Sunday, April 11, 2010

टूटते मेकेनिज़्म में हत्याओं का दौर


लालमाटी गाँव का सूरज बैगा अभी पिछले हफ्ते मुझे मिला था सीआरपीएफ के भर्ती कैम्प में. उत्तर-प्रदेश के घोर नक्सल प्रभावित सोनभद्र इलाके के एक सीमांत कृषक का ये बेटा अगर थोड़ा बहुत पढ़ा-लिखा नहीं होता तो शायद अपने ही और साथियों की तरह लाल सलाम का नारा बोल बीहड़ में कूद पड़ा होता.

पढ़ाई और बुनियादी जरूरतों के लिए दिन-रात की शारीरिक मानसिक प्रताड़ना ने उसके लिए विकल्पों को चुनना आसान कर दिया और उसने हिन्दुस्तानी सेना का हिस्सा बनना कबूल कर लिया. ये कहानी सिर्फ सूरज की नहीं, सीआरपीएफ और बीएसएफ समेत तमाम अर्धसैनिक बलों एवं भारतीय सेना के ज्यादातर जवानों की है.

दंतेवाडा में माओवादियों द्वारा 76 सीआरपीएफ के जवानों को मार दिए जाने की सूचना मुझे सीआरपीएफ के ही एक अधिकारी ने दी. छतीसगढ़ और बिहार की सीमा पर स्थित जिस इलाके में मै आज इस वक़्त हूँ, वहां महा भर्ती अभियान चल रहा है. रोजाना हजारों की संख्या में नए रंगरूट भर्ती के लिए यहाँ आ रहे हैं.

शहरी युवा सेना में या तो कमीशन रैंक पाना चाहते हैं या फिर उन्हें सेना पसंद नहीं. इससे अलग ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के युवाओं के लिए आज भी नौकरी का सबसे अच्छा और सुगम विकल्प सेना के रूप में मौजूद है. नक्सली हिंसा पर अपने होठों को सी कर कोन पकड़ा लेने वालों के लिए ये सच स्वीकार कर पाना बेहद कठिन होता है कि हत्याएं चाहे नक्सली की हो या फिर किसी जवान की, मरता आदिवासी ही है. चाहे नक्सली हिंसा के मूक समर्थक हों या फिर सत्ता के कारिंदे, सेना और अर्धसैनिक बल उन्हें एक मेकेनिकल टूल की तरह नजर आने लगते हैं, जिसका इस्तेमाल सरकार जब चाहे तब, जैसे चाहे वैसे कर सकती है.

पी. चिदम्बरम ने दंतेवाडा में हमले को बर्बर और सुरक्षा चूक बताया और छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर जा पहुंचे. नक्सली हमले के बाद की रणनीति तैयार कर रहे गलियारों से उड़ने वाली खबरों पर अगर यकीन किया जाये तो आने वाले समय में सुरक्षा बलों द्वारा समूचे दंतेवाडा में अब तक की सबसे बड़ी कार्यवाही को अंजाम दिया जा सकता है. निश्चित तौर पर हत्याओं का एक और दौर शुरू होगा, शहादत के मायने बदल जायेंगे, बर्बरता के प्रतीक बदल जायेंगे, लेकिन लाशें उन्ही की होंगी जिन्होंने मरने के लिए ही जन्म लिया है.

आने वाले दिनों में जवानों की इन अकाल मौतों के लिए माओवाद को तो कटघरे खड़ा ही किया जायेगा, गृहमंत्री पी चिदम्बरम और उनकी टीम द्वारा ऑपरेट किये जा रहे उस ऑपरेशन के औचित्य पर भी सवाल खड़े किये जायेंगे, जिसमे देश की सर्वाधिक उपेक्षित और निरीह आबादी को लोकतंत्र की तथाकथित स्थापना के नाम पर सामूहिक जनसंहार की आग में झोंक दिया गया है.

दंतेवाडा की घटना के बाद इलेक्ट्रानिक चैनलों की ख़बरों में कल का सवेरा साफ़ नजर आने लगा है. चूँकि ये तय है कि अब जो कार्यवाही होगी, उसमे बड़े पैमाने पर निर्दोष मारे जायेंगे, ऐसे में ऐसी घटनाओं की पृष्ठभूमि तैयार करना पी. चिदम्बरम एंड कम्पनी के लिए बेहद जरुरी था. जो खबर मिल रही है, उसके अनुसार संभव है कि पूरे बस्तर को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर सेना के हवाले कर दिया जाए.

