Monday, May 16, 2016

"क्लासमेट" से "क़त्ल" तक के सफ़र में राजदेव और शहाबुद्दीन




पटना। ऐसे "कलम के सिपाही" बड़े ही विरले ही होते है जो अपने "जीवन पर छाये मौत के साये" के बावजूद सच के खातिर बेधड़क बेलाग बेख़ौफ़ होकर लिखते रहते है। धन दौलत और तमाम प्रलोभवनो के बावजूद राजदेव " सच की शम्मा" जलाते रहे।                      
 दिवंगत पत्रकार राजदेव रंजन के बारे कहा जा सकता है कि वह एक व्यवहार कुशल, कलम से समझौता करने से कोसों दूर एक निडर पत्रकार और एक सम्मानित बैनर के सहारे " सच को सच" कहने वाले पत्रकार थे। एक ही इलाके एक ही परिवेश में पीला बढे शहाबुद्दीन और राजदेव एक दूर से परिचित थे। साथ ही वक्त के बदलते दौर में दोनों दो अलग अलग राहो पर चल निकले।लेकिन एक दौर वो भी आया जब वो और शहाबुद्दीन के क्लास मेट भी रहे। दोनो ने एस साथ पीजी किया था।इसी की वजह से इलाके में माना जाता था कि वह सांसद के करीब होंगे लेकिन उनकी कालान्तर में उनकी धारदार और ईमानदार लेखनी ऐसा समझने की इजाजत नहीं देती थी। पत्रकारिता की में कलम की धार और प्रखर करते हुए राजदेव अपनी पढाई भी जारी रखे हुए थे। अपनी अपराध से जुडी रिपोर्टिंग को और सशक्त करने के खातिर वकालत की भी डिग्री ली थी राजदेव ने। इसी का असर था की वो कानून की बारीकियों को समझते हुए अपराध की खबरों की हर बारीकी को तह दर तह उधेड़ कर रख देते थे।                       
 सिवान की जमीनी हक़ीक़त के हर  उस सच से राजदेव ने अखबार के माध्य से उजागर किया और मार दिए जाने तक करते रहे। उनकी कलम ने हर उस सच को सच लिखा हर उस सियासी उत्पात से लोगो को रूबरू कराया बिना किसी हिचक के। उस वक्त भी राजदेव नहीं डरे जब "सिवान की फिज़ा" साहब के अलावा कोई और शब्द नहीं उड़ा करता था।                          
राजदेव रंजन ने सीवान में पिछले 24 सालों पत्रकारिता कर रहे थे। इस सच से भी आगत थे की वो विगत 9 सालों से अपराधियों के निशाने पर थे। यही कारण रहा है कि एक बार उनके दफ्तर पर भी अपराधियों ने उन पर हमला बोला था। राजदेव पर  2005 में भी उनके दफ्तर पर हमला हुआ था। राजदेव रंजन के सहयोगी रहे दुर्गाकांत उस समय उनके मौजूद थे। यह हमला अक्तूबर 2005 में हुआ था। रात आठ बजे के करीब कुछ लोगों ने ऑफिस के बाहर से राजदेव को आवाज देकर बाहर बुलाया और धमकाने के बाद बुरी तरह से पीटा था।लेकिन तब संयोगवश राजदेव को ज्यादा चोटे नहीं आई थी, क्योकि आस पास के लोगो के जुट जाने से हमलावर भाग गए थे। इसके बाद भी राजदेव ने अपने जीवन पर आफत आने के बाद भी सच को सच कहने वाली निर्भीक पत्रकारिता को जिंदा रखा था।                                                     
अपने जीवन पर अपराधियों की गिद्ध दृष्टि होने से राजदेव हमेशा से अवगत रहे थे। सीवान पुलिस को 2007 में ही पुलिस की स्पेशल ब्रांच ने जिले के 24 लोगों की जान को खतरा होने का इनपुट दिया था।इसकी जानकारी जिले के पुलिस कप्तान को भी दी गई थी।अपराधियो की इस हिटलिस्ट में राजदेव का भी नाम था। उस वक्त की जानकारी के मुताबिक तब सीवान जेल से ही 24 लोगों के नाम डेथ वारंट की लिस्ट जारी की गई थी। राजदेव के साथ काम करने वाले लोग भी बताते हैं कि सच को सच कहने की जुनूनी रिपोर्टिंग के कारण भी राजदेव को कई बार सीवान जेल से धमकी मिल चुकी थी। फिर भी निडर राजदेव न डरे न झुके न टूटे।                       
90 के दशक में शहाबुद्दीन ने बाहुबल और सियासत का कॉकटेल तैयार कर देश के प्रथम राष्ट्रपति की जन्मस्थली जीरादेई से बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ा और सफल भी रहे। ये दौर बिहारमे लालू यादव के सियासी उत्कर्ष का था। जीरादेई से मिली शहाबु की जीत ने लालू का ध्यान इस युवा तुर्क की ओर गया। फिर क्या था लालू के ऑफर को लपकते हुए शहाबुद्दीन ने सिवान के साहब की पदवी पा ली। फिर  आया वो दौर जब सांसद बन बैठे शहाबुद्दीन ने सिवान की धड़कनो पर भी अपनी हुकुमत कायम कर ली। दौर ऐसा भी आया जब बिहार पुलिस और साहब की फ़ौज प्रतापपुर गाँव में भीड़ गई। दोनों तरफ से कई लोग वीरगति को प्राप्त हुए। जिस तरह के अत्याधुनिक हथियारों का प्रयोग राजद सांसद के गुर्गो ने किया बिहार कुलिस समेत सभी सुरक्षा एजेंसियों के होश पूड गए।                  
अब बारी सरकार की थी। बात 2005 की है। फरवरी का विधान सभा चुनाव शुरू होने ही वाला था। दस फरवरी को चुनाव आयोग के निर्देश पर जिले में नए डीएम और बारह फरवरी को नए एसपी की पोस्टिंग सीवान में हुयी। डीएम सीके अनिल ने दस फरवरी को फर्स्ट हाफ में ही अपनी ज्वाइनिंग दी और अपने कंफिडेंशियल रूम में कैद हो गये। किसी से मुलाकात नहीं की सिवाय मण्डल कारा सिवान के जेल अधीक्षक के। कानून की सारी बारीकियों को दिन भर में सीके अनिल ने खंगाल डाला और दूसरे दिन ग्यारह फरवरी की रात बाहुबली राजद सांसद मो. शहाबुद्दीन को आदर्श कारा पटना भेज दिया। यह सब इतनी खामोशी से हुआ कि मीडिया को भी इसकी जानकारी 12 फरवरी को ही हुयी। बहरहाल, उसी दिन  नये एसपी रत्न संजय ने भी अपनी ज्वाइनिंग दे दी थी। इन दोनो अधिकारियों का जलवा ऐसा ही था जो सीवान की लगभग हर जरूरत पूरी करता रहा और इसका असर यह हुआ 10 फरवरी के पहले तक जिसका नाम जिले के तीस-बत्तीस लाख की आबादी की जुबान पर दहशतगर्द के रूप में आता था उसे बदलने में जरा भी देर नहीं लगी। विधि-व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में और राजद के बाहुबली सांसद मो. शहाबुद्दीन के सारे गुर्गे भूमिगत। लेकिन सभी देश के चार कोनो में छिपे हुए। यह इकबाल था सिवान जिला प्रशासन का। चुनाव परिणाम जो भी रहे, मुख्य विशेषता लॉ एण्ड आर्डर थी और लोग राहत की सांस ले रहे थे। इस दौर में भी राजदेव की रिपोर्ट में हर उस सच को लिखा जो पुरे देश के लोगो ने पढ़ा।                 
 इन सालो में खौफ़ और उपद्रव की।कहानियों ने एक नए क्षितिज को छु लिया था। सीवान की सामाजिक केमिस्ट्री बिलकुल ख़त्म हो गई थी।प्रशासन का इकबाल लौटते ही शहर और जिले की समरसता लौटी। बुद्दीजीवि व्र्ग के सहयोग से बेशक उसमे सुधार लाने का काम वहां की मीडिया ने किया और उसमे राजदेव रंजन की महती भूमिका रही थी। सीवान ने बहुत कुछ खोया है और उस सूची में राजदेव रंजन का भी नाम शुमार होगा, शायद इसकी कल्पना किसी ने नहीं की होगी। पर अब यही सच है। बिहार सरकार ने इस हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौपने की अनुशंसा कर दी है। उम्मीद है कि इस सच के चितेरे की हत्यारों को कानून सजा भी देगा। लेकिन ये भी एक जाते जाते भी राजदेव बता गए की " सच की राह बलिदान " मागती है। -

