Sunday, March 20, 2016

"द सीज "- 26/11 के 10 सच।...जीतेंद्र दीक्षित

26 नवंबर 2008 को मुंबई में जो आतंकी हमला हुआ था, उसे 5 साल पूरे हो रहे हैं। इन 5 सालों में उस हमले को लेकर तमाम किताबें लिखीं गईं, कई डॉक्यूमेंट्रिज बनाईं गईं, जांच रिपोर्ट्स वगैरह तैयार की गईं, लेकिन वो हमला इतना बडा था कि उससे जुडी तमाम बातों का अब तक पूरी तरह से खुलासा नहीं हो पाया है। यही वजह है कि हमले के 5 साल बाद भी उसे लेकर नई बातें सामने आ रहीं हैं, नये खुलासे हो रहे हैं। इसी कडी में 2 अंग्रेजी पत्रकारों की एक किताब सामने आई है- द सीज।
 इस किताब को पढने के बाद कम से कम 10 ऐसे सच सामने आते हैं, जिनका या तो अब तक खुलासा नहीं हुआ था या जिनपर ज्यादा गौर नहीं किया गया। अद्रीयान लेवी और कैथी स्कॉट क्लार्क नाम के दो अंग्रेजी पत्रकरों की ओर से लिखी गई ये किताब उन लोगों के बयान पर आधारित है जो 26-11 के हमले के दौरान ताज होटल में फंसे थे। पत्रकारों ने आतंकियों से लोहा लेने वाले पुलिसकर्मियों और एनएसजी कमांडोज से भी बातचीत की। दोनो पाकिस्तान में उन सभी आतंकियों के घर भी पहुंचे जो मुंबई हमले में शामिल थे।किताब में अमेरिकी खुफिया अधिकारियों से मिली जानकारी भी शामिल की गई। इस पूरी कसरत का निचोड ये निकला कि कई ऐसे तथ्य सामने आये जो अब तक किसी को पता नहीं थे या जिनपर अब तक गौर नहीं किया गया था। किताब का शुरूवाती हिस्सा कुछ बोरियत भरा लग सकता है जिसमें लेखकों ने ताज में फंसे लोग हमले से पहले दिनभर क्या कर रहे थे इसका ब्यौरा दिया है।
1-आतंकी हमले के महज घंटेभऱ बाद पुलिस के हाथ एक ऐसा सुनहरा मौका आया जो उसी रात ताज होटल के ऑपरेशन को खत्म कर सकता था। रात करीब 10 बजकर 50 मिनट होटल के अंदर घुसे चारों आतंकवादी एक साथ एक ही वक्त में होटल की पांचवीं मंजिल पर रूम नंबर 551 में दाखिल हुए। ये आतंकवादियों की ओर से की गई एक बडी गलती थी जिसका पुलिस इस्तेमाल कर सकती थी। डीसीपी नागरे पाटिल ने सीसीटीवी पर जब चारों को एक साथ देखा तो उन्होने तुरंत ही आधुनिक हथियारों से लैस असॉल्ट फोर्स को अपने पास भेजने का संदेश भेजा, लेकिन असॉल्ट फोर्स होटल की भूल भुलैया में नागरे पाटिल को खोज ही नहीं पायी। 10 मिनट बाद चारों आतंकवादी कमरा नंबर 551 से निकल कर 6वीं मंजिल पर चले गये और उन्होने आगजनी शुरू कर दी। पुलिस आतंकियों को घेरने का एक बहुत बडा मौका चूक गई। करीब रात 3 बजे तक डीसीपी नागरे पाटिल सीसीटीवी में सभी आतंकियों की हरकत देखते रहे, लेकिन वे कुछ नहीं कर सकते थे। आखिरकर आतंकियों ने उनके सीसीटीवी रूम पर ही हमला बोल दिया और उन्हें होटल से बाहर निकलना पडा।
2-हमले से महीनों पहले पुलिस को खुफिया जानकारी मिली थी कि आतंकी मुंबई के 5 सितारा होटलों को निशाना बना सकते हैं। इसके मद्देनजर इलाके के डीसीपी विश्वास नागरे पाटिल ने ताज होटल की सुरक्षा का जायजा लिया था और वहां पुलिस की सुरक्षा भी मुहैया कराई थी...लेकिन ताज होटल के प्रबंधन को होटल की 5 सितारा चकाचौंध के बीच वर्दी और बंदूकधारी पुलिसकर्मी खटक रहे थे। इसलिये जैसे ही डीसीपी नागरे पाटिल छुट्टी पर गये, ताज के प्रबंधन ने उनकी ओर से लगाई गई सुरक्षा को दरकिनार कर दिया।
होटल पर हमले का सबसे पहला खुफिया अलर्ट साल 2006 में आया था। उस अलर्ट के मुताबिक एक पाकिस्तानी जिहादी संगठन मुंबई के कई पांच सितारा होटल पर हमले की योजना बना रहा है जिसमें ट्राईडेंट-ओबेरॉय और ताज का भी नाम है। उस पहले अलर्ट के बाद उस जैसे 25 अलर्ट और भी आये जो कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने भारतीय एजेंसियों को दिये थे। कुल 26 में से 11 अलर्ट में ये बताया गया था कि आतंकी एक साथ कई ठिकानों पर हमला करने की तैयारी कर रहे हैं। 6 अलर्ट में ये साफ किया गया था कि आतंकी समंदर के रास्ते हमला करने पहुंचेंगे। आईबी को 2 ऐसे अलर्ट भी मिले जिनमें तारीखों के साथ जिक्र था कि आतंकी ताज महल होटल पर हमला कर सकते हैं। ये तारीखें थीं 24 मई 2008 और 11 अगस्त 2008। हालांकि दोनो तारीखों को हमले नहीं हुए।