घटना के तत्काल बाद उत्तर प्रदेश छत्तीसगढ़ सीमा पर तैनात सीआरपीएफ के कुछ जवानों से हमारी बातचीत हुई. उनके अंदर जिस तरह का गुस्सा नजर आ रहा है, वो निस्संदेह बस्तर पर भारी पड़ने जा रहा है. छत्तीसगढ़ में रहने वाले मेरे एक पत्रकार मित्र बताते हैं कि अर्धसैनिक बलों के ज्यादातर जवान दो-तीन साल इस इलाके में गुजारने के बावजूद यहाँ की बेहद कठिन भौगोलिक परिस्थितियों से परिचित नहीं हो पाए हैं, जिसका खामियाजा उन्हें बार-बार भुगतना पड़ता है. लेकिन एक जो महत्वपूर्ण चीज मैंने पायी, वो ये थी कि उनके लिए आदिवासियों और नक्सलियों में अंतर करने का सिर्फ एक तरीका है, वो है हथियार.

पुलिस के विपरीत सीआरपीएफ की गोलियों का निशाना वही बनते हैं, जिनके पास हथियार होते है. किसी निहत्थे को सीआरपीएफ ने निशाना बनाया हो, ऐसे मामले कम ही सामने आते हैं. उन्हें आउट ऑफ़ टर्न प्रमोशन और मेडल का भी लालच नहीं होता. लेकिन ताज़ा घटना के बाद तय है कि दंतेवाडा के जंगलों में सुरक्षा बलों का दूसरा चेहरा देखने को मिलेगा.
ये कम आश्चर्यजनक नहीं है कि दंतेवाडा की घटना के बाद किसी ने भी ये नहीं कहा कि जैसे-तैसे बातचीत का माहौल तैयार कर अघोषित युद्ध की-सी परिस्थितियां ख़त्म की जानी चाहिए.
ये चेहरा हमने उत्तर प्रदेश में उस वक़्त भी देखा था, जब नक्सलियों ने नौगढ़ के हिनौत में पीएसी के ट्रक को उड़ाकर डेढ़ दर्जन जवानों को मार डाला था. उस घटना के बाद वहां के आदिवासियों को जो दंश दिए गए, वो आज भी जहर बनकर उनकी शिराओं के रक्तसंचार को अव्यवस्थित कर रहे हैं. अगर ऐसा कुछ घटता है तो यह भी तय है कि बदले की कार्यवाही से हिंसा की इस निरंतरता को ख़त्म करना नितांत असंभव होगा. जब घटना के तत्काल बाद गृहमंत्री कहते हैं कि कोई न कोई बड़ी भूल हुई होगी, तो क्या पता कि कल को कोई दूसरी भूल न हो. दूसरी घटना का मतलब भी ऐसी घटनाओं की पुनरावृति ही होगी और ये क्रम निरंतर चलता रहेगा.

दंतेवाडा या उस जैसे किसी भी हमले को सरकार की निगाहों से देखने के अपने तर्क हैं. लेकिन वो बहुसंख्यक लोग जो ऐसी घटनाओं के बाद प्रतिघात को अनिवार्य मानते हैं, अक्सर उस वक़्त चुप्पी साधे रहते हैं, जब ऐसी घटनाओं की परिस्थितियां तैयार होती हैं, उन्हें सरकार की निगाहों से देखना ही लोकतांत्रिक नजर आता है.

ये कम आश्चर्यजनक नहीं है कि दंतेवाडा की घटना के बाद किसी ने भी ये नहीं कहा कि जैसे-तैसे बातचीत का माहौल तैयार कर अघोषित युद्ध की-सी परिस्थितियां ख़त्म की जानी चाहिए. ये बात कही जाएगी लेकिन तब, जब कल से हत्याओं का दूसरा दौर शुरू हो जायेगा. मानवाधिकार के नाम पर शोर भी बरपने लगेगा. ऐसे में अरुंधती राय से लेकर माओवाद के तमाम पैरोकारों की तात्कालिक चुप्पी के मतलब की भी हर कीमत पर व्याख्या की जानी चाहिए.

इस वक़्त जब मै ये टिप्पणी लिख रहा हूँ, आउटलुक का वो अंक मेरे सामने हैं, जिसमे अरुंधती का माओवादियों के साथ साक्षात्कार प्रकाशित हुआ है. शुरुआत में ही एक तस्वीर है, जिसमें आउटलुक के ऊपर एक स्टेनगन रखी हुई है. हम इस तस्वीर का मतलब जानते हैं और ये भी जानते हैं कि अगले अंक में पत्रिका में दंतेवाडा की इस घटना के संबंध में छपी खबर के तेवर क्या होंगे.

हम भूल जाते हैं, चाहे वो सेना का जवान हो या फिर जंगलों में दर-दर भटकता कोई कॉमरेड, दोनों में कोई अंतर नहीं होता. आदिवासी आदिवासी होता है, आदमी आदमी होता है, जीवन जीवन होता है, ये सच सामने रखकर बात करने की आदत में ही समाधान छुपा है. अगर हम ऐसा नहीं करते तो सरकार के गलत-सही निर्णयों पर भी इमानदार विरोध नहीं दर्ज करा पाएंगे और हत्याओं का ये दौर जारी रहेगा.

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