यह नंबर की माला नहीं, मौत का नंबर है

आर्इएएस से लेकर दसवीं तक के परिणामों की घोषणा हर छात्र आैर छात्राआें को उसके पढार्इ का पैगाम लेकर आ रही है. हर जगह उल्लास दिख रहा है मीडिया में भी नुमार्इश जारी है.बडा अच्छा लग रहा है देखकर फलां टाॅपर है आैर माला पहने एक अखबार से दूसरे अखबार के कार्यालय फोटो खींचाने के लिए घूम रहा है लेकिन बडा अचंभा होता है कि कोटा से खबर आती है की फलां लडकी ९२ प्रतिशत अंक लार्इ थी लेकिन फिर भी ९८ प्रतिशत अंक नहीं लाने के कारण फंदे से झूलग गर्इ
मां-बाप या फिर सामाजिक प्राणियों द्वारा डाली गर्इ यह मालाएं नंबर लाने की खुशी कम बल्कि उनके मां बाप के शौर्य का भौडा प्रदर्शन है.इसी की बेदी पर चढकर आगे इन्हीं छात्रों में से कुछ छात्र आत्महत्या कर लेते हैं.छोटे-छोटे बच्चे हाथों में मिठार्इ का डब्बा लिए अखबार के दफतरों में मिठार्इ खिला रहे हैं मां बाप अपनी अपेक्षाआें को बढाए ही जा रहे हैं.यह मालाएं खुशी के बोध से ज्यादा अपेक्षाआें का नया फंदा बनकर उभरने जा रही हैं जो हर समय टीस देंगी की हम ही हैं चाहे कुछ भी हो.अच्छी बात है जब सब नैर्सिगक हो लेकर सब का सब बनावटी है
गले में लटक रही मालाएं मां बाप की अपेक्षाआें का नया फंदा है आैर मीडिया में लिए नया धंधा जो कि पिछले कुछ वर्षों में कोचिंग संस्थानों के उगने के साथ आया है; यह विज्ञापन तो वसूल करता है लेकिन बचपन छीन कर. मानव संसाधन मंत्री रहे कपिल सिब्बल ने नंबर खत्म करने के लिए ग्रेड प्रणाली लागू तो की लेकिन अभी तक वह लागू सही तरीके से नहीं हो पार्इ है
नंबर का यह खेल हर साल मासूमों की आत्महत्या का नंबर बढा रहा है.मीडिया का चेहरा दिखाने का यह धंधा बहुत सारे मासूमों के गले का फंदा बन रहा है. मीडिया हीरो बनाता है लेकिन अगर हीरो नसरूदीन शाह जैसा नैर्सिक हो तो अच्छा रहता है वरना तो माॅडलिंग वाले हीरो की तरह हालत होती है कि कुछ समय बात साबुन का विज्ञापन मिलाना भी बंद हो जाता है.
हम इस बात से भी इत्तेफाक रखते हैं कि इस बात के दूसरे तर्क आैर पहलू भी हैं लेकिन मौत की माला के इस पहलू से कोर्इ इंकार करे शायद मुझे नहीं लगता.अपील की अपने बच्चे को खूब पढाए आगे बढाए साहस दें लेकिन शाैर्य प्रदर्शन करने के लिए अखबारों आैर टीवी के दफतरों का चक्कर न लगाएं.इस चमकते गलियारें की कर्इ स्याह रास्ते आैर रातें है आैर इन बच्चों के पास उजाला भविष्य
इस बीच बाहर टहल रहा था तो एक छोटा बालक माला पहने नजर आया.पीछे देखा तो ५६ इंच से ज्यादा सीना चौडाकर पिता खडे थे मजरा समझते देर न लगी बालक ने महज १२ साल ८ माह की उम्र में १२वीं पास कर ली.वैसे तो यह बच्चा अकेले में ३डी मोगली फिल्म भी नहीं देख पाए इस नन्हे मुन्हें राही ने फुटबाल क्रिकेट आैर अन्य किसी खेल में भी हाथ नहीं आजमाए पता नहीं ये आगे बढने की दौड कितने आंइस्टीन खोज पाएगी.मुझे तो लगता है दिखावा ज्यादा दम कम हर जगह यही नुमाया हो रहा है.चलो अब पूर्वांचल से लेकर केरल अम्मा ममता के रिजल्ट भी कल नजर दौडा लेना.