ताज को लेकर बार बार आ रहे खुफिया अलर्ट्स ने स्थानीय डीसीपी विश्वास नागरे पाटिल को चिंतित कर दिया। इन तमाम अलर्ट्स के मद्देनजर उन्होने 12 अगस्त 2008 को ताज के सुरक्षा प्रमुख सुनील कुडीयाडी के साथ 9 घंटे तक मीटिंग की और बताया कि किस तरह से होटल की सुरक्षा व्यवस्था कमजोर है। डीसीपी पाटिल ने होटल की सुरक्षा मजबूत करने के लिये कुल 26 उपाय बताये जिनमें अहम दरवाजों पर हथियारबंद पुलिसकर्मियों की मौजूदगी भी शामिल थी। होटल ने इन सुरक्षा उपायों को सिरे से खारिज कर दिया, लेकिन 20 सितंबर 2008 को जब पाकिस्तान के इस्लामाबाद में एक 5 सितारा होटल पर आतंकी हमला हुआ तो ताज के प्रबंधन को डीसीपी पाटिल की बातों की गंभीरता समझ में आई। अक्टूबर के दूसरे हफ्ते तक पाटिल की ओर से सुझाये गये कुछ उपायों पर ताज होटल ने अमल किया...लेकिन ये सिर्फ कुछ दिनों तक ही रहा। डीसीपी पाटिल कुछ दिनों के लिये जैसे ही छुट्टी पर गये सबकुछ जस का तस हो गया।होटल के उत्तरी दरवाजे पर कोई सुरक्षा नहीं थी। मुख्य दरवाजे पर तैनात पुलिसकर्मियों को भी होटल ने हटवा दिया ये कहकर कि वे हरदम जंग की तैयारी जैसा माहौल नहीं बर्दाशत कर सकते। ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी होटल से खाने की मांग करते थे और ताज के प्रबंधन को ये अखर रहा था।
3-मुंबई के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर हसन गफूर ने ताज में मौजूद पुलिसकर्मियों के एक तरह से हाथ बांध दिये थे। उनका आदेश था कि एनएसजी के पहुंचने तक कुछ नहीं करना है। यहां तक कि जब शुरूवात में पास के नेवी नगर से मरीन कमांडोज की एक टुकडी पहुंची तो गफूर ने उसे दिशानिर्देश देने के लिये भी डीसीपी नागरे पाटिल को साथ जाने से रोक दिया।
एनएसजी को दिल्ली से पहुंचने में वक्त लगने वाला था। इसलिये तब तक आतंकियों को घरेन के लिये मार्कोस यानी मरीन कमांडोज बुलाये गये। इन मरीन कमांडोज को होटल की भौगौलिक जानकारी और आतंकियों की हलचल के बारे में बताने वाले किसी गाईड की जरूरत थी। चूंकि डीसीपी पाटिल हमले के शुरूवाती कुछ मिनटो के बाद ही होटल पहुंच गये थे और आतंकियों से उनका सामना हो चुका था इसलिये वे मार्कोस के गाईड बनने को तैयार हो गये...तभी उन्हें पुलिस कमिश्नर हसन गफूर का फोन आया। गफूर ने पाटिल को हिदायत दी- “ तुम ऊपर नहीं जाओगे। मैं दोहरा रहा हूं। तुम ऊपर नहीं जाओगे। मार्कोस खुद ऊपर जायेंगे। तुम नीचे ही ताज की घेरेबंदी करोगे”।गफूर का मानना था कि उस वक्त हालात जंग जैसे थे और मुंबई पुलिस अत्याधुनिक हथियारों से लैस आतंकियों से लडने के काबिल नहीं थी। ये काम एनएसजी ही कर सकती थी।
ज्वाइंट कमिश्नर लॉ एंड आर्डर भी ताज चेंबर्स में छुपे मेहमानों को निकालने के लिये ताज की सिक्यूरिटी टीम के साथ अंदर दाखिल होना चाहते थे, लेकिन कमिश्नर गफूर ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। कुछ देर बाद आतंकी ताज चेंबर्स की तरफ आये और उन्होने कई लोगों की हत्या कर दी।
4-एनएसजी का मानना है कि जब वो 27 नवंबर की सुबह मुंबई पहुंची तो पुलिस और खुफिया एजेंसियों की ओर से उसे सही सही नहीं बताया गया कि शहर में और खासकर ताज में कुल कितने आतंकवादी हैं। एनएसजी को बताया गया कि आतंकवादियों की संख्या 20 हो सकती है जबकि रात में ही अजमल कसाब से पूछताछ में ये साफ हो गया था कि सिर्फ 10 आतकंवादी आये हैं और उनमें से सिर्फ 4 ही ताज होटल में हैं।
आतंकी अजमल कसाब को हमले की पहली रात ही गिरगांव चौपाटी पर हुए एनकाउंटर में जिंदा पकड लिया गया था। रात में 2 बार उससे लंबी पूछताछ हुई। पहली पूछताछ अस्पताल में एसीपी तानाजी घाडगे ने की, जिसके बाद उसे क्राईम ब्रांच लाया गया। क्राईम ब्रांच में ज्वाइंट कमिश्नर राकेश मारिया ने दोबारा उससे पूछताछ की। दोनो पूछताछ में कसाब ने बता दिया था कि कुल 10 आतंकवादी आये थे, वे कैसे आये थे, किस तरह के हथियार उनके पास थे और किसे क्या जिम्मेदारी दी गई थी।
हालांकि कसाब ने सबकुछ बता दिया था, लेकिन पूरी जानकारी एनएसजी तक नहीं पहुंची।
5-वैसे तो हवाई जहाज से दिल्ली और मुंबई की दूरी महज 2 घंटे की है, लेकिन एनएसजी को मुंबई पहुंचते पहुंचते पूरी रात बीत गई। जैसे तैसे विमान का इंतजाम करके एनएसजी कमांडोज को मुंबई तो ले आया गया लेकिन मुंबई हवाई अड्डे से तुरंत उन्हें दक्षिण मुंबई जहां 3 अलग अलग ठिकानों पर आतंकी कहर बरपा रहे थे, उन्हें लाने का कोई इंतजाम नहीं था।
