Sunday, September 19, 2010

आज मोहब्‍बत का 'ताज' भी गम़जा़या होगा.... / हरकीरत हकीर

अब न जाने कितना गम़ उन्‍हें पीना होगा
हर पल आँसुओं में डूब कर जीना होगा
दोस्तों किसी का यार न बिछडे़ कभी
आज न जाने किस-किस का घर सूना होगा

अब न सजेंगी मांगे उनकी सिन्‍दूरों से
न भाल पे उनके कुमकुम लाल होगा
न दीप जलेंगे दीवाली पे उनके घर
न होली पे अब रंग-गुलाल होगा

खोला होगा कैसे परिणय का बंधन
कैसे स्‍नेह से दिया कंगन उतारा होगा
चढा़कर फूल अपने रहनुमा के चरणों पर
कैसे आँसुओं को घुट-घुट कर पीया होगा

गुजारी होंगी शामें जिन हंसी गुलजारों में
उस सबा ने भी दर्द का गीत गाया होगा
बात-बेबात जिक्र जो उनका आया होगा
आँखों में इक दर्द सा सिमट आया होगा

रातों को हुई होगी जो सन्‍नाटे से दहशत
तड़प के बेसाख्‍ता उन्‍हें पुकारा होगा
ढूँढती रहेंगी हकी़र ताउम्र उन्‍हें निगाहें
आज मोहब्‍बत का 'ताज' भी गम़जा़या होगा

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