...बाकी जो है सो हाइए है

Monday, April 4, 2016

कोलकाता है इंडिया का पनामा


जिस तरह के खेल का खुलासा आज इंडियन एक्सप्रेस में किया गया है वह कोलकाता में बसे मारवाडी बहुत पुराने समय से कर रहे हैं. इतना ही नहीं एक ही कमरें में अलग अलग दरवाजे लगाकर चार बैंको से लोन ले लेते हैं गजब बात तो यह है कि हर बैंक वाला इसे जानता है विधानसभा से सटी एक इमारत है जिसे मैं खुद जानता हूं. कोलकाता आैर पनामा में अंतर सिर्फ इतना है कि पनामा में नामी लोगों की संपत्ति है आैर कोलकाता में बेनामी लोग हैं
बाकी देखते है। कि कितने लोग इस हमाम में नंगे होते हैं

बिन पैसे का पहला अस्पताल-दरभंगा महाराज

 अफगानी आते थे इलाज कराने

 भारत में बिना पैसे का इलाज सबसे पहले दरभंगा में शुरु हुआ। उस वक्‍त अफगान से लोग यहां इलाज कराने आते हैं। एक पैसे का खर्च नहीं था। 200 बेड का यह अस्‍पताल बिहार का सबसे पुराना अस्‍पताल है..आज जिंदा है, पर शर्मिदा है..क्‍योंकि यह अस्‍पताल जगन्‍नाथियों का इलाज नहीं कर पाया...। जब भी कभी बिना पैसे का इलाज का जिक्र होगा, इस अस्‍पताल का नाम लिये बिना बात अधुरी रहेगी।


1886 में स्‍थापित यह अस्‍पताल न केवल बिहार का सबसे पुराना अस्‍पताल, बल्कि 19वीं शताब्‍दी में यह बंगाल का दूसरा सबसे बडा अस्‍पताल था। बेशक आज यह ईलाज के अभाव में जिंदगी और मौत से लड रहा है, गुमनामी की जिंदगी झेल रहा है, लेकिन अपने समृद्ध इतिहास के साथ यह अस्‍पताल आज भी जिंदा है। इस अस्पताल के पास 12 बीघा का कंपाउंड है। जिसमे 200 बेड की क्षमता का हॉस्पिटल। बिहार का सबसे पुराना ओटी तथा 6 डॉक्टरों के लिए आवास भी हैं। सबसे बडी बात है कि करोड़ों रुपये होने के बावजूद यह अस्‍पताल आज इलाज के अभाव में मर रहा है।

