Monday, May 1, 2017

चीन खेल रहा है कश्मीर में खून की होली...

आज अखबार शहीदों की खबर से रंग गए हैं आैर सरकार जुमलों के रंग से...रटा रटाया बयान आ गया है कि शहादत बेकार नहीं जाएगी...तो भार्इ शहादत बेकार कब गर्इ है...आज मैं आपको बताने की कोशिश करूंगा कि कश्मीर में असल में क्या हो रहा है आैर फिर इसके पीछे की कहानी क्या है...

पत्थरबाजी-इन दिनों कश्मीर में जिस तरह से पत्थरबाजी बढी इसके मायने बहुत दूसरे हैं..पहले यह पत्थरबाजी पैसे के लिए सिर्फ युवा करते नजर आते थे अब इसमें स्कूली बच्चे भी शामिल हो गए हैं दरअसल अब कश्मीर में सिर्फ पकिस्तान का इंटेरेस्ट नहीं है इसमें चीन भी शामिल हो गया है.इसके इशारे पर अब पत्थर का इस्लामीकरण कर दिया गया है...युवाआें काे बरगलाकर यह परिभाषित किया गया कि जिस तरह मक्का मदीना में हज करके शैतान को पत्थर मारने से बरकत मिलती है..वही बरकत मिलेगी आैर इसमें आतंकी मौलाना कामयाब रहे आैर इस समय बच्चों को सेना शैतान की शक्ल में नजर आ रही है.

चीन-पकिस्तान की कश्मीर नीति अब चीन ही तय कर रहा है.इसी नीति के तहत अब बलूचिस्तान को पांचवा राज्य घोषित करने जा रहा है.यह विवादित क्षेत्र है आैर एेसा हाेता है तो फिर भारत के लिए चिंता की बात है.दूसरी बात जमात उद दावा के प्रमुख हाफिज सर्इद पर वीटो लगाकर उसने चरमपंथी गुटों को भी अपने पक्ष में कर लिया है...या यूं कहें कि उन्हें हफता दिया है उनकी जान बचाने का
आैर अब पूरे पकिस्तान में उसकी सडक परियोजना भी आरपार हो रही है जाे चीन के लिए न केवल नया बाजार बनेगी बल्कि रणनीतिक रूप से भी यह बेहद कारगर होगी. चीन अपने पर्ल नेक कार्यक्रम के तहत पूरे भारत को घेरने में लगा हुआ है आैर पिछले साल हुर्इ राजनीतिक चूक के कारण चीन नेपाल में घुसने में कामयाब रहा आैर वह अब रेललाइन बिछाने जा रहा है...यानी अब भारत के भीतर अब नक्सलियाें को वह नेपाल में बैठकर मदद करेगा
पत्थरबाजी को लेकर पकिस्तान की बदली रणनीति चीन की है.चीन की गोद में बैठकर पाकिस्तान वही कर रहा है जो चीन कह रहा है.चीन चाहता है कि चाहता है की कश्मीर का मुददा गर्म रहे आैर भारत इससे बाहर न निकल पाए.इसमें अगर कोर्इ स्कूली बच्चा मौत का शिकार हो जाए तो उसे अंतरराष्टीय मुददा बना पाए आैर फिर दबाव बने टेबल पर आकर बात करने का...उनकी शर्त पर
पकिस्तान-पकिस्तान में सरकार सेना चलाती है तो उसे मुल्क से बहुत मतलब नहीं है जितना ही युद्घ होगा उतना ही धनअर्जन होगा...इसी रणनीति पर काम करती है...रही बात अन्य चीजों की तो वहां उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं...परजीवी स्टेट की तरह कभी अमेरिका के रहमों करम पर ताे कभी चीन के रहमोंकरम पर अपने आप को जिंदा रखे हुए है.
भारत-भारत को रणनीति बदलनी होगी.पकिस्तान से काम नहीं चलेगा बल्कि आतंक की आहट क्या है उसे चीन को बताना होगा...वियतनाम से कुछ बात करनी होगी रूस से भी चर्चा जरूरी है...बाकी डोभाल से बताएंगी
सेना-यह पहली बार नहीं है.१९५० से यह चला आ रहा है.यह टेरन इतनी खतरनाक है कि यहां यह सब हाेता रहता है...यह अलग बात है की कारगिल की युद्घ के बाद शहीद घर पहुंचने लगे हैं आैर सब बातें सामने आने लगी हैं वरना यह बातें सेना बताती नहीं थी.उसे अपने तरीके से सुलझाती थी...अब सेना का तरीका क्या है यह बताने की जरूरत नहीं है
मायने---मतलब यह कि अब असली जंग पकिस्तान से नहीं अर्थव्यवस्था से है जो कि चीन की है...अगर उसे तोडना है ताे उससे व्यापार बंद करना होगा...चीन से व्यापार आज अगर बंद करने की घोषणा हो जाए तो कश्मीर में पत्थरबाजी कल ही रूक जाएगी.सबसे बडा आयात हम चीन से करते हैं आैर इसे तोडना होगा...एेसा होते ही पूरी चीनी अर्थव्यवस्था हिल जाएगी आैर हमें जरूरत नहीं होगी जंग की...सीधी बात की कश्मीर में छदम हस्ताक्षेप चीन बंद करें...वरना जंग का तरीका बदलने में हम कम नहीं है...सरकार को अब हवार्इ दौरे के बजाय जमीन पर, अर्थव्यवस्था पर जंग की तैयारी करनी होगी

