय , आपसे आग्रह करेंगें कि यह लम्बा मामला है , इसके लिए समय चाहिए l माननीय सदस्य , जिससे कहेंगें , जाँच करायेंगें और जाँच करा कर प्रतिवेदन ...
डा . महाचन्द्र प्रसाद सिंह : ये राज्यहित में है , आपके हित में है l हमसब अनुभव कर रहे है कि इसका मिसयूज काफी हुआ है l
श्री रमई राम (मंत्री ): नहीं ,हम आपसे आग्रह करते हैं महाचंद्र बाबू , चौधरी जी से भी आग्रह करते हैं की इनसे कहिए, इसकी जाँच कराके प्रतिवेदन माननीय सभापति महोदय को सुपुर्द कर दें l
आवाजें : कब तक ?
श्री रमई राम (मंत्री ) : जब कहेंगे , तब l
श्री रामकृपाल यादव : महोदय ,
श्री भोला प्रसाद सिंह : हमलोग तो आजकल कहते हैं l लेकिन दरभंगा महाराज की सम्पतियों का मामला जो है , ट्रस्ट का मामला है , केवल दरभंगा महाराज तक सीमित नहीं है , यह बिहार की प्रतिष्ठा , ख्याति का सम्बन्ध है l अगर उसके ट्रस्ट में ,उसकी जमीन पर यूनिवर्सिटी बनी , उसकी जमीन पर और उसकी जायदाद का जो दुरूपयोग हो रहा है , तो हर बिहारी से यह कंसर्न है l आप इसकी जाँच इनके अधिकारियों से करायेंगे या कोई एजेंसी से करायेंगे , लेकिन जाँच करा लीजिए, क्योंकि हमलोग भी सुनते हैं कि दरभंगा महाराज के पैसों का , उनकी जमींदारी की जमीन है जिसमे म्यूजियम बनवाया और भी चीज बनवाया , यूनिवर्सिटी बनवाया , काफी उसकी लूट हो रही है l इंडियन नेशन , आर्यावर्त की लूट हो रही है तो इसके लिए जरुरी है कि सम्पूर्ण ट्रस्ट की जाँच हो जय और आप यदि समझिए तो सदन की समिति से जाँच करा लीजिए l
श्री रामकृपाल यादव : मेरा भी सप्लिमेंटरी का अधिकार है l
सभापति : हाँ , बोला जाएl l
श्री रामकृपाल यादव : महोदय , ऐसा लगता है कि जो मूल प्रश्न है , सर , ध्यानाकर्षण के माध्यम से , उसका खुद ही संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए हैं , वे खुद ही एहसास कर रहे हैं l चूँकि यह राज्यहित का मामला है और किसी खास व्यक्ति का मामला नहीं है , राज्यहित का मामला है , करोड़ों – करोड़ की प्रॉपर्टी का मामला है और उसका दुरूपयोग हो रहा है , इससे राज्य का अहित हो रहा है , इसिलिय हम चाहेंगे कि माननीय मंत्री जी , चूँकि सब सदस्यों ने चिंता जाहिर की है कि इन तमाम मामलों के जो आरोप हैं , उसकी तह में जाने की जरुरत है l इन तमाम मामलों की जाँच कराने की आवश्यकता है l हम निवेदन करना चाहेंगें माननीय मंत्री से , चूँकि उन्होंने कहा है कि मुझे कोई आपत्ति नहीं है , हम जाँच के लिए तैयार हैं , तो हम जानना चाहेंगें माननीय मंत्री जी से आपके माध्यम से कि क्यों नहीं सदन की कमिटी आप बना देते ? तमाम तथ्यों की जानकारी आ जाएगी और दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा l एक कमिटी बना दीजिए सदन की और स्वयं तैयार भी हैं माननीय मंत्री जी और मैं बिलकुल सत्य भावना से यह बात रख रहा हूँ l
श्री रमई राम ( मंत्री ) : हुजूर , मैं अपने जवाब में कह सकता हूँ कि जिला समाहर्ता , दरभंगा के प्रतिवेदनानुसार हमने जवाब दिया है , यह स्पष्ट हम कहते हैं l
( व्यवधान )
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माननीय सदस्य श्री भोला प्रसाद सिंह ने कभी सदन में कहा था कि दरभंगा महाराज की सम्पतियों का मामला जो है ,ट्रस्ट का मामला है , केवल दरभंगा महाराज तक सिमित नहीं है ,यह बिहार की प्रतिष्ठा , ख्याति का सम्बन्ध है . अगर उसके ट्रस्ट में ,उसकी जमीन पर यूनिवर्सिटी बनी ,उसकी जमीन पर और उसकी जायदाद का जो दुरूपयोग हो रहा है , तो हर बिहारी से यह कंसर्न है .
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माननीय सदस्य श्री शकील अहमद खान ,एवं अन्य माननीय सदस्यों द्वारा दरभंगा महाराज की मृत्यु के पश्चात् गठित ट्रस्ट द्वारा अनियमितता बरते जाने के सम्बन्ध में सरकार का ध्यान आकृष्ट करते हुए श्री शकील अहमद खान ने १९९९ में विधान परिषद् में कहा कि माननीय सभापति महोदय , दरभंगा महाराज की मृत्यु १ अक्टूबर १९६२ में हो गयी . उन्होंने मरने के पूर्व एक WILL किया था . जिसके अनुसार उनकी सारी सम्पति की एक तिहाए से होनेवाली आमदनी को पब्लिक चैरिटी पर खर्च होना है . जिसके लिए एक ट्रस्ट की स्थापना की गयी . उक्त ट्रस्ट द्वारा स्व . महाराज की इच्छा के विपरीत पब्लिक चैरिटी के लिए सम्पति कौड़ी के मोल बेचीं जा रही है और उसका उपयोग पब्लिक चैरिटी के अतिरिक्त अन्य कार्यों में किया जा रहा है ,जो विल के विरुद्ध है .
कैसे चल रहा ट्रस्टा, कौन हैं ट्रस्टी
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आज हम बडी आसानी से आरोप लगा देते हैं कि महाराजा ने दरभंगा के लिए कुछ नहीं किया, लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि हमने उन संस्‍थाओं को भी बचाने का प्रयास नहीं किया, जिसे बचाने के लिए नहीं बल्कि महाराजा ने हमें उसे चलाने के लिए भी सौंपा था। ... जारी...