निर्माण का इतिहास
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बिहार के इस सबसे पुराने अस्पताल का निर्माण तिरहुत सरकार महाराजाधिराज लक्ष्मेश्वर सिंह ने वर्ष 1878 में कराया। महाराजा लक्ष्मेेश्वर सिंह ने अंग्रेजी शिक्षा के साथ साथ अंग्रेजी चिकित्सां को बढावा देने के लिए दरभंगा में राज स्कूल और लेडी डेफरीन अस्पताल खोलने का फैसला लिया। उस दौरान बंगाल का यह दूसरा सबसे चर्चित अस्पताल था। कलकत्ता के बाद अंग्रेजी चिकित्सा का यह इकलौता केंद्र ही नहीं, बल्कि देश के कई चर्चित डाक्टर यहां मरीजों का इलाज करते थे। करीब दो सौ बेड वाले इस अस्पताल में गरीबों के लिए नि:शुल्क ईलाज की व्‍यवस्था थी। सरकारी अस्पताल में नि:शुल्क इलाज और दवाई देने की परिकल्पना हिंदुस्तान में इसी अस्प‍ताल से शुरु हुई। उत्तर भारत में अंग्रेजी चिकित्सा के लिए दरभंगा को एक महत्व पूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित करनेवाले महाराजा लक्ष्मे्श्वर सिंह की इस परिकल्पना को 1934 के भूकंप ने तहस-नहस कर दिया। अस्पताल का भवन क्षतिग्रस्त हो गया और कई महत्वपूर्ण उपकरण नष्ट हो गये। तत्कालीन तिरहुत सरकार महाराजा कामेश्वर सिंह ने क्षतिग्रस्त भवन की मरम्मत के बाद इसे लेडी बेल्डिंगटन हॉस्पीटल के नाम से नवनिर्मित किया। बिहार में सबसे पहले ऑपरेशन थियेटर यही स्थापित हुआ। 40 के दशक में देश में ऐसा कोई चिकित्सी्य मशीन नहीं था, जो यहां उपलब्ध नहीं था। यह एक दुखद संयोग ही कहा जाये कि जिसदिन इस अस्पंताल की सबसे अधिक जरुरत महाराजा कामेश्वरर सिंह को हुई, उस दिन सबकुछ धरा का धरा रह गया और महरानीअधिरानी प्रिया की अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में असमय मौत हो गयी। 1962 में अपनी मौत से पूर्व किये बिल में कामेश्वर सिंह ने इस अस्पाताल को अपनी एक तिहाई संपत्ति के साथ जनता को सूपुर्द कर दिया और एक न्यास बनाकर उसे इसके संचालन की जिम्मेदारी सौंप दी। अरबों रुपये और ठोस आधारभूत संरचना से सुसज्जित महाराजा कामेश्‍वर सिंह चैरिटेबुल अस्पताल को कामेश्वीर सिंह के अन्य दान की तरह न्यास ने जमकर लूटा और आज इस अस्पताल के अधिकतर हिस्सों पर अबैध कब्जा् है। खानापूर्ति के लिए कुछ बूढे चिकित्सकों को रखा गया है और दो चार गरीबों का ईलाज कर लाखों रुपये का खर्च दिखाया जा रहा है।
सभी हैं उदासीन
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ऐसा नहीं है कि इस घोटाले के संबंध में लोगों को जानकारी नहीं है। बिहार विधान परिषद से लेकर पटना हाइकोर्ट तक इस मामले से परिचित है, इसके बावजूद इस अस्पिताल को लेकर कोई गंभीर नहीं है। जनता की सेवा करने के बजाय यह अस्पैताल आज लूट का स्रोत बन गया है। न्या सी पूर्णत: अपने दायित्वध के निर्वाह में विफल रहे हैं। सरकार जनता के हित में अगर न्यालस को पूनर्गठन नहीं करती है तो यह अस्पगताल कब तक अपने वजूद को बचा पायेगा, यह कहना कठिन है। वैसे सरकार की गंभीरता आप इन दो दस्ताहवेजों से समझ सकते हैं, जिनमें से एक वर्षों पहले विधान परिषद में उठाया गया सवाल है, जिसपर सरकार ने अब तक एक कदम नहीं बढाया है, जबकि दूसरा दस्ताेवेज हाइकोर्ट के ध्याानाकर्षण का है, जिसपर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
Maharaja Kameshwar Singh Charitable Trust.
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डा. नीलाम्बर चौधरी : महोदय , माननीय मंत्री महोदय से मैं यह जानना चाहता हूँ की ६२ के बाद अभी तक चैरिटी ट्रस्ट में कितना पैसा जमा हुए और उसमे क्या काम हुआ ? मैं ये जानना चाहता हूँ l
श्री रमई राम (मंत्री ): हुजुर , इनके प्रस्ताव में इसकी चर्चा नहीं थी कि ६२ के बाद क्या हुआ , इसके लिए समूचा रिकॉर्ड देखना होगा ... कितनी सम्पति ..
सभापति : मूल प्रश्न जो जानना चाहते हैं माननीय सदस्य कि ...
श्री रमई राम (मंत्री ): मूल प्रश्न अभी ...
डा. महाचंद्र प्रसाद सिंह : पब्लिक चैरिटी पर अभी तक जो खर्च हुआ है और महोदय .. सारा पैसे का दुरूपयोग किया जा रहा है l सीधा प्रश्न है l
श्री रमई राम ( मंत्री ): महोदय , आपसे आग्रह करेंगें कि यह लम्बा मामला है , इसके लिए समय चाहिए l माननीय सदस्य , जिससे कहेंगें , जाँच करायेंगें और जाँच करा कर प्रतिवेदन ...
डा . महाचन्द्र प्रसाद सिंह : ये राज्यहित में है , आपके हित में है l हमसब अनुभव कर रहे है कि इसका मिसयूज काफी हुआ है l
श्री रमई राम (मंत्री ): नहीं ,हम आपसे आग्रह करते हैं महाचंद्र बाबू , चौधरी जी से भी आग्रह करते हैं की इनसे कहिए, इसकी जाँच कराके प्रतिवेदन माननीय सभापति महोदय को सुपुर्द कर दें l
आवाजें : कब तक ?
श्री रमई राम (मंत्री ) : जब कहेंगे , तब l
श्री रामकृपाल यादव : महोदय ,
श्री भोला प्रसाद सिंह : हमलोग तो आजकल कहते हैं l लेकिन दरभंगा महाराज की सम्पतियों का मामला जो है , ट्रस्ट का मामला है , केवल दरभंगा महाराज तक सीमित नहीं है , यह बिहार की प्रतिष्ठा , ख्याति का सम्बन्ध है l अगर उसके ट्रस्ट में ,उसकी जमीन पर यूनिवर्सिटी बनी , उसकी जमीन पर और उसकी जायदाद का जो दुरूपयोग हो रहा है , तो हर बिहारी से यह कंसर्न है l आप इसकी जाँच इनके अधिकारियों से करायेंगे या कोई एजेंसी से करायेंगे , लेकिन जाँच करा लीजिए, क्योंकि हमलोग भी सुनते हैं कि दरभंगा महाराज के पैसों का , उनकी जमींदारी की जमीन है जिसमे म्यूजियम बनवाया और भी चीज बनवाया , यूनिवर्सिटी बनवाया , काफी उसकी लूट हो रही है l इंडियन नेशन , आर्यावर्त की लूट हो रही है तो इसके लिए जरुरी है कि सम्पूर्ण ट्रस्ट की जाँच हो जय और आप यदि समझिए तो सदन की समिति से जाँच करा लीजिए l
श्री रामकृपाल यादव : मेरा भी सप्लिमेंटरी का अधिकार है l
सभापति : हाँ , बोला जाएl l
श्री रामकृपाल यादव : महोदय , ऐसा लगता है कि जो मूल प्रश्न है , सर , ध्यानाकर्षण के माध्यम से , उसका खुद ही संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए हैं , वे खुद ही एहसास कर रहे हैं l चूँकि यह राज्यहित का मामला है और किसी खास व्यक्ति का मामला नहीं है , राज्यहित का मामला है , करोड़ों – करोड़ की प्रॉपर्टी का मामला है और उसका दुरूपयोग हो रहा है , इससे राज्य का अहित हो रहा है , इसिलिय हम चाहेंगे कि माननीय मंत्री जी , चूँकि सब सदस्यों ने चिंता जाहिर की है कि इन तमाम मामलों के जो आरोप हैं , उसकी तह में जाने की जरुरत है l इन तमाम मामलों की जाँच कराने की आवश्यकता है l हम निवेदन करना चाहेंगें माननीय मंत्री से , चूँकि उन्होंने कहा है कि मुझे कोई आपत्ति नहीं है , हम जाँच के लिए तैयार हैं , तो हम जानना चाहेंगें माननीय मंत्री जी से आपके माध्यम से कि क्यों नहीं सदन की कमिटी आप बना देते ? तमाम तथ्यों की जानकारी आ जाएगी और दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा l एक कमिटी बना दीजिए सदन की और स्वयं तैयार भी हैं माननीय मंत्री जी और मैं बिलकुल सत्य भावना से यह बात रख रहा हूँ l
श्री रमई राम ( मंत्री ) : हुजूर , मैं अपने जवाब में कह सकता हूँ कि जिला समाहर्ता , दरभंगा के प्रतिवेदनानुसार हमने जवाब दिया है , यह स्पष्ट हम कहते हैं l
( व्यवधान )
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माननीय सदस्य श्री भोला प्रसाद सिंह ने कभी सदन में कहा था कि दरभंगा महाराज की सम्पतियों का मामला जो है ,ट्रस्ट का मामला है , केवल दरभंगा महाराज तक सिमित नहीं है ,यह बिहार की प्रतिष्ठा , ख्याति का सम्बन्ध है . अगर उसके ट्रस्ट में ,उसकी जमीन पर यूनिवर्सिटी बनी ,उसकी जमीन पर और उसकी जायदाद का जो दुरूपयोग हो रहा है , तो हर बिहारी से यह कंसर्न है .
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माननीय सदस्य श्री शकील अहमद खान ,एवं अन्य माननीय सदस्यों द्वारा दरभंगा महाराज की मृत्यु के पश्चात् गठित ट्रस्ट द्वारा अनियमितता बरते जाने के सम्बन्ध में सरकार का ध्यान आकृष्ट करते हुए श्री शकील अहमद खान ने १९९९ में विधान परिषद् में कहा कि माननीय सभापति महोदय , दरभंगा महाराज की मृत्यु १ अक्टूबर १९६२ में हो गयी . उन्होंने मरने के पूर्व एक WILL किया था . जिसके अनुसार उनकी सारी सम्पति की एक तिहाए से होनेवाली आमदनी को पब्लिक चैरिटी पर खर्च होना है . जिसके लिए एक ट्रस्ट की स्थापना की गयी . उक्त ट्रस्ट द्वारा स्व . महाराज की इच्छा के विपरीत पब्लिक चैरिटी के लिए सम्पति कौड़ी के मोल बेचीं जा रही है और उसका उपयोग पब्लिक चैरिटी के अतिरिक्त अन्य कार्यों में किया जा रहा है ,जो विल के विरुद्ध है .
कैसे चल रहा ट्रस्टा, कौन हैं ट्रस्टी
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आज हम बडी आसानी से आरोप लगा देते हैं कि महाराजा ने दरभंगा के लिए कुछ नहीं किया, लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि हमने उन संस्‍थाओं को भी बचाने का प्रयास नहीं किया, जिसे बचाने के लिए नहीं बल्कि महाराजा ने हमें उसे चलाने के लिए भी सौंपा था। ... जारी...