27 नवंबर की सुबह साढे पांच बजे एनएसजी जवानों का विमान मुंबई पहुंचा...लेकिन उन्हें तब झटका लगा जब वादे के मुताबिक उन्हें हवाई अड्डे से आतंकी हमले के ठिकानों तक पहुंचाने के लिये कोई वाहन नहीं आया। वहीं दूसरी ओर साथ आये होम सेक्रेटरी को रिसीव करने के लिये सफेद एंबेसेडर कारें आ पहुंचीं थीं। विमान से असलहा उतारने और स्थानीय बसों का इंतजाम करने में कई और कीमती घंटे बर्बाद हुए। इस दौरान आतंकी ताज के कीचन वाले इलाके तक पहुंचकर कई लोगों की जान ले चुके थे।
6-भले ही 26-11 का हमला आतंकवादियों की टीम वर्क का नतीजा हो, लेकिन हमले के दौरान एटीएस ने आंतकियों की पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं से जो बातचीत रिकॉर्ड की उससे एक दिलचस्प हकीकत सामने आती है। ताज में मौजूद चारों आतंकवादी न केवल आपस में झगड रहे थे बल्कि पाकिस्तान से आ रहे निर्देशों पर अमल भी नहीं कर रहे थे।
ताज में मौजूद उमर नाम का आतंकी गुस्से में बंधक बनाये गये लोगों की पिटाई कर रहा था। उमर का साथी अब्दुल रहमान कराची से फोन पर हैंडलर वसी के साथ था। वसी उमर को फोन पर कुछ निर्देश देना चाहता था, लेकिन उमर फोन पर आने में आनाकानी कर रहा था। इस वजह से अब्दुल रहमान और उमर के बीच गाली गलौच भी हो गई। अब्दुल रहमान ने उमर को गधा और बेवकूफ कहा। वसी ने अब्दुल रहमान से कहा कि वो उमर को आग लगाने का निर्देश दे, लेकिन उमर सुनने को तैयर नहीं था। वो बंधकों को लात और घूसों से पीटने में ही लगा रहा। एक बार वो कुछ पलों के लिये फोन पर आया भी, लेकिन फिर उसने फोन वापस अब्दुल रहमान को थमा दिया।
7-होटल के भीतर जो 4 आतंकी दाखिल हुए थे उनमें से एक आतंकी खुद अपनी ही गोली से घायल हो गया था। ये आतंकी था अबू अली।
अबू अली ने जब ताज होटल में घुसकर अपनी एके-47 राईफल से फायरिंग करनी शुरू की तो एक गोली फर्श से टकराकर बाऊंस हुई और अबू अली के पैर में जाकर लगी। एटीएस ने आतंकियों की उनके हैंडलर से जिस बातचीत को रिकार्ड किया उससे ये बात सामने आई। अली हैंडलर वसी से कहता है- “ मेरे लिये दुआ करो। अपने पैर की वजह से मैं वो नहीं कर पा रहा हूं जो दिल में है। चलते वक्त दर्द होता है। जो काम अकेले मेरा था वो सभी को मिलकर करना पड रहा है। मेरा पैर मेरा साथ नहीं दे रहा। अल्लाह से दुआ करो कि हम उन्हें नाच नचायें”।
8-पाकिस्तान अब तक इस बात से इंकार करते आया है कि मुंबई पर हमला करने वाले आतंकवादियों को सरकारी मदद मिली, लेकिन ये किताब पाकिस्तान की केंद्रीय जांच एजेंसी एफआईए के सूत्रों के हवाले से बताती है कि हमले को पाक एजेंसियों का आधिकारिक सहयोग मिला था।
“अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद पाकिस्तान की फेडरल इनवेस्टीगेटिव अथॉरिटी ने अपने देश में हमलों की जांच शुरू की। हालांकि, पाकिस्तान ये कहता रहा कि भारत ने इस मामले में पुख्ता सबूत नहीं दिये हैं जो कि कुछ हद तक सच है, जांच से जुडे एफआईए के कुछ अफसर निजी तौर पर ये मानते हैं कि जिस पैमाने पर ऑपरेशन बॉम्बे को अंजाम दिया गया, वो बिना आधिकारिक जानकारी और मंजूरी के नहीं हो सकता”।.
9-दाऊद गिलानी उर्फ डेविड कॉलमैन हेडली आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा के लिये काम करता था, लेकिन उसके रिश्ते पाकिस्तान सरकार और वहां के आला राजनेताओं से भी थे। इस बात का खुलासा हुआ हेडली के पिता की मौत होने पर। 26-11 के हमले के एक महीने के बाद हेडली के पिता सय्यद सलीम गिलानी की लाहौर में मौत हो गई। हेडली उस वक्त देश से बाहर था, लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी परिवार से अपनी संवेदनाएं जताने के लिये उनके घर आये।हेडली की ओर से अपने दोस्त को भेजे गये एक ईमेल से ये बात सामने आई।
10- बधवार पार्क-वो जगह जहां 26 नवंबर 2008 की शाम पाकिस्तान से आये 10 आतंकवादी उतरे थे। मछुआरों की बस्ती के पास मौजूद इस जगह को लैंडिंग पॉइंट के तौर पर इस्तेमाल करने की सलाह आईएसआई के एक डबल एजेंट ने दी थी। हेडली ने बाद में आकर इस जगह की तस्वीरें लीं और यहां का जीपीआरएस लोकेशन नोट किया।