कश्मीर-यहां सरकार को भी समझाने का तरीका बदलना होगा आैर युवाआें को भी समझने का...२०१० में मैने कश्मीर गया था वहां मैने सीधे बात की कि अगर अवसर मिले तो कहां जाएंगे पकिस्तान...चीन...आजादी या भारत...साफ कहा था पकिस्तान में हम मुहाजिर हो जाएंगे जनाब जाने का मतलब ही नहीं...चीन से तो कोर्इ मतलब ही नहीं है आैर आजाद होकर करेंगे क्या है क्या हमारे पास...भूखे मरने की नौबत आ जाएगी...भारत ही हमारे लिए बेहतर है...अब अगर ये बात है तो फिर इसे बढानी होगी एक बात आैर कही थी कि हमें मुफती आैर अब्दुल्ला परिवार से आजादी चाहिए अब इसके मायने में नहीं समझ पाया...कश्मीरियों को तय करना होगा कि उन्हें सच में क्या चाहिए

Monday, February 6, 2017

पत्रिका में पांच साल

आज की एेसी ही शाम करीब ७ बजे राजस्थान पत्रिका को पांच साल पहले मैनें ज्वाइन किया था.हालांकि आधिकारिक रूप में ७ फरवरी को ज्वाइनिंग हुर्इ लेकिन झालाना कार्यालय में ६ फरवरी को ही पहुंच गया था. तत्कालीन संपादक श्री मनोज माथुर ने मुझे ब्यूरो चीफ राकेश शर्मा जी के नेतृत्व में काम करने के आदेश दिया. धर्म, पर्यटन, कृषि से शुरू हुआ सिलसिला रेलवे, एयरपोर्ट, मौसम, परिवहन, रोडवेज, एसीबी, सीबीआर्इ, फाइनेंस, डीआरआर्इ, र्इडी के रास्ते पर निकल पडा.
यहीं मुलाकात हुर्इ श्री अशोक शर्मा जी से आैर संपादक आशुतोष जी से. अशोक जी ने खबरों की बारीकियां इतनी सिखार्इं कि एक माह में ३७ एक्सक्लूसिव खबर आैर फिर एक ही दिन तीन बार्इलाइन तक मिली.आशुतोष जी ने खबर के हर पहलु को लाने के लिए टकराने की ताकत दी.हर खबर पर हमेशा नजर मारने का मौका मिला.
यहीं आगरा से आए श्यामवीर के साथ मिलकर हमने खबर ब्रेक की थी कि युवा देश से आतंकी बनने जा रहे हैं. कुछ कारणों से छप नहीं पार्इ लेकिन इंडियन एक्सप्रेस ने जब तीन महीने बार खबर मुंबर्इ से ब्रेक की तो बहुत खुशी हुर्इ देख कि खबर हमारे पास जयपुर में भी थी.
तत्कालीन डेस्क हेड राजीव जैन जी की बात किए बिना बता अधूरी है.फोन पर खबर आैर किसी भी अंतिम समय पर खबर देने के बाद भी खबर का टीरटमेंट दे देना, एेसा व्यक्ति अब तक नहीं देखा, यही वजह रही कि खबरों की धुंआधर बैटिंग हुर्इ. हमारे लिए यह तिकडी तबाडतोड खबरें लिखने का मौका लेकर आर्इ; बाद में क्राइम कल्स्टर हेड फिर आशुतोष जी के सन्निध्य में स्टेट ब्यूरो, भोपाल स्टेट ब्यूरो फिर लौट कर साफ सीधी बात वाले शख्सदौलत सिंह चौहान जी के साथ भी काम करने का मौका मिला. २०१६ में मेरे जीवन की सबसे बडी बात हुर्इ सुरेश व्यास सर ने मुझे सैन्य बलों की खबरों को लिखना सिखाया, रात में बैठाकर इसकी पढार्इ करार्इ. संस्थान ने इस दौरान मुझे सैन्य बलों की एक माह का प्रशिक्षण लेने का भी अवसर दिया.
इन पांच सालों के दौरान अधीर हो जाने पर कर्इ वरिष्ठजन ने मुझे बल दिया.जैन सर, तिवारी सर, पाराशर सर, मलिक सर, गांधी सर, संदीप सर सहित कर्इ एेसी शख्सियत हैं.