Sunday, April 3, 2016

ये है जलवा जलाल

घंटे भर में सस्पेंड हुए कदमकुआं के थानेदार-ज्ञानेश्वर
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आपको मैंने कल ही बताया था कि पटना के थानेदार किस कदर बहक गए हैं। आम आदमी का तो सुनते ही नहीं हैं कई थानेदार। मसला आज फिर से फंस गया। क्लिक कर सुनिएगा पूरा आडियो। दरअसल, कदमकुआं थाने से परेशान मुकेश ने सुबह अपनी पीड़ा हमें बताई। असम की रहने वाली मुकेश के घर की मेड दो - तीन दिनों पहले भाग गईं थी। अपना सामान छोड़ घर का कुछ सामान ले गई थी। थाने में रिपोर्ट लिखानी थी। कोई वहां सुनने को तैयार नहीं था।
मुकेश की पीड़ा जानने के बाद आज हमने दोपहर में एसएसपी से बात करने की कोशिश की, लेकिन संभव नहीं हो पाया। फिर हमने थानेदार से ही बात करने में कोई बुराई नहीं समझी। लेकिन हमें इसकी जानकारी थी कि कदमकुआं के थानेदार सुधीर कुमार बातचीत में ठीक से पेश नहीं आते। सो, होशियारी बरतते हुए मैंने कॉल की रिकार्डिंग की। जैसा अंदेशा था, वैसा ही हुआ। इतनी बदतमीजी तो उम्मीद से परे थी। थानेदार ने कहा - वे 22 वर्षों से पटना के थानों में हैं। मैंने कहा - अरे भाई, 26 वर्षों से हमने भी पटना में क्राइम रिपोर्टिंग की है। लेकिन ये बहके थानेदार मानने वाले कहां थे।
बातचीत के बाद मैंने आॅडियो को वाट्सएप पर वायरल किया। पटना के सभी क्राइम रिपोर्टर भी समर्थन में आगे आए। परिणाम, घंटे भर के भीतर थानेदार को सस्पेंड किया पटना के एसएसपी मनु महाराज ने। उन्होंने कहा - ऐसे लोग बर्दाश्त नहीं किए जा सकते।
बिहार पुलिस की तस्वीर पर क्लिक कर सुनें थानेदार की बदतमीजी को।

Sunday, March 27, 2016

दंगार्इ पत्रकारिता-मीडिया तब भी कराता था दंगा!