इन खुलासों से ये साफ होता है कि सुरक्षा एजेंसियों के सामने कई ऐसे मौके आये जब आतंकियों पर काबू पाया जा सकता था और जान ओ माल के नुकसान को काफी कम किया जा सकता था...लेकिन किसी की लापरवाही, किसी की ढिलाई, किसी की कडे फैसले न ले पाने की कमजोरी और किसी की बेवकूफी ने मुंबई के दुश्मनों को उनके मंसूबों में कामियाब कर दिया। 5 साल बाद ताज और ट्राईडेंट आज फिर गुलजार हैं, सीएसटी रेल स्टेशन पर मुसाफिरों की चहल पहल भी पहले जैसी ही है, लेकिन उन तारीखों के दौरान इन इमारतों में जो नरसंहार हुआ था वो इसके इतिहास का हमेशा के लिये काला हिस्सा बन गया है।

...तो इसलिए अपराधी बनाए जाते हैं बंदर

अभियुक्त या फिर अपराधी को क्यों पहनाते है कैप बनाते हैं बंदर

आप हमेशा देखते होंगे कोर्ट के बाहर निकलते वक्त या फिर थाने से ले जाते वक्त अारोपियों का चेहरा ढक दिया जाता है.किसी भी गिरफ्तार क्रिमिनल को ब्लैक मंकी कैप पहनाया जाता है । इसके दो ही मकसद होते हैं । पहला कि टीआई परेड (टेस्ट आइडेंटीफिकेशन परेड) के बाद अभियुक्त को ट्रायल के वक्त यह कहकर बचने का मौका न मिले कि मीडिया में तस्वीरें छपी थीं,सो टीआई परेड में पहचान का कोई वजूद नहीं है । दूसरा कि क्रिमिनल के चेहरे का खौफ सोसायटी में न फैले ।इस परेड में अभियुक्त की पहचान कराई जाती है । परेड के वक्त साथ में और कई बराबर कद-काठी के बंदी होते हैं । इनमें पहचान करनी होती है । टी आई परेड वैसे अभियुक्त की कराई जाती है,जिसकी पहचान वारदात के पहले व बाद में इस परेड के समय तक किसी रुप में किसी माध्यम से न की गई हो । तीसरा मकसद यह होता है कि अगर आरोपी निर्दोष करार दिया जाता है तो उसके मान सम्मान को प्रचारित कर दिए जाने से ठेस न पहुंचे.
यह है कानून
टी आई परेड में शामिल होने को अभियुक्त को मजबूर नहीं किया जा सकता । मतलब मर्जी है । दिल्ली निर्भया रेप कांड में भी कई अभियुक्तों ने टी आई परेड में शामिल होने से इंकार कर दिया था लेकिन यह इंकार केस के ट्रायल में अभियुक्त के खिलाफ जाता है । पर विक्टिम ने पहचान से इंकार कर दिया,तो अभियुक्त को मदद मिल जाती है । पहचान से इंकार का मतलब केस से अभियुक्त का सीधा बरी हो जाना नहीं है । तब भी तफ्तीश के अन्य सबूतों और गवाहों के बयान पर कोर्ट गौर करती है । 
यहां फंस जाता है मामला
जब प्राथमिकी के वक्त ही विक्टिम से अभियुक्त की पहचान की तस्वीरें दिखा कर होती है,तो फिर अब और टी आई परेड का औचित्य क्या है ?नामी गिरामी हस्तियों के मामले में तो इसका आैर भी बाजा बज जाता है.