Thursday, November 24, 2016

फर्जी पायलट बनाने वाली हिसार हवार्इपटटी से कालेधन का खेल

हरियाणा का हिसार हवार्इअडडा यूं तो छोटी सी हवार्इपटटी है लेकिन बदनामी में इसका नाम सबसे बडा है.फिर चाहे फर्जी पायलट तैयार करने का मामला हो या फिर अब काले धन की हेराफेरी का.शांंत पडा रहने वाला हिसार का हवार्इअडडा प्रधानमंत्री मोदी के नोट बंद की घोषणा के बाद सबसे ज्यादा चार्टर विमान संचालित करने वाला हवार्इअडडा बन गया.सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार यहां से हर दिन दो से तीन उडान हुर्इ है आैर वह भी सिर्फ पूर्वोत्तर राज्यों के लिए.

कालाधान खापने का काला खेल
दरअसल पूर्वोत्तर राज्याें कर्इ जनजातियों को हर प्रकार के आयकर प्रावधान से छुट मिली हुर्इ है.कोर्इ भी आयकर के दायरे में नहीं आता है आैर न ही कोर्इ कानून लागू होता है.अब इसी गलियारे को चोरटाइप के चाटर्ड एकाउंटेंटस ने कालाधान का गलियारा बना डाला. नोट बंद की घोषणा के बाद एक के बाद एक चाटर्ड विमान दीमापुर पहुंचने लगे.

तीन करोड ने बिगडा खेल

इसी दौरान साढे तीन करोड रूपए पकडे गए आैर फिर रहस्मय तरीके से गायब भी हुए आैर अब फिर मिल गए हैं लेकिन इस छानबीन के दौरान जो चौंकाने वाली जानकारी आयकर अधिकारियों के सामने आर्इ उसने होश उडा दिए.आननफानन में चाटर्ड विमानों के रूट परमिशन डीजीसीए आैर एटीसी से मांगए गए आैर अब सभी उडानों की जांच शुरू हो गर्इ है.