पत्रकार न तब कुछ कर सकता था आैर न ही अब कुछ कर सकता है. यह एक मजदूर है जो सिर्फ बौद्घिक मजदूरी करता है. खेल पहले भी होता था आैर खेल अब भी होता है लेकिन इस स्तर पर नहीं होता था कि एक प्रशासनिक अक्षमता को सांप्रदायिक रंग देनी की सियासत होती है...डाॅ नारंग जो अभी सेवा के लिए आए ही थी कि दरिंदों ने उन्माद में आकर हत्या कर दी आैर अब सियासत का बाजार गर्म है.
उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले यह आैर होना तय है जिस तरह से बयार चल रही है इसमें प्रशासनिक अधिकारियों को कमर कस लेनी चाहिए जो उन्होंने वर्दी पहनते वक्त कसम खार्इ थी दोहरा लेना चाहिए वरना उत्तर प्रदेश का चुनाव इस बार दंगा सरकार हो जाएगा.कानपुर से लेकर रामपुर तक चल रही सियासत में हिंदू भी मरेंगे आैर मुसलमान भी लेकिन सत्ता की सियासत चलती रहेगी आैर आपका परिवार बिखर जाएगा.मीडिया तटस्थ नहीं रहेगा बल्कि रेंगेगा.
उत्तर प्रदेश में बुलेट से बैलेट का इतिहास पुराना है लेकिन रेखाचित्र इस बार नया होना जा रहा है अंदर खाने सपा आैर भाजपा का गठजोड आैर जहर घोलने को तैयार है तुष्टीकरण की रणनीति पर सब कुछ तबाह की भी तैयारी हो चुकी है. मायावती की ताकत को तोडने के लिए हर काम किया जाएगा आैर फिर अलग-अलग सीट लेकर भाजपा-सपा सरकार बनाने की तैयारी भी कर ली गर्इ है.अब यह होता कैसे है आगे आगे देखिए होता है क्या...

दोनों ही पक्ष आए हैं तैयारियों के साथ
हम गर्दनों के साथ हैं वो आरियों के साथ
बोया न कुछ भीए फ़सल मगर ढूँढते हैं लोग
कैसा मज़ाक चल रहा है क्यारियों के साथ

दंगा कैसे कराया जाता है वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल की कलम से समझिए आैर इसमें मीडिया को तब क्या चाहिए होता था आैर अब क्या चाहिए यह भी समझिए..