Saturday, March 19, 2016

बीज से बोया जा रहा है गुलामी का तंत्र

बीज से बोया जा रहा है गुलामी का तंत्र
मोनसेंटो देखने में छोटा नाम लेकिन यह कंपनी बहुत बडी गुलामी की बेडी लेकर तैयार है अगर आप सब होशियार नहीं हुए तो एेसे लुटेंगे की अपना माथा पिटने का समय भी नहीं मिलेगा.जर्मनी के सेंटर में सभी बीज भले ही सुरक्षित रख लिए गए हैं लेकिन यह कंपनी दुनिया के नक्से से मौलिक बीज खत्म करके  जीएम फसल का बीज उतारने के लिए बेेकरार है इस बीज से सिर्फ एक बार फसल ली जा सकती है.नर्इ फसल के लिए नया बीज आैर यह यहीं कंपनी देगी. यानी वैश्विक खेती पर पूरा नियंत्रण.अगर एेसा हुआ तो फिर आप पीएम की मन की बात सुनते रहिएगा या फिर लच्छेदार मुहावरे से पेट भरएिगा नहीं तो आत्महत्या का आैजार आपके पास रियासतकाल से है.तरीका अलग अंग्रेजीयत भरा हो सकता है. बाकी सब जलकुंभी है जिसमें सरकार जी रही है कुंभकरण की तरह.
कृषि विशेषज्ञ आरएस पुरोधा की माने तो यह कुठाराघात होगा आैर इससे कृषि लागत आैर बढ  जाएगी.अमेरिका की तरह यहां जोत बडी नहीं बहुत छोटी है.

अंग्रेजी से जबान गुलाम आैर डालर से अर्थव्यवस्था 
बहुत ज्यादा विषय परांगत तो नहीं लेकिन अंग्रेजीयत में जीने की लत हमें भारी पडने वाली है.अंग्रेजो ने पूरे विश्व को अंग्रेजी पढार्इ आैर इस समय आप जबान के गुलाम हैं. अंग्रेजों ने डाॅलर में चुकाया आैर  डाॅलर में न्यौछावर बांटी आैर वैश्विक स्तर पर अर्थव्यवस्था का मसीहा बना बैठा है.
अब बीज से पेट गुलाम करने की तैयारी
इसी तरह पहले हमारे देश में हमारे गांव काे ताेडा गया आैर हम सब्जी बाजार से लाने लगे दूध बंटने की बजाय बिकने लगा फिर घर तोडा हम चमकती चांदनी की चाह में मुंबर्इ के गंदे नाले के किनारे घर बनाते बनाते विश्व की सबसे बडी कच्ची बस्ती धारावी बना बैठे.हमारे दूध की बढोतरी की चाह में विदेशी गाय लेकर आए आैर अब हमें अपनी गायों का सबसे बेहतरीन पौष्टिक दूध गायब हो गया इतना ही नहीं अब तो देसी नस्ल की गाय सिर्फ लैब तक हैं.

महंगा पडेगा अर्थव्यवस्था के साथ यह खेल


जयपुर.देश को वैश्विक बाजार बनाने की कवायद देश पर ही भारी पडेगी. भाजपा के इस केंद्र सरकार ने पीपीपी माॅडल आैर एफडीआर्इ के बाद शुक्रवार को आम आदमी पर शुक्र गुजार होते हुए जिस तरह से बचत के ब्याज दारों में कमी की है. अर्थव्यवस्था के हिमायितयों को इसका परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए.किसानों की वैसे तो कोर्इ बचत होती नहीं लेकिन किसान विकास पत्र के ब्याज दर को जिस सफार्इ से घटाया गया. इससे किसानों की फिक्र का जिक्र करने वाले महा चौकीदार की बेफिक्री का अंदाजा साफत हो जाता है.

बचत ने बरकरार रखा था हमारी अर्थव्यवस्था का करार
आप को अगर २००८ याद आ रहा हो तो बता दें की दुनिया के विकास का पहिया जब थम रहा था अमेरिका से चीन तक बाजार चरमरा रहे थे यूरोपियन यूनियन कराहते हुए टूट रहा था तब राष्र्टीय बजत योजना, किसान विकास पत्र, सहित इसी तरह की योजनाआें ने देश का विकास का पहिया थमने नहीं दिया.बाअदब उसी गति मुलायजा फरमाता रहा लेकिन इस समय जिस तरह से वैश्विक बाजार की शान कसीदे गढे जा रहे हैं यह बाजार को बर्बाद कर देगा आैर किसान को कंगाल कर देगा
अब देर में दुगुना होगा पैसा
यह मध्यम वर्ग के सपनोंं पर कुठाराघात है उनका पैसा अब दुगुना होने में अब आैर वक्त लगेगा अब सपने आैर भी देरी से पूरे होंगे क्या पता तब वह हो न हो या फिर बाजार ही न हो. २००८ की अर्थव्यवस्था से एक बडा संकेत मिला था की किन्स का नियम भी टूट जाएगा क्याें कि सरकार के पास खर्च करने के लिए होगा नहीं तो वह खर्च करके कहां से गडढे भरवाएगी आैर जिसके पास होगा वह अर्थव्यवस्था के मोटे होने का इंतजार करेगा.कुल मिलाकर आम आदमी बर्बाद होगा
बाकी वलीमा खाने के लिए निमंत्रण सबको है
ये असली मेक इन इंडिया है
अंत में राजनीति
देखते रहे इसमें बन कौन रहा है आैर बना कौन रहा है .बनाने का मतलब यहां दो हैं एक तो है निर्माण से है आैर दूसरा बनाना आप जानते हैं जो हर पांच साल बाद नेता बनाने आ जाते हैं.
ठीक अमित शाह की तरह की वह तो जुमला था...१५ लाख खातें में आएंगे वो तो आपके के खाते में तो आए नहीं लेकिन आपकी खता यह है कि आप ने इन्हें बना दिया तो आप के खातों पर इनकी नजर पड गर्इ है...देखिए आगे आगे होता है क्या