शादी विवाह के बहाने खप रहे नोट

आयकर विभाग से जुडे एक अधिकारी का कहना है कि नोट खपाने के लिए करोडपति परिवारों ने शादी का बहाने भी उपयोग किया है.एक राज्य जिसमें सबसे ज्यादा शादियों होती है.अब वह भी दायरे में है.शादी में परिवार को लाने ले जाने के बहाने रकमो की भी हेराफेरी हुर्इ है;

इन राज्यों में है छूट
लददाख
मिजोरम
असम
मेघालय
मणिपुर
नागलैंड
त्रिपुरा
अरुणाचल प्रदेश

Thursday, November 10, 2016

उत्तर प्रदेश की त्रिशंकु विधानसभा की बिछती चौसर


उत्तर प्रदेश में सर्द की दस्तक के साथ चुनावी चौसर ने सरगर्मी बढ गर्इ है.राजनीति गलियारे भरे हुए हैं आैर बाहरी तापमान भले ही २४ हो लेकिन पार्टी मुख्यालयों के तापमान पर मर्इ का मौसम हावी है.चुनावी चौसर की बिछ रही बिसात में सभी अपनी मोहरें बिछने व्यस्त हैं.कोर्इ टिकट के लिए लाइन लगा रहा है तो कोर्इ मुख्यमंत्री पद का सपना संजाेए हैं.इस बिछती हुर्इ बिसात में मन किया की सबके दिल की हालत देखी जाए.चुनावी कबडडी में एक बार फिर से ताल ठोंकी जाए.मुलायम के दांव की मायावती के बिसात की आैर भाजपा के चार की आैर कांग्रेस के कमाल की चर्चा की जाए.फिर चार दिन का यह दृश्य हमें नजर आया.
भाजपा का पलडा फिलहाल भारी है.पिछले चुनाव में दूसरे तीसरे आैर चौथे नंबर पर रहे कर्इ प्रत्याशी पहले से ही भाजपा का दामन थाम चुके हैं. बाकी एक नंबर पर विजय पाने वाले भी टिकट के लिए लाइन में हैं. इतिहास गवाह है कि टिकट बंटने में जब जिस पार्टी में हंगामा हो तो वह जीत रही है.
लखनउ, बाराबंकी, फैजाबाद, बस्ती, कुशीनगर, गोरखपुर, गाेंडा, बहराइच, सुल्तानपुर, उन्नाव, अकबरपुर, कानपुर का कमोवेश यही हाल है.मतदाता यूं तो किसी से खुश नहीं है लेकिन यह भी सोच रहा कि एक बार मायावती आैर फिर मुलायम के बाद अब क्यों न उत्तर प्रदेश में भगवा रंग को भी देख लिया जाए.
बसपा पर इस बार मुस्लिम प्रत्याशी की होड लगी है अगर एेसा रहा है तो २९ प्रतिशत के वोट से मुख्यमंत्री तय करने वाले इस प्रदेश में मायावती का पलडा भारी है यह एसी आैर मुस्लिम को वोट प्रतिशत ३५ पार कर जाएगा खास बात यह है कि यह वर्ग वोट डालने के लिए जाने वाला वर्ग है.हालांकि कुर्सी पर कब्जा दिलाने वाले पंडित जी इस बार गायब हैं.
सपा के लिए खतरे की घंटी परिवार से ही नहीं समाज से भी बजी है.मुस्लिम यादव की गठजोड में ठाकुर साहब के ताव पर सवार होकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज सपा से मुस्लिम सटक रहा है.ठाकुर साहब भी खासे प्रभावित नहीं हैं इस बार आजम के बजाय नसीमुदृदीन सिदृकी चल रहे हैं.यादव जी की वजह से अन्य आेबीसी पहले ही झटका दे रहे हैं फिर चाहे वह पटेल लाबी हो यह फिर मौर्या
कांग्रेस २००९ के लोकसभा चुनाव में कमाल करने वाली कांग्रेस को इस प्रत्याशी भी मिलते नहीं दिखार्इ दे रहे हैं.जिलों के जिलाध्यक्ष ही पोस्टर बैनर चिपका कर दिल पर मरहम लगा रहे हैं.करीब चार दिनों में ९०० किलोमीटर की यात्रा में कांग्रेस के एक दो पोस्टर के अलावा दिवाली आैर छठ की बधार्इ का भी बैनर दिखार्इ नहीं दिया.
अंत में उत्तर प्रदेश की राजनीति में खेल बनाने बिगडने का काम पीस पार्टी,पटेल पार्टी, हैदराबाद वाली पार्टी आैर राजा भैया की एकल पार्टी सहित अन्य पार्टियां करेंगी.