मीडिया तब भी कराता था दंगा!
शंभूनाथ शुक्ल
बीस मार्च को इस बार आलोक तोमर की याद में जो कार्यक्रम हुआ वह वाकई यादगार बन गया.इस कार्यक्रम में हर वक्ता अपनी बात को यूं जादुई अंदाज में रख रहा था कि मानों अपने आलोक तोमर की यादों का आलोक कभी धुंधला नहीं पडऩे वाला. हर साल बीस मार्च को आलोक की पत्नी सुप्रिया रॉय यह कार्यक्रम कराती हैं और इस प्रोग्राम में जिस शिद्दत से आलोक को याद किया जाता है वह मील का पत्थर बन जाता है. इस बार इस कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने कुछ बातें ऐसी कहीं जो सबसे अलग थीं . लोकतंत्र बनाम भीड़तंत्र मीडिया की भूमिकाष् विषय पर बोलते हुए आरिफ भाई ने कहा कि आज भीड़तंत्र लोकतंत्र को चलाने लगा है जबकि सत्य यह है कि चाहे वह सेमेटिक परंपरा हो अथवा भारतीय परंपरा दोनों का लक्ष्य एक ही है मगर भीड़तंत्र ने इस लोकतांत्रिक मकसद को अस्त.व्यस्त कर दिया है दोनों की परंपराओं में भीड़ काबिज है और ऐसी भीड़ जिसे परंपराए लोकतांत्रिक मूल्यों और नैष्ठिक सिद्घांतों के बारे में कुछ नहीं पता दोनो तरफ उन्मादी भीड़ ही परंपरा के नाम पर लीडर है.
आरएसएस के विचारक और पूर्व छात्र नेता गोविंदाचार्य ने भी भीड़ की अराजकता पर चिंता जताई. हिंदुस्तान की पूर्व प्रधान संपादक मृणाल पांडे ने तो कार्यक्रम में जुटी अपार भीड़ को पहले तो मित्रों कहकर संबोधित किया फिर चुटकी लेते हुए बोलीं कि माफ करिएगा आजकल मित्तरों दुधारू तलवार बन गया है। यह सुनते ही ऐसा ठहाका लगा कि पूरे हाल में काफी देर तक ठहाकों की गूंज बनी रही.  मृणाल पांडे ने बताया कि हिंदुस्तान के प्रधान संपादक पद से मुक्त होने के बाद से वे अध्ययन में अपना समय दे रही हैं और इस समय वे हिंदुस्तान की गवनहारिनों और नचनहारिनों पर शोध कर रही हैंण् इन्हीं नचनहारिनों को याद करते हुए उन्होंने दो किस्से सुनाए.उन्हें पेश कर रहा हूं.
महात्मा गांधी आैर गौहरजान
मृणाल जी ने किस्सा सुनाया कि कलकत्ता में एक गवनहारिन तवायफ थीं गौहरजान जिनका पूर्व में नाम गौहरबानू था. वे इतना अच्छा गाती थीं कि उनकी महफिल में दूर.दूर तक के राजा.महाराजा और अमीर.उमरा जुटते और उनके गाने पर खूब मोहरें लुटाई जातीं. एक बार तो उन्होंने ऐलानिया कह दिया कि हिंदुस्तान का वायसराय की जितनी आमदनी महीने भर में होगी उतना पैसा तो वे एक ही दिन में कमा लेती हैं.
गौहरजान की मशहूरी दूर.दूर तक थी. एक बार महात्मा गांधी जब कलकत्ता गए तो वे गौहर जान से भी मिले और उनसे कहा कि वे भी अपना सहयोग आजादी की लड़ाई में करें. गौहरजान ने कहा कि महात्मा जी हम तो नचनहारिनें हैं भला हम क्या मदद करेंगेण् बस यही कर सकती हूं कि आपकी लड़ाई के वास्ते पैसा भिजवा दिया करूं. गांधी जी ने कहा कि ठीक है गौहर तुम एक कार्यक्रम करो और उससे जितनी आमदनी हो सब की सब कांग्रेस के कोष में दे दो. गौहरजान राजी तो हो गईं पर एक शर्त रख दी कि महात्मा जी आपको उस कार्यक्रम में स्वयं आना पड़ेगा.गांधी जी ने हां कह दी। मगर उस दिन कुछ ऐसी व्यस्तता आन पड़ी कि गांधी जी जा ही नहीं सके लेकिन उनको गौहरजान का वायदा याद था इसलिए अपने किसी सहायक को भेजा कि जाओ गौहर जान से उस कार्यक्रम में हुई आय को ले आओ गौहरजान ने उस सहायक को उस दिन की आमदनी का दो तिहाई पैसा ही दिया और एक तिहाई अपने पास रख लिया तथा महात्मा जी को संदेशा भिजवा दिया कि आपने स्वयं आने का वायदा किया था मगर नहीं आए इसलिए अपने खर्च के रुपये मैं रखे लेती हूं.
यह था उस तवायफ का देश की आजादी की लड़ाई में योगदानण् पर कांग्रेस के पूरे इतिहास में इस दानशीलता और तवायफों के त्याग का जरा भी उल्लेख नहीं है.
संपादक ने करा दिया दंगा
मृणाल जी ने एक अन्य गौहरजान का किस्सा भी सुनाया जो उस वक्त पारसी थियेटर कंपनी में काम करती थीं और उन्हें मिस गौहरजान कहा जाता था.आजादी के पहले जब सिनेमा इतना पापुलर नहीं हुआ था ये पारसी थियेटर कंपनियां पूरे देश में घूम.घूमकर नाटक आयोजित किया करतीं थीं. सन 1940 में यह पारसी कंपनी लाहौर में सीता वनवास का नाटक खेलने गई. अब वहां के नामी उर्दू अखबार के संपादक थे लालचंद फलकण् उन्होंने कंपनी के मालिक के पास संदेशा भेजा कि उनका पूरा परिवार सीता वनवास नाटक देखने आएगा इसलिए फ्री पास भिजवा दिए जाएं. तब तक पारसी नाटक कंपनियां किसी को फ्री पास नहीं जारी करती थीं. सो उसके मालिक ने टका.सा जवाब दे दिया कि हम फ्री पास नहीं देते चाहे वह एडिटर हो या कि कलेक्टर यह जवाब सुनते ही एडिटर लालचंद की भौंहें चढ़ गईं और उन्होंने अगले रोज अपने अखबार के पहले पेज पर खबर छाप दी कि नामी पारसी थियेटर कंपनी ने सीता माता के रोल के लिए मिस गौहरजान नामक तवायफ को चुना है. यह पढ़ते ही जनता भड़क गई और लाहौर में दंगा हो गया. उस पर काबू पाने में सरकार को काफी वक्त लगा. इसके बाद पारसी थियेटर कंपनियों ने फ्री पास जारी करने शुरू किए जो शहर के आला अफसरों,नेताओं और एडिटरों को दिए जाते थे लेकिन तब इन फ्री पास की रंगत से ही पता चल जाता था कि ये दर्शक मुफ्तखोर हैं.
मीडिया किस तरह गुस्साई भीड़ को अराजक तंत्र में बदल देता है इसका बेहतर उदाहरण था यह पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय ने भीड़ और मॉब में बुनियादी अंतर को रेखांकित किया और कहा कि भीड़ रचनात्मक भी हो सकती है मगर अराजक मॉब तो अराजक ही होगा पत्रकार और जदयू के सांसद हरिवंश ने सरकार की नाकामियों पर हमला किया टीवी एंकर विनोद दुआ भी बोले कार्यक्रम का संचालन विनोद अग्निहोत्री ने किया और शुरुआत आलोक के साथी रहे रमाशंकर सिंह ने यह सुप्रिया का ही कमाल है कि यादों में आलोक का हर कार्यक्रम अपनी अमरता छोड़ जाता है.

बाकी कुंवर बेचैन की ये पंक्तियां आपकाे बताएंगी
दोनों ही पक्ष आए हैं तैयारियों के साथ
हम गर्दनों के साथ हैं वो आरियों के साथ