Saturday, February 27, 2016

फिल्म 26/11 के बहाने कुछ बातें

नाना पाटेेकर अभिनीत यह फिल्म कितनी हकीकत कितना फासना यह हम नहीं जानते लेकिन राम गोपाल वर्मा आज भी बेहतर कथानक की भी भूमिका निभाते हैं...करीब दो घंटे कि यह फिल्म आपका तब हिलाकर रख देती है जब राकेश मारिया कसाब को लेकर जाते हैं आैर उसे उसी की भाषा में उसकी जन्नत दिखाते हैं फिर उसके चेहरे पर उकेरा गया हर भाव एक नर्इ कहानी कहता है कि कैसे किसी को गुमराह करके कुछ भी कराया जा सकता है आैर उसे कोर्इ भी सजा दे दी जाए उसका पैमाना कम पड जाता है
दूसरा पहलू यह है कि अब अपराध करने की प्रवृत्ति बदल रही है अब अपराध चल रहा होता है आैर बडा ही होता जाता है यह भी २६/११ के बाद का ही बदला स्वरूप है.इससे पहले तक पुलिस हर मौके पर अपराध के बाद पहुंचती थी. पहला मौका था की पुलिस को यह समझ नहीं आ रहा था कि वह जाए तो किधर जाए करे तो क्या करें क्यों कि अपराध चल रहा था आैर एक एक मिनट बाद विकराल रूप धारण कर रहा था
तीसरा पहलू सीएसटी स्टेशन पर जब एके ४७ गरज रही थी तो नेताआें की लंबी टोपी टाइप में नीली टोपी पूरे जोश के साथ डंडा लेकर अपराध से निपटने दौडती है लेकिन उन्हें तो पता भी नहीं चलता की यह मुंगेर का कटटा नहीं किलिंग मशीन एके ४७ है.यानी की अपनी पुलिस अभी भी विज्ञापन के ३०३ टाइप जोशवर्धक में उलझी है जब कि मामला यहां वियाग्रा से होते हुए मैग्नेट तक पहुंच चुका है
चौथा पहलू यह कि मास किलिंग कैसे की जाए इसका एक बडा प्रशिक्षण चल रहा है. बडे स्तर पर यह संकेत यह भी देता है कि किसी पटाखे टाइप चीज फटने पर आप तत्काल भौकाल में खडे होकर मुआयना न करें बल्कि किसी तरह सरकने का प्रयास करें उपाय करें जैसे कामा हाॅस्पिटल के डाॅक्टर ने किया था.वरना बम फोड खडा करेंगे आैर यह गोली मार देंगे, सो सावधानी बरतें

आैर कुरान की आयतों से ही झकझोर कर रख देने वाले नाना पाटेकर की बात ही बेमिशाल है

Wednesday, November 25, 2015

दाऊद की प्रोपर्टी नीलामी के पीछे की असली कहानी !!! -जीतेंद्र दीक्षित

दाऊद की प्रोपर्टी नीलामी के पीछे की असली कहानी !!!