चलते-चलते---नोट के सर्जिकल स्टाराइक ने भाजपा को आैर मजबूत कर दिया है मोदी का यह फैसला वोटरों को खासा लुभा रहा है एेसे में अगर भाजपा का प्रचार तंत्र बेहतर रहा आैर स्थानीय स्तर पर आेम माथुर सही प्रत्याशी चुन पाए तो भाजपा चुनाव जीत जाएगी वरना विधानसभा त्रिशंकु हो जाएगी.एेसे में अपनी जगह बचाने के लिए तीनों पार्टी गठबंधन कर सकती हैं क्यों कि सभी का मकसद एक है कि किसी भी तरह भाजपा की सत्ता को रोका जाए.

Sunday, October 16, 2016

कहीं फिर न हो कंधार कांड, परोसे जा रहे चाकू-कांटे

जयपुर. सीमा पार कर हुई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद देश की सीमा सहित देश के सभी हवाईअड्डे अलर्ट पर हैं। तो दूसरी तरफ विमानन कंपनियां सुरक्षा में चूक कर रही हैं। हवाईअड्डे पर जांच में नोंकदार या फिर ब्लेड तक रखवा लेने वाली सुरक्षा के बावजूद विमान में ही स्टील का चाकू और काफी नोंकदार कांटे परोसे जा रहे हैं। वह भी एयर इंडिया की उड़ान में जो कि १९९९ में अपने विमान आईसी ८१४ का अपहरण झेल चुका हैं। उस समय एयर इंडिया की अंतरराष्ट्रीय सेवा को इंडियन एयरलाइंस के नाम से जाना जाता था। 
विमानों में यह है प्रतिबंधित 
नागर विमानन सुरक्षा ब्यूरो (बीसीएएस)ने साफ तौर पर ७२ सामान की सीधी लिस्ट जारी की है। इन सभी को विमान में नहीं ले जाया जा सकता है। इसमें चाकू भी शामिल है। इसमें साफ है कि प्लास्टिक कटलरी में भी चाकू के लिए साफ माना किया गया है। हालांकि प्लास्टिक कटलरी में भी कई विमानन कंपनियां इसका इस्तेमाल कर रही हैं। इसके अलावा इसमें अन्य नुकली वस्तुएं भी शामिल हैं। इसके अनुसार स्टीनलेस स्टील का कांटा भी प्रयोग नहीं किया जा सकता है। क्या था कंधार कांड?
२४ दिसंबर १९९९ को  काठमांडू हवाईअड्डे से इंडियन एयरलाइंस के विमान आईसी ८१४ को छह आतंकवादियों ने हथियार के दम पर अपहरण कर लिया था।  उड़ान के बाद विमान का अपहरण कर कंधार ले जाया गया था। इसमें १८९ यात्री सवार थे। इस मामले में आतंकी मसूद अजहर, मुश्ताक अहमद और अहमद उमर शेख को छोडऩा पड़ा था।