बोया न कुछ भीए फ़सल मगर ढूँढते हैं लोग
कैसा मज़ाक चल रहा है क्यारियों के साथ

कोई बताए किस तरह उसको चुराऊँ में
पानी की एक बूँद है चिंगारियों के साथ

सेहत हमारी ठीक रहे भी तो किस तरह
आते हैं ख़ुद हक़ीम ही बीमारियों के साथ

कुछ रोज़ से मैं देख रहा हूँ कि हर सुबह
उठती है इक कराह भी किलकारियों के साथ

काजीरंगा- गैंडों के जंगल में नाचती एक प्रेम कथा

गैंडों के बीच से निकली प्रेम कहानी
काजीरंगा/नाम सुनते ही पूर्वोत्तर में सुदूर बसे असम की एक एेसी तलहटी का नाम कौंधने लगता हैं.जहां गैंडे ही गैंडे नजर आए लेकिन ब्रम्हापु़त्र नदी के किनारे बसे इस जंगल के विराना कैसे काजीरंगा बना यह कहानी बहुत कम लोगों को पता है.यह जंगल भी दो युवाआें के प्रेम का प्रहारी न बन पाया.जंगल के बगल से निकलती नदी इस इस प्रेम की उफनती नदी को पार नहीं पार्इ आैर इसी जंगल में यह प्रेम कहानी भी खो गर्इ. प्रेम के नाले दे देकर दुनिया के रखवालों ने उन्हें एेसा विदा किया की वह इन्हीं जंगलों खो गए.
जी हां यह काजीरंगा नहीं.काजी आैर रंगा हैं. प्रेमी प्रेमिका थे, जिनके प्यार के बीच दुनिया की दीवार लेकर बिरादरी वालों ने मंजूरी नही दी उनको इतना उत्पीड़ित किया कि वे  यहां के घनघोर जंगलों में भागकर जाने कहां खो गए। कालांतर में लैला मजनू की तरह कथा कहानियों के पात्र बने। अब इन दोनों के नाम पर यह इलाका काजीरंगा कहलाता है। असम का विख्यात काजीरंगा अभयारण्य यहीं पर है.
गैंडों जो किसी देवता की सवारी नहीं
एेसे तो हमारे हिंदू मान्यता के अनुसार ३३ करोड देवता हैं. इनके परिवहन के लिए सवारी भी चयनित है. इसमें सभी जानवरी किसी न किसी की सवारी हैं. पर यह सौभाग्य गैंडे को नहीं मिला. काजीरंगा अभयारण्य गैंडों के लिए विख्यात है। गैंडों का गर्भाधान काल 16 से 18 महीना है। बच्चे का वजन होता है 40 से 60 किलो तक होता है। मां का दूध वह तीन साल तक पीता है। इसकी रफ्तार 80 किमी तक है यानी बिना हाइवे स्पोटर्स कार लेकिन यही इकलौता निरीह जानवर है जिसे किसी देवी-देवता ने अपना वाहन नहीं बना।
खत्म हो रहा है काजीरंगा 
काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान मध्‍य असम में 430 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला है। इसमें भारतीय एक सींग वाले गैंडे राइनोसेरोस यूनीकोर्निस का निवास है। काजीरंगा को वर्ष 1905 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था। सर्दियों में यहाँ साइबेरिया से कई मेहमान पक्षी भी आते हैं हालाँकि इस दलदली भूमि का धीरे.धीरे ख़त्म होते जाना एक गंभीर समस्या है। काजीरंगा में विभिन्न प्रजातियों के बाजए विभिन्न प्रजातियों की चीलें और तोते आदि भी पाये जाते हैं। यूनेस्को द्वारा घोषित विश्‍व धरोहरों में से एक काज़ीरंगा राष्‍ट्रीय उद्यान साल 2005 में 100 वर्ष का हो गया है।
परिवहन
काज़ीरंगा गोवाहाटी से 250 किलोमीटर पूर्व और जोरहट से 97 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है। यह गोवाहाटी हवाईअड्डे से 239 किलोमीटर और जोरहट से 97 किलोमीटर दूर है। काज़ीरंगा जाने के लिए नियमित रूप से बसें आैर टैक्‍सी उपलब्‍ध हैं। काज़ीरंगा जाते वक़्त मिलने वाले बस पड़ाव को श्कोहोरा के नाम से जानते हैं। यहाँ से रेल सेवा 75 किलोमीटर दूर है।
अंडाकार काजीरंगा
पहले तो उसे अवैध शिकारियों से ही खतरा था  लेकिन अब बाढ़ भी उसे लील रही है. 2006 की गिनती के मुताबिक असम के इस पार्क में 1855 गैंडे थे लेकिन शिकार और बाढ़ की वजह से यह तादाद तेजी से घट रही है बीते साल 21 गैंडे शिकारियों के हत्थे चढ़ गए थेण् और इस साल के पहले आठ महीनों के दौरान यह आंकड़ा 18 तक पहुंच गया है. काजीरंगा का आठ सौ वर्ग किलोमीटर में फैले इस पार्क की एक सीमा ब्रह्मपुत्र नदी से मिलती है असम की राजधानी गुवाहाटी से लगभग सवा दो सौ किलोमीटर दूर नगांव और गोलाघाट जिले में आठ सौ वर्ग किलोमीटर इलाके में फैला यह पार्क इन गैंडों के अलावा दुर्लभ प्रजाति के दूसरे जानवरों  पशुपक्षियों व वनस्पतियों से भरा पड़ा है. उत्तर में ब्रह्मपुत्र और दक्षिण में कारबी.आंग्लांग की मनोरम पहाड़ियों से घिरे अंडाकार काजीरंगा को आजादी के तीन साल बाद 1950 में वन्यजीव अभयारण्य और 1974 में नेशनल पार्क का दर्जा मिलाण् इसकी जैविक और प्राकृतिक विविधताओं को देखते हुए यूनेस्को ने वर्ष 1985 में इसे विश्व घरोहर स्थल का दर्जा दिया. माना जाता है कि इन गैडों की सींग से यौनवर्द्धक दवाएं बनती हैं इसलिए अमेरिका के अलावा दक्षिण एशियाई देशों में इनकी भारी मांग है अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैंडे की सींग बीस लाख रुपए प्रति किलो की दर से बिक जाती है शिकारी इन गैंडों को मार कर इनकी सींग निकाल लेते हैं






जब विद्यासागर जी ने चप्पल फेंकी

जब विद्यासागर जी ने चप्पल फेंकी फिर एक चप्पल चली। रोज ही कहीं ना कहीं यह पदत्राण थलचर हाथों में आ कर नभचर बन अपने गंत्वय की ओर जाने क...