Sunday, April 3, 2016

ये है जलवा जलाल

घंटे भर में सस्पेंड हुए कदमकुआं के थानेदार-ज्ञानेश्वर
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आपको मैंने कल ही बताया था कि पटना के थानेदार किस कदर बहक गए हैं। आम आदमी का तो सुनते ही नहीं हैं कई थानेदार। मसला आज फिर से फंस गया। क्लिक कर सुनिएगा पूरा आडियो। दरअसल, कदमकुआं थाने से परेशान मुकेश ने सुबह अपनी पीड़ा हमें बताई। असम की रहने वाली मुकेश के घर की मेड दो - तीन दिनों पहले भाग गईं थी। अपना सामान छोड़ घर का कुछ सामान ले गई थी। थाने में रिपोर्ट लिखानी थी। कोई वहां सुनने को तैयार नहीं था।
मुकेश की पीड़ा जानने के बाद आज हमने दोपहर में एसएसपी से बात करने की कोशिश की, लेकिन संभव नहीं हो पाया। फिर हमने थानेदार से ही बात करने में कोई बुराई नहीं समझी। लेकिन हमें इसकी जानकारी थी कि कदमकुआं के थानेदार सुधीर कुमार बातचीत में ठीक से पेश नहीं आते। सो, होशियारी बरतते हुए मैंने कॉल की रिकार्डिंग की। जैसा अंदेशा था, वैसा ही हुआ। इतनी बदतमीजी तो उम्मीद से परे थी। थानेदार ने कहा - वे 22 वर्षों से पटना के थानों में हैं। मैंने कहा - अरे भाई, 26 वर्षों से हमने भी पटना में क्राइम रिपोर्टिंग की है। लेकिन ये बहके थानेदार मानने वाले कहां थे।
बातचीत के बाद मैंने आॅडियो को वाट्सएप पर वायरल किया। पटना के सभी क्राइम रिपोर्टर भी समर्थन में आगे आए। परिणाम, घंटे भर के भीतर थानेदार को सस्पेंड किया पटना के एसएसपी मनु महाराज ने। उन्होंने कहा - ऐसे लोग बर्दाश्त नहीं किए जा सकते।
बिहार पुलिस की तस्वीर पर क्लिक कर सुनें थानेदार की बदतमीजी को।

जब विद्यासागर जी ने चप्पल फेंकी

जब विद्यासागर जी ने चप्पल फेंकी फिर एक चप्पल चली। रोज ही कहीं ना कहीं यह पदत्राण थलचर हाथों में आ कर नभचर बन अपने गंत्वय की ओर जाने क...