Monday, May 16, 2016

"क्लासमेट" से "क़त्ल" तक के सफ़र में राजदेव और शहाबुद्दीन




पटना। ऐसे "कलम के सिपाही" बड़े ही विरले ही होते है जो अपने "जीवन पर छाये मौत के साये" के बावजूद सच के खातिर बेधड़क बेलाग बेख़ौफ़ होकर लिखते रहते है। धन दौलत और तमाम प्रलोभवनो के बावजूद राजदेव " सच की शम्मा" जलाते रहे।                      
 दिवंगत पत्रकार राजदेव रंजन के बारे कहा जा सकता है कि वह एक व्यवहार कुशल, कलम से समझौता करने से कोसों दूर एक निडर पत्रकार और एक सम्मानित बैनर के सहारे " सच को सच" कहने वाले पत्रकार थे। एक ही इलाके एक ही परिवेश में पीला बढे शहाबुद्दीन और राजदेव एक दूर से परिचित थे। साथ ही वक्त के बदलते दौर में दोनों दो अलग अलग राहो पर चल निकले।लेकिन एक दौर वो भी आया जब वो और शहाबुद्दीन के क्लास मेट भी रहे। दोनो ने एस साथ पीजी किया था।इसी की वजह से इलाके में माना जाता था कि वह सांसद के करीब होंगे लेकिन उनकी कालान्तर में उनकी धारदार और ईमानदार लेखनी ऐसा समझने की इजाजत नहीं देती थी। पत्रकारिता की में कलम की धार और प्रखर करते हुए राजदेव अपनी पढाई भी जारी रखे हुए थे। अपनी अपराध से जुडी रिपोर्टिंग को और सशक्त करने के खातिर वकालत की भी डिग्री ली थी राजदेव ने। इसी का असर था की वो कानून की बारीकियों को समझते हुए अपराध की खबरों की हर बारीकी को तह दर तह उधेड़ कर रख देते थे।                       
 सिवान की जमीनी हक़ीक़त के हर  उस सच से राजदेव ने अखबार के माध्य से उजागर किया और मार दिए जाने तक करते रहे। उनकी कलम ने हर उस सच को सच लिखा हर उस सियासी उत्पात से लोगो को रूबरू कराया बिना किसी हिचक के। उस वक्त भी राजदेव नहीं डरे जब "सिवान की फिज़ा" साहब के अलावा कोई और शब्द नहीं उड़ा करता था।                          
राजदेव रंजन ने सीवान में पिछले 24 सालों पत्रकारिता कर रहे थे। इस सच से भी आगत थे की वो विगत 9 सालों से अपराधियों के निशाने पर थे। यही कारण रहा है कि एक बार उनके दफ्तर पर भी अपराधियों ने उन पर हमला बोला था। राजदेव पर  2005 में भी उनके दफ्तर पर हमला हुआ था। राजदेव रंजन के सहयोगी रहे दुर्गाकांत उस समय उनके मौजूद थे। यह हमला अक्तूबर 2005 में हुआ था। रात आठ बजे के करीब कुछ लोगों ने ऑफिस के बाहर से राजदेव को आवाज देकर बाहर बुलाया और धमकाने के बाद बुरी तरह से पीटा था।लेकिन तब संयोगवश राजदेव को ज्यादा चोटे नहीं आई थी, क्योकि आस पास के लोगो के जुट जाने से हमलावर भाग गए थे। इसके बाद भी राजदेव ने अपने जीवन पर आफत आने के बाद भी सच को सच कहने वाली निर्भीक पत्रकारिता को जिंदा रखा था।                                                     
अपने जीवन पर अपराधियों की गिद्ध दृष्टि होने से राजदेव हमेशा से अवगत रहे थे। सीवान पुलिस को 2007 में ही पुलिस की स्पेशल ब्रांच ने जिले के 24 लोगों की जान को खतरा होने का इनपुट दिया था।इसकी जानकारी जिले के पुलिस कप्तान को भी दी गई थी।अपराधियो की इस हिटलिस्ट में राजदेव का भी नाम था। उस वक्त की जानकारी के मुताबिक तब सीवान जेल से ही 24 लोगों के नाम डेथ वारंट की लिस्ट जारी की गई थी। राजदेव के साथ काम करने वाले लोग भी बताते हैं कि सच को सच कहने की जुनूनी रिपोर्टिंग के कारण भी राजदेव को कई बार सीवान जेल से धमकी मिल चुकी थी। फिर भी निडर राजदेव न डरे न झुके न टूटे।                       