खबर आई है कि एक बार फिर अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहिम की संपत्ति की नीलामी होने जा रही है। बीते 16 सालों में दाऊद की संपत्ति की ये चौथी बार नीलामी हो रही है। मैं इससे पहले दाऊद की संपत्तियों की 3 नीलामियां कवर कर चुका हूं और मेरा मानना है कि ऐसी नीलामी एक ड्रामे से ज्यादा कुछ नहीं होती। साल 2000 में सबसे पहली बार नीलामी कोलाबा इलाके के इस होटल डिप्लोमैट में हुई थी...लेकिन तब किसी की हिम्मत नहीं हुई कि वो डॉन की संपत्ति पर बोली लगाये। उसके अगले साल 28 मार्च 2001 को दूसरी बार फिरसे नीलामी की गई जिसमें दिल्ली के शिवसैनिक अजय श्रीवास्तव ने नागपाडा इलाके की जयराजभाई लेन में 2 दुकाने खरीदीं। उसी साल 20 सितंबर को फिरसे तीसरी नीलामी हुई। उस नीलामी में दिल्ली के ही एक व्यापारी पीयूष जैन ने दाऊद की ताडदेव इलाके की एक संपत्ति खरीदी। इन दोनो ही लोगों ने संपत्ति के पैसे तो चुका दिये लेकिन आज तक संपत्ति का कब्जा हासिल नहीं कर सके हैं।
दिल्ली के शिवसैनिक अजय श्रीवास्तव पेशे से वकील हैं।1999 में श्रीवास्तव पहली बार तब चर्चा में आये थे जब उन्होने पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच खेले जाने के विरोध में फिरोजशाह कोटला मैदान की पिच खोद डाली थी। अजय श्रीवास्तव ने संपत्ति तो खरीद ली, लेकिन उसके बाद उनका सामना हुआ दाऊद इब्राहिम की बहन हसीना पारकर से। हसीना पारकर ने संपत्ति का कब्जा देने से इंकार कर दिया। अजय श्रीवास्तव ने कब्जा हासिल करने के लिये मुंबई के स्मॉल कॉसेस कोर्ट में अर्जी दायर की। 10 साल तक चले मुकदमें के बाद साल 2010 में फैसला उनके पक्ष में ही आया लेकिन इसके बावजूद हसीना कब्जा छोडने को तैयार नहीं हुई।
भले ही कोर्ट की चारदीवारी में अजय श्रीवास्तव दाऊद के खिलाफ मुकदमा जीत गये हों, लेकिन दाऊद गिरोह के लिये ये उसकी नाक का सवाल था।हसीना पारकर ने स्मॉल कॉसेस कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील कर दी। हसीना पारकर की पिछले साल हार्ट अटैक से मौत हो गई, लेकिन अब उसके बच्चे मुकदमा आगे चला रहे हैं। कुल मिलाकर बीते 15 सालों से अजय श्रीवास्तव कब्जा हासिल करने के लिये दिल्ली से मुंबई का चक्कर काट रहे हैं। इस बीच उत्तर प्रदेश से पुलिस ने छोटा शकील गिरोह के कुछ शूटरों को गिरफ्तार किया जिनसे पूछताछ में पता चला कि उन्हें अजय श्रीवास्तव को अपना निशाना बनाना था। अजय श्रीवास्तव का कसूर था कि उसने दाऊद की संपत्ति पर बोली लगाने की हिम्मत की। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने अजय श्रीवास्तव को सुरक्षा मुहैया करा दी। श्रीवास्तव का कहना है कि उन्होने अंडरवर्लड के खौफ के खिलाफ संदेश देने के लिये दाऊद की संपत्ति खरीदी थी। उन्होने मुंबई पुलिस को भी पेशकश की वे उनकी खरीदी हुई संपत्तियों का कब्जा ले ले और उस जगह अपनी चौकी बना दें, लेकिन मुंबई पुलिस ने दिलचस्पी नहीं दिखाई।
वैसे श्रीवास्तव के कुछ पुराने साथी जो अब उनसे अलग हो चुके हैं दबी जुबान से ये भी आरोप लगाते हैं कि उन्होने दाऊद की संपत्ति सिर्फ पब्लिसिटी की खातिर खरीदी थी। श्रीवास्तव की असली मंशा थी कि ऐसा करके वे शिवसेना में अपना कद बढा पायेंगे, लेकिन संपत्ति खरीदने के बाद जब वे मातोश्री बंगले पर बाल ठाकरे से मिलने पहुंचे तो ठाकरे ने उनसे मिलने से इंकार कर दिया।
दाऊद की संपत्ति को नीलामी में खरीदने वाले शख्स पीयूष जैन भी आज तक उसका कब्जा हासिल नहीं कर सकें हैं। जोश में आकर पीयूष जैन ने संपत्ति खरीद तो ली लेकिन उसके बाद डर के मारे उनकी हालत खराब हो गई। संपत्ति खरीदने के बाद पीयूष जैन ने दिल्ली में रहना छोड दिया और अब एक दूसरे शहर में रहने के लिये चले गये हैं। संपत्ति पर कब्जा हासिल करने किलेय पीयूष जैन ने कोई कोर्ट केस भी नहीं किया लेकिन जब उनसे मैने पूछा किया संपत्ति हासिल करने के लिये आपने क्या किया तो उनका जवाब था कि जब अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो मैने उनको खत लिखकर गुहार लगाई थी कि वे संपत्ति पर कब्जा हासिल करने में उनकी मदद करें।
अलग अलग केंद्रीय जांच एजेंसियों ने दाऊद इब्राहिम की करीब 12 संपत्तियों को जब्त कर रखा है और आज की तारीख में बाजार में उनकी कीमत 100 करोड के करीब आंकी जा रही है। सूत्रों के मुताबिक दाऊद के पास कई बेनामी संपत्तियां भी हैं जिनकी कोई आधिकारिक जानकारी इन जांच एजंसियों के पास नहीं है। ऐसी संपत्तियों की देखभाल का काम पहले दाऊद की बहन हसीना पारकर करती थी और अब उसका छोटा भाई इकबाल कासकर करता है।
14 साल बाद फिर एक बार दाऊद की संपत्ति की नीलामी तो हो रही है। हो सकता है कि फिर एक बार कोई न कोई हौसला जुटाकर बोली लगाने के लिये नीलामी में पहुंच जाये...लेकिन उसके आगे उस संपत्ति पर कब्जा हासिल करने के लिये उसे खुद ही दाऊद के रिश्तेदारों से कानूनी लडाई लडनी होगी। बीते हए मामले यही बताते हैं कि पुलिस और सरकार इसमें कोई मदद नहीं करेगी।

Saturday, November 14, 2015

आधुनिक राजनीति में सबका चाणक्य प्रशांत किशोर-ज्ञानेश्वर

आधुनिक राजनीति की बिसात में नए चाणक्य आए हैं. चाहे फिर वह लालू यादव का कैंपेन संभालने वाले संजय यादव की बात हो या फिर नीतीश के तरकश में तीर सजाने वाले प्रशांत किशोर. प्रशांत सागर की तरह शांत प्रशांत ने राजनीति की पक्ष आैर विपक्ष दोनों को जीतने आैर जिताने की क्षमता को परवान चढाया है एक तरफ जहां पहले बीजेपी के विजय रथ के चक्के को कश्मीर से कन्याकुमारी तक चला दिया, वहीं बिहारी में नीतिश के सारथी बनते ही चक्के का धुरा खोल भी दिया आम जनता तक राजनीतिक संघर्ष के साथ पीछे की राजनीति का खेल बखूबी समझने वाले चाणक्य बन रहे हैं ठीक उसी तरह जिस तरह से चाण्क्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को पहले राजा घोषित कर फिर राजगदृदी दिलार्इ थी...
आइए वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश्वर.के माध्यम से जानते हैं प्रशांत किशोर के बारें में...

लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की भव्य जीत के बाद पहली बार प्रशांत किशोर का नाम उछला पर बिहार में नीतीश कुमार की बड़ी जीत के बाद उनके बारे में लोग सब कुछ जानना चाहते हैं लेकिन पर्दे के पीछे काम करने वाले प्रशांत के बारे में गूगल को भी बहुत कुछ नहीं पता.
तरकश से निकल रहे तीर अब दिल्ली जा रहे हैं. बिहार चुनाव के गेमचेंजर माने जा रहे प्रशांत किशोर पिछले दो दिनों से दिल्ली में हलचल मचाए हुए हैं. निश्चित तौर पर नई स्ट्रैटजी होगी. राहुल गांधी से मिल चुके हैं और अरुण शौरी से भी भेंट कन्फर्म है लेकिन सबसे अधिक चर्चा लालकृष्ण आडवाणी से मुलाकात को लेकर है. वैसे आडवाणी से मुलाकात की आधिकारिक पुष्टि अभी शेष है.
राजनीति में क्यों मची है प्रशांत किशोर के नाम की हलचल 
प्रशांत किशोर बिहार चुनाव के नतीजे के बाद सबसे अधिक चर्चा में हैं. अपने बारे में प्रशांत कभी खुलकर नहीं बात करते. इतना सब जानते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के कैम्पेन स्ट्रैटजिस्ट प्रशांत थे. बाद में अमित शाह से मतभेद के कारण अलग हुए. फिर नीतीश कुमार से जुड़े और मुश्किल चुनाव में भारी जीत दिला दी.
अब हम प्रशांत किशोर के बारे में वह सब बताते हैं, जो सभी जानना चाहते हैं, लेकिन अब तक पता नहीं था. प्रशांत बिहार के ही बक्सर के रहने वाले हैं. बताने की जरुरत नहीं, पर बिहार की 'जात जिज्ञासा' को शांत करने को बता दें कि वे ब्राह्मण हैं. 
इनके पिता डॉ. श्रीकांत पाण्डे और माता श्रीमती इंदिरा पाण्डेय हैं. पिता श्रीकांत पेशे से चिकित्सक हैं और सरकारी सेवा में रहे हैं. बक्सर में मेडिकल सुपरिटेंडेंट भी थे. अब बक्सर के ही इंडस्ट्रियल थाना क्षेत्र के निरंजनपुर में निजी प्रैक्टिस करते हैं. पहचान अच्छे डाक्ट र की है. प्रशांत बक्सर आते-जाते रहते हैं.
प्रशांत किशोर कैसे बन गए नेताओं की पहली पसंद
प्रशांत के बड़े भाई अजय किशोर पटना में ही रहते हैं और उनका अपना कारोबार है. प्रशांत की प्रारंभिक पढ़ाई बक्सर व धनबाद में हुई है. इंटरमीडिएट पटना के साइंस कालेज से हुई. बाद में पढ़ने को हैदराबाद चले गए और तकनीकी शिक्षा प्राप्त की. नौकरी में पहचान यूनिसेफ से मिली. दक्षिण अफ्रीका में थे तब भी ब्रांडिंग का जिम्मा था. 
गुजरात से संबंध वाइब्रैंट गुजरात के आयोजन को लेकर बना. सफल आयोजन के सूत्रधार के रूप में नरेन्द्र मोदी ने पहचान की. साथ जुड़कर भारत के पोल स्ट्रैटजिस्ट बन गये. पहले गुजरात में एक और जीत दिलाई. इसके बाद मोदी को लेकर दिल्ली. के रायसीना हिल्स की ओर बढ़ गये. सफल परिणति 2014 का लोकसभा चुनाव था. बाद में दिल्ली के पावर सेंटर के झगड़े ने प्रशांत को होम स्टेट और नीतीश के पास पहुंचा दिया.
प्रशांत शादी-शुदा हैं. पत्नी  और बच्चे दिल्ली  में रहते हैं. बिहार चुनाव के लंबे कैंपेन के दौरान परिवार को बिलकुल समय नहीं दे सके. अभी मां-पिता दिल्ली में ही हैं और प्रशांत परिवार के साथ समय बिताने के अलावा देश की राजनीति की आगे की स्ट्रैटजी तय करने में लगे हैं.

जब विद्यासागर जी ने चप्पल फेंकी

जब विद्यासागर जी ने चप्पल फेंकी फिर एक चप्पल चली। रोज ही कहीं ना कहीं यह पदत्राण थलचर हाथों में आ कर नभचर बन अपने गंत्वय की ओर जाने क...