90 के दशक में शहाबुद्दीन ने बाहुबल और सियासत का कॉकटेल तैयार कर देश के प्रथम राष्ट्रपति की जन्मस्थली जीरादेई से बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ा और सफल भी रहे। ये दौर बिहारमे लालू यादव के सियासी उत्कर्ष का था। जीरादेई से मिली शहाबु की जीत ने लालू का ध्यान इस युवा तुर्क की ओर गया। फिर क्या था लालू के ऑफर को लपकते हुए शहाबुद्दीन ने सिवान के साहब की पदवी पा ली। फिर  आया वो दौर जब सांसद बन बैठे शहाबुद्दीन ने सिवान की धड़कनो पर भी अपनी हुकुमत कायम कर ली। दौर ऐसा भी आया जब बिहार पुलिस और साहब की फ़ौज प्रतापपुर गाँव में भीड़ गई। दोनों तरफ से कई लोग वीरगति को प्राप्त हुए। जिस तरह के अत्याधुनिक हथियारों का प्रयोग राजद सांसद के गुर्गो ने किया बिहार कुलिस समेत सभी सुरक्षा एजेंसियों के होश पूड गए।                  
अब बारी सरकार की थी। बात 2005 की है। फरवरी का विधान सभा चुनाव शुरू होने ही वाला था। दस फरवरी को चुनाव आयोग के निर्देश पर जिले में नए डीएम और बारह फरवरी को नए एसपी की पोस्टिंग सीवान में हुयी। डीएम सीके अनिल ने दस फरवरी को फर्स्ट हाफ में ही अपनी ज्वाइनिंग दी और अपने कंफिडेंशियल रूम में कैद हो गये। किसी से मुलाकात नहीं की सिवाय मण्डल कारा सिवान के जेल अधीक्षक के। कानून की सारी बारीकियों को दिन भर में सीके अनिल ने खंगाल डाला और दूसरे दिन ग्यारह फरवरी की रात बाहुबली राजद सांसद मो. शहाबुद्दीन को आदर्श कारा पटना भेज दिया। यह सब इतनी खामोशी से हुआ कि मीडिया को भी इसकी जानकारी 12 फरवरी को ही हुयी। बहरहाल, उसी दिन  नये एसपी रत्न संजय ने भी अपनी ज्वाइनिंग दे दी थी। इन दोनो अधिकारियों का जलवा ऐसा ही था जो सीवान की लगभग हर जरूरत पूरी करता रहा और इसका असर यह हुआ 10 फरवरी के पहले तक जिसका नाम जिले के तीस-बत्तीस लाख की आबादी की जुबान पर दहशतगर्द के रूप में आता था उसे बदलने में जरा भी देर नहीं लगी। विधि-व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में और राजद के बाहुबली सांसद मो. शहाबुद्दीन के सारे गुर्गे भूमिगत। लेकिन सभी देश के चार कोनो में छिपे हुए। यह इकबाल था सिवान जिला प्रशासन का। चुनाव परिणाम जो भी रहे, मुख्य विशेषता लॉ एण्ड आर्डर थी और लोग राहत की सांस ले रहे थे। इस दौर में भी राजदेव की रिपोर्ट में हर उस सच को लिखा जो पुरे देश के लोगो ने पढ़ा।                 
 इन सालो में खौफ़ और उपद्रव की।कहानियों ने एक नए क्षितिज को छु लिया था। सीवान की सामाजिक केमिस्ट्री बिलकुल ख़त्म हो गई थी।प्रशासन का इकबाल लौटते ही शहर और जिले की समरसता लौटी। बुद्दीजीवि व्र्ग के सहयोग से बेशक उसमे सुधार लाने का काम वहां की मीडिया ने किया और उसमे राजदेव रंजन की महती भूमिका रही थी। सीवान ने बहुत कुछ खोया है और उस सूची में राजदेव रंजन का भी नाम शुमार होगा, शायद इसकी कल्पना किसी ने नहीं की होगी। पर अब यही सच है। बिहार सरकार ने इस हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौपने की अनुशंसा कर दी है। उम्मीद है कि इस सच के चितेरे की हत्यारों को कानून सजा भी देगा। लेकिन ये भी एक जाते जाते भी राजदेव बता गए की " सच की राह बलिदान " मागती है। -

यह नंबर की माला नहीं, मौत का नंबर है

आर्इएएस से लेकर दसवीं तक के परिणामों की घोषणा हर छात्र आैर छात्राआें को उसके पढार्इ का पैगाम लेकर आ रही है. हर जगह उल्लास दिख रहा है मीडिया में भी नुमार्इश जारी है.बडा अच्छा लग रहा है देखकर फलां टाॅपर है आैर माला पहने एक अखबार से दूसरे अखबार के कार्यालय फोटो खींचाने के लिए घूम रहा है लेकिन बडा अचंभा होता है कि कोटा से खबर आती है की फलां लडकी ९२ प्रतिशत अंक लार्इ थी लेकिन फिर भी ९८ प्रतिशत अंक नहीं लाने के कारण फंदे से झूलग गर्इ
मां-बाप या फिर सामाजिक प्राणियों द्वारा डाली गर्इ यह मालाएं नंबर लाने की खुशी कम बल्कि उनके मां बाप के शौर्य का भौडा प्रदर्शन है.इसी की बेदी पर चढकर आगे इन्हीं छात्रों में से कुछ छात्र आत्महत्या कर लेते हैं.छोटे-छोटे बच्चे हाथों में मिठार्इ का डब्बा लिए अखबार के दफतरों में मिठार्इ खिला रहे हैं मां बाप अपनी अपेक्षाआें को बढाए ही जा रहे हैं.यह मालाएं खुशी के बोध से ज्यादा अपेक्षाआें का नया फंदा बनकर उभरने जा रही हैं जो हर समय टीस देंगी की हम ही हैं चाहे कुछ भी हो.अच्छी बात है जब सब नैर्सिगक हो लेकर सब का सब बनावटी है
गले में लटक रही मालाएं मां बाप की अपेक्षाआें का नया फंदा है आैर मीडिया में लिए नया धंधा जो कि पिछले कुछ वर्षों में कोचिंग संस्थानों के उगने के साथ आया है; यह विज्ञापन तो वसूल करता है लेकिन बचपन छीन कर. मानव संसाधन मंत्री रहे कपिल सिब्बल ने नंबर खत्म करने के लिए ग्रेड प्रणाली लागू तो की लेकिन अभी तक वह लागू सही तरीके से नहीं हो पार्इ है
नंबर का यह खेल हर साल मासूमों की आत्महत्या का नंबर बढा रहा है.मीडिया का चेहरा दिखाने का यह धंधा बहुत सारे मासूमों के गले का फंदा बन रहा है. मीडिया हीरो बनाता है लेकिन अगर हीरो नसरूदीन शाह जैसा नैर्सिक हो तो अच्छा रहता है वरना तो माॅडलिंग वाले हीरो की तरह हालत होती है कि कुछ समय बात साबुन का विज्ञापन मिलाना भी बंद हो जाता है.
हम इस बात से भी इत्तेफाक रखते हैं कि इस बात के दूसरे तर्क आैर पहलू भी हैं लेकिन मौत की माला के इस पहलू से कोर्इ इंकार करे शायद मुझे नहीं लगता.अपील की अपने बच्चे को खूब पढाए आगे बढाए साहस दें लेकिन शाैर्य प्रदर्शन करने के लिए अखबारों आैर टीवी के दफतरों का चक्कर न लगाएं.इस चमकते गलियारें की कर्इ स्याह रास्ते आैर रातें है आैर इन बच्चों के पास उजाला भविष्य
इस बीच बाहर टहल रहा था तो एक छोटा बालक माला पहने नजर आया.पीछे देखा तो ५६ इंच से ज्यादा सीना चौडाकर पिता खडे थे मजरा समझते देर न लगी बालक ने महज १२ साल ८ माह की उम्र में १२वीं पास कर ली.वैसे तो यह बच्चा अकेले में ३डी मोगली फिल्म भी नहीं देख पाए इस नन्हे मुन्हें राही ने फुटबाल क्रिकेट आैर अन्य किसी खेल में भी हाथ नहीं आजमाए पता नहीं ये आगे बढने की दौड कितने आंइस्टीन खोज पाएगी.मुझे तो लगता है दिखावा ज्यादा दम कम हर जगह यही नुमाया हो रहा है.चलो अब पूर्वांचल से लेकर केरल अम्मा ममता के रिजल्ट भी कल नजर दौडा लेना.

...बाकी जो है सो हाइए है

जब विद्यासागर जी ने चप्पल फेंकी

जब विद्यासागर जी ने चप्पल फेंकी फिर एक चप्पल चली। रोज ही कहीं ना कहीं यह पदत्राण थलचर हाथों में आ कर नभचर बन अपने गंत्वय की ओर जाने क...